सरकारी मदद लेने वाली सभी संस्थाएं आरटीआइ की दायरे में
सरकारी मदद लेने वाली सभी संस्थाएं आरटीआइ की दायरे में, विशेषज्ञों ने कहा, जब तक सरकार सख्त नियम नहीं बनाएगी, इसे सब पर लागू करना मुश्किल

आरटीआइ कानून के तहत अब वे सभी गैर सरकारी संगठन और संस्थान आते हैं जिन्हें सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मोटी आर्थिक मदद करती है. ये व्यवस्था 17 सितंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दी गई है. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मोटी आर्थिक मदद से आशय 50 फीसदी से नहीं है और इसमें कोई नियम नहीं तय किया जा सकता. उदाहरण के तौर पर किसी अस्पताल, शैक्षिक संस्थान को अगर शहर में मुफ्त या भारी रियायत पर जमीन दी जाती है तो इसे मोटी आर्थिक मदद कहा जाएगा. आरटीआइ के दायरे में आने वाले संस्थान पब्लिक अथॉरिटी कहलाएंगे.
कोर्ट ने और विस्तार से इसे समझाया कि एनजीओ या संस्था को मदद का पैमाना हर मामले के तथ्यों के हिसाब से होगा. ऐसे कई मामले हो सकते हैं जहां आर्थिक मदद 50 फीसदी की ज्यादा हो लेकिन उन्हें मोटी मदद नहीं कहा जा सकता. कल्पना कीजिए किसी एनजीओ की पूंजी 10,000 रु. है और उसे 5000 रु. की ग्राट मिलती है तो उसे मोटा अंशदान नहीं कहा जाएगा. पर अगर कोई एनजीओ या संस्थान करोड़ों रुपए की ग्राट लेता है और वह 50 फीसदी से कम भी हो तो उसे मोटी आर्थिक मदद कहा जाएगा.
जाहिर है इस फैसले के बाद सरकार से ग्रांट या रियायती जमीन या किसी अन्य तरह से मदद लेने वाले एनजीओ, अस्पताल, शिक्षण संस्थान आदि आरटीआई के तहत आएंगे. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि फैसले को सख्ती से लागू करने की व्यवस्था जब तक नहीं की जाएगी एनजीओ और संस्थान इससे बचते रहेंगे.
जाने-माने आरटीआइ एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल कहते हैं कि केंद्रीय सूचना आयोग भी पहले इस तरह के फैसले सुनाता रहा है. लेकिन संस्थानों का रवैया लटकाने वाला रहता है. वे सीआइसी के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट से स्टे ले आते हैं. इस फैसले के संबंध में अग्रवाल कहते हैं, अगर कोई एनजीओ सरकारी सहायता नहीं ले रहा है तो वो आइटीआइ के दायरे में नहीं आएगा. अग्रवाल सलाह देते हैं कि इस फैसले का असर तब पड़ेगा जब सरकार ग्रांट या मदद में आरटीआइ के दायरे में आने की शर्त अनिवार्य कर दे. वे एक और सलाह देते हैं कि जितने भी केंद्र और राज्य सरकार के भवन विभाग हैं वे ऐसे भवनों और संस्थानों की सूची बना लें जिन्हें जमीन रियायत पर दी गई है और उनसे सूचना का अधिकार लागू करने को कहें अन्यथा उनका अलॉटमेंट रद्द कर दें.
दरअसल, बीसीसीआइ जैसे कुछ संस्थान हमेशा आरटीआइ के दायरे से किसी न किसी तरह बचते रहे हैं क्योंकि यहां राजनेताओं का जमघट और आर्थिक हित होते हैं. सरकार को इन्हें सूचना के अधिकार के दायरे में लाना चाहिए.
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