स्मार्ट मीटर पर योगी सरकार के यू-टर्न ने कंज्यूमर को फिर फंसा दिया!

जनता के विरोध के बाद योगी सरकार ने प्रीपेड स्मार्ट मीटर हटाए, लेकिन पोस्टपेड व्यवस्था अनिवार्य कर उपभोक्ताओं की पसंद का सवाल फिर खड़ा कर दिया

स्मार्ट मीटर को लेकर बवाल
स्मार्ट मीटर के खिलाफ आम लोग लंबे अरसे से विरोध प्रदर्शन कर रहे थे

उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड बिजली मीटर को लेकर पिछले डेढ़ साल से चल रही सरकारी मुहिम आखिरकार राजनीतिक, प्रशासनिक और जनदबाव के आगे झुकती दिख रही है. योगी सरकार ने जिस योजना को बिजली सुधारों की बड़ी उपलब्धि और डिस्कॉम्स के घाटे को कम करने का सबसे असरदार हथियार बताया था, उसी पर अब उसे यू-टर्न लेना पड़ा है. 

सरकार ने न सिर्फ सभी स्मार्ट प्रीपेड मीटरों को फिर से पोस्टपेड मोड में बदलने का फैसला किया है, बल्कि नए बिजली कनेक्शन भी अब केवल पोस्टपेड मीटर के जरिए देने की घोषणा कर दी है. यह फैसला सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि उस पूरी नीति पर सवाल खड़े करता है जिसके तहत राज्य में तेजी से प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाए गए थे. 

अब बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि क्या सरकार ने शुरुआत में उपभोक्ताओं की पसंद और व्यवहारिक दिक्कतों को नजरअंदाज किया, और क्या अब विरोध के दबाव में लिया गया फैसला भी उतना ही एकतरफा है.

दरअसल, स्मार्ट मीटर योजना की शुरुआत बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने, लाइन लॉस घटाने, बिलिंग में पारदर्शिता लाने और बकाया वसूली सुधारने के मकसद से हुई थी. उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) का दावा था कि प्रीपेड मॉडल से उपभोक्ता अपने बिजली खर्च पर बेहतर नियंत्रण रख सकेंगे और डिस्कॉम्स को समय पर राजस्व मिलेगा. इसके पीछे केंद्र सरकार की स्मार्ट मीटरिंग नीति और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के 2022 के रेगुलेशन का हवाला दिया गया. 

उत्तर प्रदेश बिजली उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष और केंद्रीय बिजली सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश वर्मा के मुताबिक, राज्य सरकार ने CEA के उस प्रावधान की ऐसी व्याख्या की, जिसमें कम्युनिकेशन नेटवर्क वाले इलाकों में “प्रीपेमेंट मोड” वाले स्मार्ट मीटर से बिजली आपूर्ति की बात कही गई थी. इसी आधार पर राज्य सरकार ने नए कनेक्शनों में प्रीपेड मीटर को डिफॉल्ट बना दिया और पुराने पोस्टपेड मीटरों को भी प्रीपेड में बदलने का अभियान शुरू कर दिया.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में अब तक करीब 85 से 86 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें लगभग 80 लाख को प्रीपेड मोड में बदला जा चुका था. लेकिन जैसे-जैसे यह अभियान आगे बढ़ा, वैसे-वैसे इसके खिलाफ असंतोष भी बढ़ता गया. सबसे बड़ी शिकायत थी कि उपभोक्ताओं को बिना स्पष्ट सहमति के प्रीपेड व्यवस्था में धकेला जा रहा है. कई लोगों ने आरोप लगाया कि मीटर लगने के बाद बिजली बिल अचानक बढ़ गए, बैलेंस खत्म होते ही बिजली कट जाती थी और रिचार्ज तथा कटौती की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं थी. 

ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में तकनीकी दिक्कतें भी सामने आईं. कई उपभोक्ताओं का कहना था कि उन्हें यह तक समझ नहीं आ रहा था कि बैलेंस कैसे घट रहा है और बिजली कब कट जाएगी. स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कई जिलों में लोगों ने खुले तौर पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए. कुछ जगहों पर लगाए गए स्मार्ट मीटर उखाड़े गए और बिजली विभाग की टीमों का विरोध हुआ. शुरू में सरकार और विभाग ने इन शिकायतों को राजनीतिक रूप से प्रेरित या भ्रामक प्रचार बताया, लेकिन विरोध लगातार बढ़ता गया.

