संघ के साथ समन्वय बैठकों से क्या BJP फिर साध पाएगी यूपी का चुनावी गणित?

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में संघ, सरकार और BJP संगठन के बीच समन्वय बैठकों की नई कवायद शुरू हो गई है

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संघ प्रमुख मोहन भागवत और सीएम योगी आदित्यनाथ की केमिस्ट्री (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी करीब एक साल दूर हों, लेकिन ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपना होमवर्क पूरा करने में जुट गया है. संघ का फौरी फोकस संगठन और सरकार के साथ बेहतर समन्वय बनाने को लेकर है. इसी समन्वय में आई दरार के चलते भारतीय जनता पार्टी (BJP) की चुनावी गाड़ी 2024 के लोकसभा चुनाव में पटरी से उतर गई थी.

इसी रणनीति के तहत पिछले कुछ हफ्तों से प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में संघ और BJP के बीच समन्वय बैठकों की एक पूरी श्रृंखला चल रही है. इन बैठकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश BJP अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह लगातार हिस्सा ले रहे हैं, जबकि संघ के क्षेत्रीय और प्रांत स्तर के प्रचारक भी इसमें मौजूद हैं.

राजनीतिक विश्लेषक इन बैठकों को सिर्फ नियमित संगठनात्मक संवाद नहीं मानते, बल्कि 2027 के चुनावों से पहले BJP की चुनावी रणनीति का शुरुआती खाका बताते हैं. दिलचस्प बात यह है कि BJP और संघ के बीच इस तरह की समन्वय बैठकें नई नहीं हैं. 2018 में, यानी 2019 के लोकसभा चुनाव से एक साल पहले, इसी तरह का संवाद अभियान चलाया गया था. इसके बाद 2021 में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी यही मॉडल अपनाया गया. दोनों चुनावों में BJP को बड़ी सफलता मिली.

छह क्षेत्रों में संवाद की कवायद

होली के तुरंत बाद इन बैठकों की गति और तेज हो गई. पांच मार्च को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गाजियाबाद में पश्चिम क्षेत्र की समन्वय बैठक में शामिल हुए. इसके बाद छह मार्च को कानपुर और सात मार्च को आगरा में ब्रज क्षेत्र की बैठक हुई. इससे पहले वाराणसी और गोरखपुर क्षेत्रों में भी इसी तरह की बैठकें आयोजित की जा चुकी थीं. प्रदेश में संघ का संगठनात्मक ढांचा छह प्रांतों में बंटा हुआ है- पश्चिम, ब्रज, अवध, काशी, गोरक्ष और कानपुर-बुंदेलखंड.

इन प्रांतों के अंतर्गत कई जिले आते हैं और संघ के अधिकांश जमीनी कार्यकर्ता इन्हीं संरचनाओं के माध्यम से काम करते हैं. संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक इन बैठकों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार को सीधे जमीनी हालात की जानकारी मिलती है. आमतौर पर शासन और प्रशासन के बीच कई स्तर होते हैं, जिनसे गुजरते हुए फीडबैक कई बार बदल भी जाता है या फ़िल्टर हो जाता है. लेकिन इन बैठकों में संघ के कार्यकर्ता, BJP के स्थानीय पदाधिकारी और कभी-कभी जनप्रतिनिधि सीधे मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखते हैं. इससे सरकार को यह समझने में आसानी होती है कि ज़मीन पर किस तरह के मुद्दे उठ रहे हैं और किस तरह की नाराज़गी या अपेक्षाएँ मौजूद हैं.

‘ट्रिपल एस’ मॉडल की वापसी

राजनीतिक हलकों में इन बैठकों को BJP के तथाकथित “ट्रिपल एस मॉडल” की वापसी के रूप में भी देखा जा रहा है. यह मॉडल सरकार, संगठन और संघ के तीन स्तंभों पर आधारित माना जाता है. संघ विचारधारा और अनुशासित कैडर नेटवर्क देता है. BJP का संगठन चुनावी लामबंदी और राजनीतिक रणनीति संभालता है. जबकि सरकार अपने कामकाज और योजनाओं के आधार पर जनता के बीच संदेश पहुंचाती है. जब ये तीनों एक दिशा में काम करते हैं तो BJP की चुनावी मशीनरी काफी प्रभावी मानी जाती है.

2014 के बाद BJP की कई चुनावी सफलताओं में इस मॉडल की भूमिका को लेकर अक्सर चर्चा होती रही है. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कुछ विश्लेषकों ने यह भी कहा कि संघ कैडर की सक्रियता पहले जैसी नहीं दिखी. यही वजह है कि अब इन बैठकों के जरिए उस तालमेल को दोबारा मजबूत करने की कोशिश की जा रही है.

