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Homeवेब एक्सक्लूसिवफोटो गैलरीभारत का भविष्य बताने वाले 11 विशेषज्ञ

नए साल में भारत का भविष्य बता रहे हैं जाने-माने विशेषज्ञ

देश के जाने माने लोग बता रहे हैं भविष्य में क्या रहने वाली है सख्त चुनौतियां और कैसे उससे निबटना चाहिए

नए साल में भारत का भविष्य बता रहे हैं जाने-माने
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मुकुल केशवन, प्रोफेसर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया 

साल 2018 में सियासत 2019 के चुनावों को लेकर होगी. यह आम चुनाव से पहले वाले हर साल के बारे में सच है, पर मोदी और शाह चूंकि चुनाव अभियान के अंदाज में ही जीते हैं, इसलिए ऐसा इस साल और भी ज्यादा होने की संभावना है. केंद्र सरकार की हरेक नीति उसके चुनावी असर और नतीजों की रोशनी में पढ़ी जाएगी और सांस्कृतिक युद्ध की हरेक चाल—स्वयंभू गोरक्षक, अयोध्या, लव जेहाद, घर वापसी—हिंदुओं के जनसांख्यिकी बहुमत को विशाल सियासी धड़े में बदलने और संघ परिवार के घोषित लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की चुनावी बुनियादें रखने की कोशिश के तौर पर देखी जाएगी.

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अंबरीश सात्विकः वैस्क्युलर सर्जन और लेखक

शहरी भारत में होने वाले पहले गर्भधारण के करीब एक तिहाई बच्चों का जन्म, अब सिजेरियन ऑपरेशन से ही होता है. गलत तरीके से जुड़े हुए गर्भनाल की समस्या जो 1930 के दशक में 30,000 गर्भधारण में से एक गर्भ में हुआ करती थी. वह बढ़ती हुई पिछले दशक तक हर 2,000 से 3,000 गर्भधारण में से एक की हो चुकी है जब गर्भनाल का गलत तरीके से जुड़ा होना बताया जाता है. इनमें से करीब 50 प्रतिशत सिजेरियन ऑपरेशन तो ऐच्छिक होते हैं जो डॉक्टरों की सलाह पर नहीं बल्कि माता के अनुरोध पर किए जाते हैं.पांच में से कम से कम एक ऐच्छिक सिजेरियन ऑपरेशन तो ऐसा होता ही है जब ऑपरेशन के सही समय का निर्णय डॉक्टर नहीं बल्कि ज्योतिषी करते हैं. इस पर आस्था रखने वालों के लिए स्त्री के गर्भ में स्थापित भ्रूण, भौतिक विज्ञानी ''श्रोडिंगर की बिल्ली' का थोड़ा संशोधित हिंदू संस्करण जैसा ही है. लेकिन इस संस्करण के पीछे कोई निश्चित सिद्धांत या तर्क मौजूद नहीं.

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के.टी.एस. तुलसीः सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील

अगर 2017 नागरिकों की निजता से लेकर तीन तलाक के मुद्दे तक ऐतिहासिक फैसलों का साल था, तो नया साल भी पक्के तौर पर कम उम्मीदों से भरा नहीं होगा. तमाम नजरें देश की सबसे ऊंची अदालत पर टिकी हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट के सामने 2018 में एक बड़ा मुद्दा यह होगा कि औरत भी व्यभिचार की दोषी होगी या नहीं. सबसे ज्यादा इंतजार शायद इस फैसले का है कि आधार को बैंक खातों और मोबाइल फोन से जोड़ा जाए या नहीं, खासकर इस मीडिया रिपोर्ट की रोशनी में कि डेटा सुरक्षित नहीं है

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सारंग शिदोरेः विजिटिंग स्कॉलर, टेक्सास विश्वविद्यालय

