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Homeवेब एक्सक्लूसिवफोटो गैलरीविरोध से लेकर बराबरी तक, तस्वीरों से जानिए ओलंपिक में महिला एथलीटों की भागीदारी की यात्रा

विरोध से लेकर बराबरी तक, तस्वीरों से जानिए ओलंपिक में महिला एथलीटों की भागीदारी की यात्रा

साल 1896 में जब एथेंस में पहली बार आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई थी, तो उसमें एक भी महिला खिलाड़ी ने हिस्सा नहीं लिया था. पेरिस ओलंपिक 2024 की बात करें तो इसे लैंगिक समानता की वजह से #जेंडरइक्वलओलंपिक नाम दिया गया है

एथेंस ओलंपिक, 1896 /फोटो - IOC
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पेरिस ओलंपिक-2024 कई मायनों में खास है. कार्बन फुटप्रिंट का कम-से-कम उत्सर्जन हो, इस लिहाज से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) जहां इस आयोजन में शाकाहार को बढ़ावा दे रहा है. वहीं लैंगिक समानता के नजरिए से भी पेरिस ओलंपिक ऐतिहासिक बन गया है. ओलंपिक इतिहास में ऐसा पहली बार है जब इस खेल महाकुंभ के आयोजन में पुरुष और महिला एथलीट बराबर की संख्या में हिस्सा ले रहे हैं. (एथेंस ओलंपिक, 1896 /फोटो - IOC)

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यही वजह है कि IOC ने 2024 के पेरिस खेलों को #जेंडरइक्वलओलंपिक नाम दिया है. इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि पुरुष और महिला एथलीटों की संख्या समान हो. इससे पहले साल 1924 में, ठीक सौ साल पहले, जब पेरिस ने दूसरी बार ओलंपिक की मेजबानी की थी, तो उसमें कुल 3000 से अधिक एथलीटों ने हिस्सा लिया था. लेकिन इनमें महिलाओं की संख्या महज 135 ही थी. यानी भागीदारी दर सिर्फ 4.4 फीसद के करीब. (पेरिस ओलंपिक-1900 के दौरान की एक तस्वीर, जिसमें महिलाएं गोल्फ खेलती नजर आ रही हैं/IOC)

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लेकिन ओलंपिक के प्राचीन इतिहास को देखें, तो पेरिस ओलंपिक 1924 में महिलाओं की हिस्सेदारी के आंकड़े फिर भी बेहतर नजर आते हैं. करीब 776 ईसा पूर्व, प्राचीन ग्रीस के ओलंपिया शहर में जब पहले ओलंपिक खेल का आयोजन हुआ था, तो उस समय इसे ग्रीक देवताओं, खासकर जियूस के लिए समर्पित कार्यक्रम माना गया. इन खेलों को मर्दानगी और वीरता के उत्सव के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता था. तत्कालीन ग्रीक समाज में पुरुषों को अत्यधिक महत्व दिया जाता था, जबकि महिलाओं पर तमाम तरह की पाबंदियां थोपी जाती थीं. (एंटवर्प ओलंपिक-1920 के दौरान एक खेल में संतुलन साधती महिला खिलाड़ी/IOC)

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एक अंग्रेजी वेबसाइट इबरड्रोला के मुताबिक, महिलाएं तब सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं ले सकती थीं, और इस मामले में ओलंपिक खेल भी कोई अपवाद नहीं थे. महिलाओं को इन खेल आयोजनों में प्रतियोगी, दर्शक या यहां तक कि देवताओं की पूजा करने वाली पुजारिन के रूप में भी भाग लेने की मनाही थी. केवल अविवाहित महिलाएं ही पुरुष दर्शकों के साथ ये खेल देख सकती थीं. बहरहाल, अब सीधे आते हैं आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत पर. (बैडमिंटन रैकेट के साथ एमली लैंग्लेन और मिसेज मैलोरी, पेरिस ओलंपिक 1924/IOC)