यहीं से सरकार की रणनीति कमजोर पड़ने लगी. उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने भी इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया. आयोग ने बिजली कंपनियों से पूछा कि प्रीपेड व्यवस्था में उपभोक्ताओं को समय पर बिजली बहाल क्यों नहीं की जा रही है. 23 अप्रैल के आदेश में आयोग ने कहा कि तय दो घंटे के भीतर सिर्फ 77 प्रतिशत मामलों में ही बिजली दोबारा चालू हो पाई, जबकि लक्ष्य 95 प्रतिशत था. आयोग ने यहां तक पूछा कि UPPCL पर प्रतिदिन एक लाख रुपए का जुर्माना क्यों न लगाया जाए. इस बीच संसद में केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर का बयान भी उत्तर प्रदेश सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाला साबित हुआ. खट्टर ने साफ कहा कि प्रीपेड स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं हैं और उपभोक्ताओं को विकल्प मिलना चाहिए. इसके कुछ समय बाद CEA ने अपने संशोधित नोटिफिकेशन में “प्रीपेमेंट मोड” की अनिवार्यता हटा दी. नए नियम में केवल मानक अनुरूप स्मार्ट मीटर लगाने की बात कही गई.

यानी जिस कानूनी और नीतिगत आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार अपनी पूरी रणनीति चला रही थी, वही कमजोर पड़ गया. इसके बाद सरकार के पास पीछे हटने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचा. सरकार ने पहले चरण में 19 अप्रैल को राहत उपायों की घोषणा की. तकनीकी समिति की समीक्षा पूरी होने तक नए स्मार्ट मीटर लगाने पर रोक लगाई गई. 2 किलोवॉट तक के उपभोक्ताओं के लिए 200 रुपए तक के नेगेटिव बैलेंस पर बिजली न काटने की बात कही गई. नए उपभोक्ताओं को 45 दिन की “नो डिस्कनेक्शन” अवधि दी गई और पांच स्तरीय SMS अलर्ट सिस्टम लागू किया गया. रविवार और छुट्टियों में बिजली न काटने का भी फैसला हुआ. लेकिन इससे जनाक्रोश शांत नहीं हुआ. 24 अप्रैल को सरकार को दूसरी बार पीछे हटना पड़ा. 1 किलोवॉट तक के उपभोक्ताओं के लिए 30 दिन तक बिजली न काटने की घोषणा की गई, जबकि 2 किलोवॉट तक वालों को 200 रुपए बकाया होने पर भी सप्लाई जारी रखने की बात कही गई. 

इसके बावजूद विपक्ष ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाना शुरू कर दिया. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसे “उपभोक्ता विरोधी नीति” करार दिया. विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है और सरकार किसी ऐसे मुद्दे को लंबा खींचने के जोखिम में नहीं दिखी जो सीधे करोड़ों घरेलू उपभोक्ताओं से जुड़ा हो. जानकारी के मुताबिक अगर यह विवाद और बढ़ता तो अदालतों या रेगुलेटरी संस्थाओं से सख्त आदेश आ सकते थे. ऐसे में सरकार ने 4 मई को बड़ा फैसला लेते हुए सभी प्रीपेड मीटरों को पोस्टपेड में बदलने और नए कनेक्शन सिर्फ पोस्टपेड मोड में देने का निर्णय कर लिया.

हालांकि, यह फैसला भी अपने साथ कई सवाल लेकर आया है. सबसे बड़ा सवाल उपभोक्ता की पसंद का है. इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 47(5) के मुताबिक, अगर कोई उपभोक्ता प्रीपेड मीटर चुनता है तो वितरण कंपनी उससे सिक्योरिटी नहीं मांग सकती. UPERC ने भी अपने आदेश में माना था कि कानून की भाषा उपभोक्ताओं को प्रीपेड और पोस्टपेड के बीच विकल्प देती हुई प्रतीत होती है. यानी पहले सरकार ने प्रीपेड को अनिवार्य बनाकर उपभोक्ता की पसंद सीमित की और अब पोस्टपेड को अनिवार्य बनाकर वही गलती दोहराने का आरोप झेल रही है. 