अंदरूनी असंतोष को साधने की कोशिश

इन बैठकों का एक अहम उद्देश्य BJP के भीतर मौजूद नाराज़गी को कम करना भी है. कई जिलों में पार्टी के जनप्रतिनिधियों, स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की खबरें सामने आती रही हैं. कानपुर क्षेत्र की बैठक में भी इसी तरह के मुद्दों पर चर्चा हुई. जानकारी के मुताबिक यहां पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं और नगर निगम के मेयर के बीच विकास कार्यों को लेकर मतभेद की बात उठी.

इसी तरह महोबा की वह घटना भी चर्चा में रही जिसमें BJP के एक विधायक और उनके समर्थकों ने सड़कों की खराब हालत को लेकर जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के काफिले को रोक दिया था. पार्टी नेतृत्व को लगता है कि इस तरह की घटनाएं चुनाव से पहले गलत संदेश देती हैं और विपक्ष को हमले का मौका देती हैं. इसलिए समन्वय बैठकों के जरिए स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर संवाद कराया जा रहा है ताकि असंतोष खुलकर सामने आए और उसे समय रहते सुलझाया जा सके.

जमीनी मुद्दों पर सीधा फीडबैक

जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन बैठकों में संघ के पदाधिकारियों से बूथ स्तर के संगठन, सामाजिक पहुंच और विचारधारा से जुड़े संदेशों पर फीडबैक मांगा. यह भी समझने की कोशिश की जा रही है कि विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन को किस तरह से चुनौती दी जा सकती है. पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों की चर्चा फिर तेज़ हुई है और विपक्ष सामाजिक न्याय के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा है. इसी संदर्भ में BJP की रणनीति हिंदुत्व के वैचारिक मुद्दे को मजबूत करने की भी मानी जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ की छवि पहले से ही हिंदुत्व के मजबूत चेहरे के रूप में स्थापित है और अगर पार्टी इस मुद्दे को दोबारा प्रभावी ढंग से उठाती है तो इससे उसका कोर वोट बैंक मजबूत रह सकता है.

समन्वय बैठकों में यह भी तय हुआ है कि संघ और BJP मिलकर छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच काम को तेज़ करेंगे. हाल के महीनों में कुछ विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में उठे विवादों ने भी सरकार को यह एहसास कराया है कि युवाओं के बीच संवाद को मजबूत करना जरूरी है. संघ के सहयोगी संगठनों की ओर से भी अपने कार्यक्रमों की प्रगति रिपोर्ट इन बैठकों में पेश की जा रही है. संघ के सौ साल पूरे होने के अवसर पर देशभर में कई कार्यक्रम चल रहे हैं और उत्तर प्रदेश में भी इन्हें बड़े पैमाने पर आयोजित किया जा रहा है. इन कार्यक्रमों को भी संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है.

योगी और भागवत के बीच संवाद

इन बैठकों के पीछे एक और दिलचस्प पहलू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संघ नेतृत्व के बीच बढ़ता संवाद भी है. पिछले वर्ष नवंबर में योगी ने अयोध्या में संघ प्रमुख मोहन भागवत से करीब डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में बातचीत की थी. इसके बाद इस साल फरवरी में लखनऊ में भी दोनों के बीच मुलाकात हुई. इसके अलावा नवंबर में ही संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने लखनऊ में राज्य के मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ अलग-अलग विभागों की समीक्षा बैठकें भी की थीं. इससे यह संकेत मिला था कि संघ सरकार के कामकाज को करीब से समझना और उसमें सुधार के सुझाव देना चाहता है.

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने BJP को यह एहसास कराया कि उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण पहले जैसे आसान नहीं रहे. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस चुनाव में कई स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और संगठनात्मक ढील का असर पड़ा. इसलिए अब पार्टी किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती. समन्वय बैठकों को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें चुनाव से काफी पहले ही संगठन को सक्रिय करने और संभावित कमजोरियों को पहचानने की कोशिश की जा रही है.

उठ रहे हैं कई सवाल भी

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन बैठकों से वास्तव में BJP को चुनावी फायदा मिलेगा. राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “इन बैठकों का असर सीधे चुनावी नतीजों में नहीं मापा जा सकता, लेकिन यह संगठन को सक्रिय रखने और कैडर का मनोबल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. अगर कार्यकर्ता और स्थानीय पदाधिकारी यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रही है, तो वे चुनाव के दौरान ज्यादा सक्रिय रहते हैं. दूसरी तरफ सरकार को भी यह समझने में मदद मिलती है कि किन मुद्दों पर जनता में असंतोष है और किन योजनाओं को ज्यादा प्रभावी तरीके से प्रचारित करने की जरूरत है.”

संघ की प्रांत स्तर की ये बैठकें कुछ ही दिनों में पूरी हो जाएंगी. इसके बाद क्षेत्रीय प्रचारक और प्रांत प्रचारक हरियाणा में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में शामिल होंगे, जहां संघ के संगठनात्मक पुनर्गठन पर भी चर्चा होने की संभावना है.

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