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Homeवेब एक्सक्लूसिवफोटो गैलरीचुनावी भाषण से रैली तक, अमिताभ बच्चन के सियासी सफर की तस्वीरें

चुनावी भाषण से रैली तक, अमिताभ बच्चन के सियासी सफर की तस्वीरें

सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन राजनीतिक अखाड़े में भी अपनी ताकत आजमा चुके हैं. वे इलाहाबाद से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद बने लेकिन 3 साल बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया और राजनीति से भी दूर हो गए. लेकिन सियासी गलियारे के बड़े नामों के साथ अमिताभ बच्चन का रिश्ता हमेशा बना रहा. इन रिश्तों में जब-तब दूरियां भी आईं.

चुनावी भाषण से रैली तक, अमिताभ बच्चन के सियासी पारी की तस्वीरें
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एंग्री यंग मैन और सदी के महानायक जैसे खिताबों से नवाजे जा चुके अमिताभ बच्चन आज अपना 81वां जन्मदिन मना रहे हैं. जन्मदिन के मौके पर अमिताभ बच्चन की आवाज़ से अंदाज़ तक पर बातचीत हो रही है. लेकिन उनके जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा जिसकी चर्चा नहीं हो रही है वो राजनीति है. फिल्मी पर्दे पर 'शहंशाह' बनने से पहले बच्चन ने एक 'याराना' निभाया और माननीय सांसद बने.

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बच्चन परिवार और देश की सत्ता में लंबे समय तक काबिज रहे गांधी परिवार की खूब बनती थी. राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन काफी करीबी दोस्त थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और लोकसभा चुनाव की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली. राजीव ही अमिताभ को फिल्मी दुनिया से राजनीति के अखाड़े में ले आए. कांग्रेस ने उन्हें इलाहाबाद की लोकसभा सीट से टिकट दिया.

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अमिताभ बच्चन को टिकट मिला तो चर्चा थी कि वो चुनाव बुरी तरह से हार जाएंगे क्योंकि उनके सामने थे कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा. हेमवंती नंदन बहुगुणा रहने वाले थे उत्तराखंड के. इसे लेकर अमिताभ ने चुनाव प्रचार के दौरान एक जुमला उछाला- 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है.' जो कि 1981 में अमिताभ बच्चन की आई फिल्म लावारिस के गाने की लाइन थी

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इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन के चुनाव प्रचार के लिए जया बच्चन भी पहुंची. इस चुनाव को कवर करने वाली पत्रकार कुमकुम चड्ढा बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि अमिताभ की हार तय थी. लेकिन चुनाव का रुख बदला जया बच्चन के प्रचार से. जया ने चुनाव प्रचार में इलाहाबाद को अपना ससुराल बताया और 'भाभी-देवर' और 'मुंह दिखाई' देने वाले जुमले बोले. कहते हैं इसने एक बड़ी आबादी पर भावनात्मक असर डाला.
 

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चुनाव के नतीजे आए तो हेमवंती नंदन बहुगुणा हैरत में थे. अमिताभ बच्चन ने 1 लाख 87 हजार के रिकॉर्ड अंतर से उन्हें चुनाव हरा दिया था. इस हार का सदमा ऐसा था कि हेमवंती नंदन बहुगुणा ने राजनीति से संन्यास ले लिया. लेकिन ये ऐतिहासिक जीत अमिताभ को भी रास नहीं आई. जल्द ही उनका नाम विवादों में घिर गया. वजह बना बोफोर्स घोटाला.

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साल 1987 में राजीव गांधी के साथ बोफोर्स घोटाले में अमिताभ बच्चन का नाम भी घसीटा जाने लगा. स्वीडन के अखबारों ने इस कथित घोटाले में अमिताभ बच्चन को भी शामिल बताया था. हालांकि बाद में ये आरोप गलत साबित हुए. बोफोर्स में क्लीन चिट मिलने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था, 'जब बोफोर्स घोटाले में मेरी फैमिली और मुझ पर आरोप लगे तो हमारी लाइफ के हर पहलू को काले स्याह रंगों में पेश किया गया. 25 साल बाद प्रॉसिक्युटर सच को सामने लेकर आए." इस विवाद के बाद 1987 में अमिताभ ने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. 

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भले ही 1987 में अमिताभ बच्चन ने राजनीति से खुद को दूर कर लिया लेकिन सियासी मंचों पर उनकी उपस्थिति बाद में भी देखी गई. मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह सरीखे नेताओं के काफी करीब थे. अमर सिंह को अमिताभ अपना भाई मानते थे. तो वहीं मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुए अमिताभ बच्चन को यूपी का ब्रांड एंबेसेडर बनाया, हालांकि बाद के दिनों में इन तीनों के रिश्ते बेहद खराब दौर से गुजरे.

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अपनी राजनीतिक पारी को लेकर अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था, "ये एक भावनात्मक फैसला था. राजीव गांधी और हमारे परिवार के बीच काफी दोस्ताना था. जिसकी वजह से मैं सियासत में उतरा. लेकिन हमेशा ही मैं इसमें असहज रहा. देखा जाए तो राजनीति में उतरना मेरी सबसे बड़ी भूल थी."

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