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साल 1896 में एथेंस में आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई थी. वरिष्ठ लेखक अशोक पांडे लिखते हैं, "आधुनिक ओलंपिक की आधिकारिक शुरुआत करने वाला फ्रेंच शिक्षाशास्त्री और इतिहासकार पियरे डी कुबर्तिन इन खेलों में महिलाओं की हिस्सेदारी के जरा भी पक्ष में नहीं था. मूल परिकल्पना यह थी कि दुनिया भर में गोरी चमड़ी वाले उच्चकुलीन युवाओं के लिए एक खेल-महोत्सव आयोजित हो. जिन पुरातन ग्रीक महोत्सवों से प्रेरित होकर कुबर्तिन ने ओलंपिक्स का खाका बनाया था, उनमें से ज्यादातर में स्त्रियों का भाग लेना वर्जित था." (सेंट मॉरिट्ज ओलंपिक-1928 के दौरान की तस्वीर/IOC)

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यही वजह रही होगी कि 1896 के पहले एथेंस ओलंपिक में एक भी महिला खिलाड़ी को भाग लेने का मौका नहीं मिला. लेकिन कुबर्तिन की इस नीति का विरोध हुआ तो अगले ओलंपिक में, (जो पहली बार पेरिस में आयोजित हुआ) महिलाओं को गोल्फ और टेनिस खेलने की इजाजत मिली. 1904 के पेरिस ओलंपिक में कुल 997 एथलीटों में से 22 महिलाओं ने हिस्सा लिया, जिनमें से अधिकतर अमीर घरों की सोशलाइट महिलाएं थीं. इधर, कुबर्तिन किसी भी कीमत पर महिलाओं को मुख्य खेलों का हिस्सा बनाने में इच्छुक नहीं था. (बर्लिन ओलंपिक-1936 के दौरान दो महिला तैराक की तस्वीर/IOC)

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अशोक पांडे लिखते हैं, "1912 के साल 'रिव्यू ओलंपिक' नाम की आधिकारिक पत्रिका में कुबर्तिन का एक लेख छपा, जिसमें उसने साफ लिखा था कि शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण खेलों में भाग लेने वाली औरतें अपने स्त्रियोचित सौंदर्य और कोमलता को तबाह कर लेती हैं." अन्य मीडिया रिपोर्ट्स में भी कुबर्तिन का यह स्त्री-विरोध सामने आता है. उसे खेलों में महिलाओं की भागीदारी भद्दी और अनुचित लगती थी. वह कहता था, "खेल पुरुष एथलेटिक क्षमता को बढ़ावा देने के लिए एक गंभीर और आवधिक उत्थान है, और महिलाएं पुरस्कार के रूप में पुरुषों के लिए तालियां बजाती हैं." (लंदन ओलंपिक-1948 के दौरान बाधा दौड़ पार करतीं महिला एथलीट/IOC)

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बहरहाल, IOC के आंकड़ों के मुताबिक, 1976 तक महिलाओं की ओलंपिक भागीदारी कुल प्रतियोगियों की संख्या के 20 फीसद से कम रही. लेकिन इसके बाद इनमें लगातार बढ़ोत्तरी हुई, और 2021 में टोक्यो में हुए ओलंपिक खेलों में यह करीब 48 फीसद जा पहुंचा. IOC ने पिछले तीन दशकों से खेलों में लैंगिक समानता को बेहतर बनाने के साथ-साथ अपनी समिति के भीतर कार्यकारी नेतृत्व में भी शानदार काम किया है. इसी क्रम में उसने साल 1996 में अपना ओलंपिक चार्टर अपडेट किया. (मेलबर्न ओलंपिक-1956 के दौरान हाथ में मशाल लिए दौड़ती एक महिला/IOC)

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ओलंपिक चार्टर 1996 के मुताबिक, "सभी स्तरों और सभी संरचनाओं में, खासकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों के कार्यकारी निकायों में" खेल में महिलाओं को बढ़ावा दिया जाएगा. IOC ने 1996 में ही खेल में महिलाओं पर अपना पहला विश्व सम्मेलन भी आयोजित किया, जिसका लक्ष्य 2000 तक निर्णय लेने वाले पदों पर कम से कम 10 फीसद महिलाओं को रखना और 2005 तक इसे बढ़ाकर 20 फीसद करना था. (पश्चिम जर्मनी की सोलह वर्षीय उलरिके मेफर्थ, म्यूनिख ओलंपिक-1972/IOC)