ऊर्जा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि असली मुद्दा “प्रीपेड बनाम पोस्टपेड” नहीं, बल्कि “चॉइस” का है. उनके मुताबिक, कई उपभोक्ता ऐसे भी हैं जो प्रीपेड व्यवस्था पसंद करते हैं क्योंकि इससे बिजली खर्च पर नियंत्रण रहता है और समय पर भुगतान पर छूट जैसे फायदे मिलते हैं. UPPCL के निदेशक (कमर्शियल) प्रशांत कुमार वर्मा ने भी माना कि विभाग को ऐसे उपभोक्ताओं के फोन आ रहे हैं जो प्रीपेड कनेक्शन बनाए रखना चाहते हैं. वर्मा के मुताबिक प्रीपेड मीटर में बिल पर 2 प्रतिशत तक की छूट और खर्च नियंत्रण जैसी सुविधाएं हैं लेकिन सरकार के निर्देशों के मुताबिक फिलहाल सभी मीटर पोस्टपेड में बदले जाएंगे. 

अब सवाल यह है कि इस फैसले से उपभोक्ताओं को क्या फायदा और नुकसान होगा. पोस्टपेड व्यवस्था में सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि उपभोक्ताओं को बैलेंस खत्म होने के डर से अचानक बिजली कटने की आशंका नहीं रहेगी. गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह राहत बड़ी मानी जा रही है, क्योंकि कई बार आर्थिक तंगी या तकनीकी कारणों से समय पर रिचार्ज नहीं हो पाता था. ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान और नेटवर्क की दिक्कतें भी समस्या बन रही थीं. दूसरा फायदा यह होगा कि उपभोक्ताओं को महीने भर बिजली इस्तेमाल करने के बाद भुगतान करने का समय मिलेगा. इससे नकदी प्रबंधन आसान होगा और परिवारों पर तत्काल आर्थिक दबाव कम पड़ेगा. 

लेकिन नुकसान भी कम नहीं हैं. प्रीपेड सिस्टम में उपभोक्ता रियल टाइम में बिजली खर्च देख सकता था, जिससे खपत नियंत्रित रखने में मदद मिलती थी. पोस्टपेड में यह अनुशासन कम हो सकता है. डिस्कॉम्स के लिए भी बकाया वसूली फिर चुनौती बन सकती है. उत्तर प्रदेश की बिजली कंपनियां पहले ही हजारों करोड़ रुपए के बकाये से जूझ रही हैं. पावर सेक्टर विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी रूप से स्मार्ट मीटर व्यवस्था गलत नहीं थी, लेकिन उसका क्रियान्वयन खराब रहा. अगर उपभोक्ताओं को विकल्प दिया जाता, सिस्टम अधिक भरोसेमंद होता और शिकायत निवारण मजबूत होता, तो विरोध इतना तीखा नहीं होता. यूपी में बिजली विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी रामज्ञा तिवारी कहते हैं कि स्मार्ट मीटरिंग का मूल उद्देश्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है. भविष्य में भी बिजली क्षेत्र में डिजिटलीकरण और स्मार्ट बिलिंग की दिशा में काम जारी रहेगा. लेकिन अब सरकार को यह समझना होगा कि तकनीकी सुधार केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं चलते, बल्कि उपभोक्ता के भरोसे और सहमति से सफल होते हैं.

योगी सरकार के लिए यह पूरा प्रकरण एक राजनीतिक सबक भी माना जा रहा है. जिस योजना को सुधारवादी कदम के रूप में पेश किया गया था, वही चुनावी साल में जन असंतोष का कारण बन गई. सरकार ने समय रहते कदम पीछे खींचकर तत्काल राजनीतिक नुकसान को सीमित करने की कोशिश जरूर की है, लेकिन इस पूरे विवाद ने यह सवाल छोड़ दिया है कि क्या नीतियां बनाते समय उपभोक्ता हितों और जमीनी वास्तविकताओं को पर्याप्त महत्व दिया गया था. फिलहाल सरकार का यू-टर्न लोगों का गुस्सा शांत कर सकता है, लेकिन इससे बिजली क्षेत्र की नीति निर्माण प्रक्रिया, नियामकीय स्पष्टता और उपभोक्ता अधिकारों पर नई बहस जरूर शुरू हो गई है.

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