आसान : कागज पर सांस लेती आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़लें
'आमीन' के बाद 'आसान' आलोक श्रीवास्तव का दूसरा गजल संग्रह है

आलोक एक ख़ुशनुमा ग़ज़लकार हैं. मस्त और बेलौस. एक साथ बेचैन और बेफ़िक्र. संतुष्ट और असंतुष्ट. आसान ज़बान में शायरी करते हैं, शायद इसीलिए आमीन के बाद उन्होंने अपने दूसरे ग़ज़ल संग्रह का नाम दिया है, आसान. इस संग्रह की ग़ज़लें भी आसानी से ज़ेहन पर दस्तक देती हुई सीधे दिल में उतर जाती हैं.
मंचों से भी इन्हें बहुत प्यार से सुना जाता है. काग़ज़ पर भी यह बहुत बोलती हैं. कभी-कभी तो ऐसा होता है कि काग़ज़ भी सांस लेने लगता है. यह ग़ज़लें पत्र पत्रिकाओं और मंचों के बीच तो पुल बनाती ही हैं, हिंदी और उर्दू इन दोनों भाषाओं के बीच भी सेतु सिरजती हैं.
जावेद अख़्तर और आशुतोष राणा ने आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़लों पर अपने सघन मंतव्य दिए हैं. इन दोनों ने वही लिखा है, जो आलोक हैं. अमिताभ बच्चन तक ने उनपर अपना प्यार उड़ेला है. एक ज़हीन और रोशन ख़याल कवि निरंतर अपने कथ्य को मांजने के क्रम में सधे सधाए शिल्प को तोड़ता चला जाता है और अपने लिए नया शिल्प ईज़ाद करता है, आलोक ने भी अपने स्तर पर यही किया है. आसान ग़ज़लें कहने के लिए मुश्किल बहरें भी ली हैं और तराशते गए हैं अपने शायर को.
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है
उन बातों को सहना मुश्किल होता है
लगती है ये बह्र बहुत आसान मगर
इसमें ग़ज़लें कहना मुश्किल होता है
आलोक में बड़बोलापन नहीं है लेकिन एक रचनाकार का आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरा है. उनकी शायरी संवाद की शायरी है. वह अपनी रचनाओं में बोलते बतियाते नज़र आते हैं. उनकी भाषा का रंग हिन्दुस्तानी है, शब्दकोष वाली भाषा से वह पर्याप्त दूरी रखते हैं. गंगाजमुनी लबो लहज़े में अपनी बात कहते हैं. उनका फ़िक्रोफ़न देखते बनता है. उनके पास संवेदना की विरल पूंजी है, जिससे वह अपने शायर का चेहरा गढ़ते हैं.
वे लगातार सफ़र में रहते हैं, उनका ग़ज़ल का सफ़र भी ख़ासा दिलचस्प है. एक अच्छी ग़ज़ल कहने के लिए वह अंग्रेज़ी में भी सफ़र करते हैं. रातों की नींद और दिन का क़रार कुर्बान करते हैं. ख़ुद को पाने के लिए ख़ुद ही को खोजते रहते हैं. व्यष्टि को समष्टि की शक्ल देते हैं, आपबीती को जगबीती बनाते हैं.
तुझे ऐ ज़िन्दगी अब आंख भर के देखना है
तेरी बारीकियों को ज़ूम कर के देखना है
चिता की राख से और क़ब्र की गहराइयों से
कहां जाते हैं सारे लोग, मर के देखना है
आसान, आलोक का एक और सार्थक शिखर पड़ाव है. उनका यह ग़ज़ल संग्रह पेंगुइन ने प्रकाशित किया है. बहुत सुन्दर आवरण बनाया है हमारे पुराने इलाहाबादी अग्रज अशोक भौमिक ने. संग्रह से उनकी एक ग़ज़ल उनके पत्रकारिता के पेश के लहजे को भी उजागर करती है.
तू जब राह से भटकेगा, मैं बोलूंगा
मुझको कुछ भी खटकेगा, मैं बोलूंगा
सच का लहजा थोड़ा टेढ़ा होता है
तू कहने में अटकेगा, मैं बोलूंगा
अवसरवादी साथी सा व्यवहार न कर
हाथ अगर तू झटकेगा, मैं बोलूंगा
विश्वासों का शीशा नाज़ुक होता है
ये शीशा जब चटकेगा, मैं बोलूंगा
मीठे मीठे वादों के सब बाग़ दिखा
वादों से जब भटकेगा, मैं बोलूंगा.
आलोक की पहली पुस्तक आमीन पर लिखते हुए गुलज़ार ने कहा था. “आलोक एक रौशन उफ़ुक पर खड़ा है, नए उफ़ुक खोलने के लिए.” आमीन से आसान तक का आलोक का सफ़र गुलज़ार की कही बात की तस्दीक़ है.
(यश मालवीय हिंदी के प्रसिद्ध कवि-गीतकार हैं)