नए साल में अच्छी खबर है कि अक्षय ऊर्जा में भारत की स्थापित क्षमता नवंबर 2017 में 62 गीगावाट (जीडब्ल्यू) के स्तर को पार कर गई. यह भारत की कुल विद्युत क्षमता 333 जीडब्ल्यू के 19 फीसदी के बराबर है. कुल 62 गीगावाट की अक्षत बिजली में से 16.6 गीगावॉट सौर ऊर्जा से है. सौर ऊर्जा को भारत की सफलता की सबसे बड़ी कहानियों में माना जा सकता है जिसमें जमीनी स्तर पर मिले नतीजे कुछ सालों से उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर हैं. मॉड्यूल की कीमतों में पिछले आठ साल में 70 फीसदी गिरावट आई है और बाकी 'प्रणाली संतुलन' की कीमतें भी माप की अर्थव्यवस्था और बेहतर समझ के कारण नीचे आई हैं.

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टी.सी.ए. राघवनः पाकिस्तान में भारत के पूर्व-उच्चायुक्त
पाकिस्तान का बाहरी वातावरण प्रतिकूल ही है
, भारत और अफगानिस्तान के साथ उसके रिश्तों में उथल-पुथल जगजाहिर है. सऊदी अरब और ईरान के बीच और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों के बीच खींचतान एक और अनिश्चितता का धु्रव बना रही है. लेकिन सबसे नाटकीय बदलाव तो अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में आया है. राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में पाकिस्तान की अफगान और भारत नीतियों तथा आतंकवादी संगठनों को उसकी ओर से दिए जाने वाले संरक्षण को अमेरिका ने सख्ती से नामंजूर कर दिया है और उस पर दबाव भी बढ़ाया है. राष्ट्रपति ने 2018 के अपने पहले ट्वीट से न केवल 2017 का सार पेश किया, बल्कि यह खाका भी पेश किया कि आगे क्या होने जा रहा है. 2017 में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया यह रही कि सार्वजनिक तौर पर अक्खड़पन दिखाते हुए खामोश राजनयिक प्रयासों से अफगानिस्तान में अमेरिकी अपेक्षा कम से कम आधी ही पूरी हो जाए. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के नवीनतम आक्षेप से तो ऐसा लगता है कि यह रवैया भी कारगर नहीं हुआ.

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प्रशांत के. रॉयः पूर्व पत्रकार

2019 की जंग का मैदानः एक साल पहले हिंदुस्तान के महा चुनाव का तीखा और सरगर्म मुकाबला डिजिटल मीडिया पर छिड़ जाएगा, जिसमें ज्यादातर भिडंत व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक पर होंगी. इन भिड़ंतों और कार्रवाइयों में फेक न्यूज, ट्रोल फौजें, धुर-राष्ट्रवाद और वे तमाम आजमाए हुए तरीके भी शामिल होंगे, जिन्होंने 2017 में दक्षिणपंथ को अमेरिका और हिंदुस्तान सहित हमारे छोटे-से ग्रह पर उभरने और फूलने-फलने में मदद की थी. ये भिड़तें पूरे सियासी फलक के इर्दगिर्द होंगी, जिसमें पिछले पांच साल में हमेशा की तरह सत्ताधारी पार्टी की डिजिटल ताकत के खिलाफ जद्दोजहद करता हमारा कमजोर विपक्ष होगा. 2018 में चुनाव-पूर्व हिंदुस्तान पर जबरदस्त ध्यान देने वालों में फेसबुक होगा, जिसके पास दुनिया भर में अपने प्लेटफॉर्मों पर सियासी दलों को प्रशिक्षण देने वाली समर्पित टीमें हैं. इनमें ट्विटर भी होगा, जिसके वैश्विक यूजर की तादाद और राजस्व में बढ़ोतरी पिछले साल धीमी पड़ गई और जिनके लिए हिंदुस्तान बेहद अहम है.