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महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से साल 1928 में एम्सटर्डम में आयोजित ओलंपिक को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. इसमें हिस्सेदारी के लिए करीब 300 महिला एथलीटों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया, जो कुल एथलीटों का 10 फीसद था. इसके अलावा उन्हें पहले के मुकाबले अधिक खेलों में भाग लेने की अनुमति मिली थी. 2004 में जब ओलंपिक एक बार फिर एथेंस में आयोजित हुआ, तो इसमें महिला एथलीटों की भागीदारी 40 फीसद से ऊपर जा पहुंची. लेकिन इस मामले में लंदन ओलंपिक 2012 को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें महिलाओं ने रिकॉर्ड भागीदारी सुनिश्चित की. (अटलांटा ओलंपिक-1996 के दौरान पानी में करतब दिखातीं युवतियां/IOC)

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लंदन ओलंपिक 2012 में कुल 10,568 एथलीटों ने भाग लिया था. इनमें 5892 पुरुष थे जबकि महिला एथलीटों की संख्या 4676 रही थी. अगली बार (2016 में) जब ब्राजील के रियो में ओलंपिक का आयोजन हुआ, तो यह एक शानदार रिकॉर्ड के लिए चर्चा में आया. इस ओलंपिक में महिला एथलीटों ने 44 फीसदी पदक अपनी झोली में डाले, जो अभी तक एक रिकॉर्ड है. साथ ही, यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि आज वे न सिर्फ मौजूद हैं, बल्कि यह भी कि वे उच्चतम स्तर पर उत्कृष्टता हासिल कर सकती हैं. (एथेंस ओलंपिक-2004 में वॉलीबॉल में गोल्ड मेडल जीतने के बाद भावुक चीन की महिला खिलाड़ी/IOC)

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पेरिस ओलंपिक 2024 में महिला एथलीटों की बराबरी की संख्या वाली लड़ाई पूरी हो गई है. इसी ओलंपिक से एथलीटों की सर्वाधिक संख्या की सीमा भी सुनिश्चित की गई है. दरअसल, टोक्यो 2020 में एथलीटों की संख्या लगातार बढ़कर 11 हजार से अधिक हो गई थी. तब IOC ने यह फैसला लिया कि अब ओलंपिक खेलों में 10,500 से अधिक एथलीट हिस्सा नहीं ले सकते. और इनमें भी अब आधे पुरुष एथलीट होंगे, जबकि आधी संख्या महिला एथलीटों की होगी. इसके अलावा इस साल के खेल कार्यक्रम में रोजाना आयोजित होने वाले महिला और पुरुष इवेंट की संख्या को भी संतुलित करने का काम किया गया है. (लंदन ओलंपिक-2012 में भारतीय मुक्केबाज मैरीकॉम ने कांस्य पदक जीता था/IOC)

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इधर भारत की ओर से स्टार शूटर मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक-2024 में इतिहास रच दिया है. वह ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली देश की पहली महिला निशानेबाज बन गईं हैं. पहले उन्होंने महिलाओं के व्यक्तिगत 10 मीटर एयर पिस्टल फाइनल में कांस्य पदक जीता. अब मनु ने 30 जुलाई को सरबजोत सिंह के साथ मिश्रित टीम 10 मीटर एयर पिस्टल फाइनल में भारत को एक और कांस्य पदक दिलाकर इतिहास रच दिया है. वे एक और कांस्य पदक जीतने के साथ ही एक ही ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली एथलीट बन गई हैं. उनसे पहले नॉर्मन प्रिचर्ड ने 1900 के खेलों के दौरान एथलेटिक्स में दो रजत पदक जीते थे. (स्टार शूटर मनु भाकर, आजादी के बाद एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी/एक्स)

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