हार से बड़ी हार की जगह
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल पहले कांग्रेस के पैर उखड़ गए थे. इन दोनों राज्यों में संगठन और नेतृत्व के मामले में कांग्रेस का कोई चेहरा नहीं रहा.

भाजपा शासित तीनों राज्यों में कांग्रेस से पिछड़ने पर पार्टी कार्यकर्ता निराश हैं लेकिन भाजपा नेतृत्व निराश से अधिक चिंतित है. चिंतित होने की सामान्य वजह यह नहीं है कि भाजपा तीन राज्यों में पिछड़ी बल्कि इसलिए है क्योंकि हिंदी पट्टी के तीनों राज्य में कांग्रेस मजबूती से जम गई. यदि राजस्थान को छोड़ भी दिया जाए (जहां अमूमन पांच साल में सरकार बदलती है) मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पंद्रह साल बाद कांग्रेस के लिए सियासी जमीन हरी हो गई है.
केंद्र की सत्ता के लिए किसी भी सियासी दल के लिए यह जरूरी है कि हिंदी पट्टी (10 राज्य) में अच्छा प्रदर्शन करे. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिंदी पट्टी से 191 सीटें जीती थीं. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 62 सीटें भाजपा ने जीती थी. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल पहले कांग्रेस के पैर उखड़ गए थे. इन दोनों राज्यों में संगठन और नेतृत्व के मामले में कांग्रेस का कोई चेहरा नहीं रहा. लेकिन लोकसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले हुए चुनाव में इन तीनों राज्यों में कांग्रेस को चेहरा मिल गया. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को सीएम और पार्टी अध्यक्ष का चेहरा मिलेगा. मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता इस चुनाव से स्थापित हो गए. दिग्विजय सिंह के रूप में पहले की तरह सिर्फ एक नेता मध्य प्रदेश कांग्रेस की पहचान नहीं रहेगा.
दरअसल भाजपा नेतृत्व की चिंता यही है. हिंदी पट्टी के इन तीनों प्रमुख राज्यों में कांग्रेस अपने प्रदर्शन के बूते भाजपा के सामने आ डटी है. एक तरह से 2019 के लिए हिंदी पट्टी के राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से मुकाबला करने लिए एक बड़ा आधार मिल गया है. जिस तरह से 2019 के लिए भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनने की कवायद शुरू हो गई है वैसे में हिंदी पट्टी में कांग्रेस का स्थापित होना सियासी लिहाज से भाजपा के लिए चिंता की वजह है.
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