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जहांगीर अजीजः चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकॉनोमिस्ट, जेपी मोर्गन

हिंदुस्तान की मौजूदा आर्थिक सुस्ती को लेकर सबसे प्रमुख अफसाना दो लफ्जों में बयान किया जा सकता हैः बेमौके फैसले! ठीक उस वक्त जब वैश्विक अर्थव्यवस्था 2010 से बारी-बारी से आने वाले अपने सबसे मजबूत दौर में दाखिल हुई, हिंदुस्तान को एक के बाद एक नीतिगत फैसलों—नोटबंदी, माल और सेवा कर की शुरुआती दिक्कतों और बैंकों के डूबत कर्ज को नई शक्ल देने—के दुखद नतीजों में झोंक दिया गया. इन फैसलों ने घरेलू सप्लाई चेन को कुछ वक्त के लिए तहस-नहस कर दिया. इनका असर फीका पड़ते ही वैश्विक ज्वार हिंदुस्तान को उठाकर ज्यादा ऊंची विकास दर पर ले जाएगा. इस बीच सुधारों को जारी रखते हुए कारोबार करने की लागत को आसान बनाने पर ध्यान देना जारी रखना चाहिए, वहीं समायोजन का बोझ हल्का करने के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियां छोटे वक्त की राहत मुहैया करवाने वाली होनी चाहिए. लिहाजा नीतिगत ब्याज दरों में कटौती, कहीं ज्यादा कमजोर मुद्रा और मौजूदा तथा अगले साल ज्यादा राजकोषीय घाटा बर्दाश्त करना वक्त का तकाजा है. निजी निवेश की बुरी हालत को देखते हुए राजकोषीय विस्तार की नीति का लक्ष्य बुनियादी ढांचे पर खर्च में बढ़ोतरी और निचले और मध्यम आमदनी के आवासों के लिए सब्सिडी होना चाहिए. मगर जब चुनाव मुंहबाए खड़े हों, तब किसानों को भी कुछ सहायता अलग से दी जा सकती है.

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इरीना विट्टलः शहरीकरण और कृषि विशेषज्ञ

असमानता पर नई दिल्ली में होने वाली नीतिगत बहसें गरीबी, लगातार गिरते गिनी सूचकांक ('भारतीय आय असमानता, 1922- 2014'' लुकास चांसेल और थॉमस पिकेट्टी) पर केंद्रित होती हैं या फिर इस पर कि कैसे ऊपर के 1 फीसदी लोगों ने राष्ट्रीय आमदनी के 22 फीसदी हिस्से पर कब्जा जमाया हुआ है जबकि निचले आधे हिस्से के खाते में सिर्फ 15 फीसदी आता है. (विश्व असमानता रिपोर्ट 2017). लेकिन सड़क पर जुलूस-जलसे में उतरे लोग  गैर-बराबरी को अवसरों की असमानता के रूप में देखते हैं. यह बात वाकई पते की लगती है. सालाना महज 1,710 डॉलर की प्रति व्यक्ति आय (जबकि अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 57,000 डॉलर और चीन में 8,100 डॉलर है) से साफ संकेत मिलता है कि अभी हमें विकास की दिशा में लंबा सफर तय करना है. हमारी असली संपदा यानी 18 साल से कम उम्र के 45 करोड़ नागरिकों को अभी अपने सफर की शुरुआत करनी है. उनके लिए (बाजार, सेवाओं और स्थान के मामले में) बढ़ते मौकों तक उनकी पहुंच की मात्रा ही गैर-बराबरी मापने का पैमाना हो सकती है. लेकिन, जब ज्यादातर जानकार जोरशोर से दावा कर रहे हैं कि 10 फीसदी की आर्थिक विकास दर से हमारी सारी दिक्कतें छू मंतर हो जाएंगी, तो भला गैर-बरारबरी पर चिंता करने की जरूरत क्या है?

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गौतम भानः इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट, बेंगलूरू में फैकल्टी सदस्य

मरम्मत और पुनर्संयोजन को महत्व देने से 'ढांचा' शब्द के साथ हमारा रिश्ता बदलने में मदद मिल सकती है जिसके बाद हमारी सोच केवल चमचमाती डिजिटल ड्राइंगों, वीरान जमीनों, बुलेट ट्रेनों, एक्सप्रेसवे और शीशे की इमारतों तक सीमित नहीं रह जाती. इसकी जगह हम उन लोकल ट्रेन स्टेशनों के धीमे विकास के बारे में बात कर सकते थे जिनके पुलों की समय रहते जांच करके उनकी मरम्मत की जा सकती थी, एक ऐसी हाउसिंग कॉलोनी की बात कर सकते थे जिनमें वे भूमिगत नाले होते, ऐसे बाजार होते जहां लाइसेंस देकर नए तंबू लगाए जा सकते थे और उनमें दुकानदारों की जगह दी जा सकती थी, कारों की पार्किग के लिए जगह बनाते हुए ऐसे फुटपाथ बनाए जा सकते थे जहां दुकानदार और पैदल चलने वाले, दोनों के लिए जगह होती. हम अपनी मौजूदा सेवा व्यवस्थाओं—स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन हो, पानी या स्वच्छता—के बारे में सोच सकते थे कि उन्हें एक-दूसरे से कैसे जोड़ा जा सकता है. ऐसा करके हम उन सभी तरीकों पर विचार कर सकते थे जिनसे हमारे शहरों में सभी घरों को पानी—टैंकर, साझीदारे वाली पाइप, सामुदायिक स्टैंड-पोस्ट, निजी कनेक्शन, पानी की मुख्य लाइनें, जुगाड़ू कनेक्शन और 'रिसाव'-मिल सकता, न कि हमारी बड़ी-बड़ी कागजी योजनाओं के अनुरूप. ऐसा करने का अर्थ होता कि आज भी हमारी समस्याओं का समाधान स्मार्ट शहर नहीं बल्कि एएमआरयूटी (अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन ऐंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन) है. यह ज्यादा चमक-दमक वाली तो नहीं लेकिन समस्याओं की जड़ से जुड़ी योजना है.

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बर्टिल लिंटनरः फार इस्टर्न इकॉनोमिक रिव्यू के पूर्व संवाददाता, लेखक


यह मायने नहीं रखता कि नेहरू ने 1959 में सिक्किम और तिब्बत के बीच सीमा विवाद के बारे में क्या कहा था. फिर यह झमेला क्यों? शायद चीन के लिए बात सिर्फ सीमा या किसी सड़क की नहीं है. यह बात साफ होती जा रही है कि यह चीन का एक राजनीतिक कदम था, भारत और भूटान के बीच खाई बनाने की कोशिश. चीन ने कभी यह दावा नहीं किया था कि 'शताब्दियों से' अपने कथित कब्जे वाले इस इलाके में वह सड़क बनाएगा. सच तो यह है कि संवेदनशील निर्माण की बात उस वक्त सामने आई जब चीन पड़ोसी देश भूटान से पींगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा था, एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश जिसके साथ चीन का अभी तक राजनयिक संबंध नहीं बन पाया है.

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अंजा कोवाक्सः दिल्ली में इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट चलाती हैं

ऐसी खबरें हैं कि आधार के डेटा की चोरी हो रही है और आधार नंबर का अनधिकृत इस्तेमाल हो रहा है और इसके इस्तेमाल से बैंक खाते से फर्जी तरीके से धन निकाल लिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट में आधार पर आगे सुनवाई लंबित है. हो सकता है कि यह इस मामले में अंतिम सुनवाई हो. लेकिन कितनी राहत मिलेगी, यह साफ नहीं है और यह भी तय मानकर नहीं चलना चाहिए कि फैसला सकारात्मक ही होगा.

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जाइल्स टोलोटसनः कला इतिहासकार और लेखक

साल 2018 के लिए मेरा अंदेशा यही है कि सार्वजनिक रूप से हमें निरंतर तेज होते प्रतिगामी स्वर और भारतीय विरासत की अनिवार्य परिभाषा सुनने को मिलेगी, ऐसे लोगों के मुंह से जो उन्हें अतीत की बहुलता को सुधारने के लिए जरूरी मानते हैं. इस तरह की आवाजों को कम से कम विरोध झेलना पड़ेगा. हालांकि 2018 के बारे में मेरी उम्मीद यही है कि विरासत के विशेषज्ञ स्मारकों और स्थलों के निरंतर विस्तृत होते दायरों से संवाद बनाएंगे, बगैर उनके मूल या तारीख की परवाह किए. और लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप वे यह भी सीखेंगे कि कैसे आम लोगों को साथ लेकर चलें.

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