‘जॉनी-जॉनी’ से जमीन पर कब्जे तक, बार-बार विवादों में क्यों घिरते हैं योगेंद्र उपाध्याय
अंग्रेजी राइम पर दिए बयान से फिर विवादों में आए मंत्री योगेंद्र उपाध्याय का नाम पहले भी कर्मचारी प्रकरण, शहीद परिवार विवाद और जमीन कब्जे जैसे मामलों में सुर्खियां बटोर चुका है

अंग्रेज़ी की मशहूर नर्सरी राइम “जॉनी-जॉनी यस पापा” को लेकर दिया गया एक बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ गया है. योगी सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने 6 मई को कानपुर में शिक्षा मित्रों के कार्यक्रम में कहा कि ऐसी अंग्रेज़ी कविताएं बच्चों में बचपन से ही झूठ और बेईमानी के बीज बोती हैं.
उनका कहना था कि पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित ये राइम्स बच्चों को नैतिकता नहीं सिखातीं, जबकि भारतीय परंपरा की कविताओं और लोकगीतों में जीवन मूल्यों का संदेश छिपा होता है. मंत्री ने “ईटिंग शुगर? नो पापा” संवाद का हवाला देते हुए कहा कि बच्चा गलती करने के बाद झूठ बोल रहा है और यह व्यवहार बच्चों के मन में सामान्य बनाया जा रहा है.
योगेंद्र उपाध्याय के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कुछ लोगों ने इसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की वकालत बताया, तो कई लोगों ने इसे अतिशयोक्तिपूर्ण और अनावश्यक विवाद पैदा करने वाला बयान करार दिया. हालांकि मंत्री ने अपने संबोधन में सिर्फ आलोचना नहीं की, बल्कि शिक्षकों से यह भी अपील की कि वे तय पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर बच्चों को भारतीय संस्कृति, नैतिक शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा से जोड़ें. इसी कार्यक्रम में उन्होंने शिक्षा मित्रों का मानदेय 10 हजार से बढ़ाकर 18 हजार रुपए करने की घोषणा का भी उल्लेख किया और कहा कि सरकार ग्रामीण शिक्षकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है.
लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब योगेंद्र उपाध्याय अपने किसी बयान या घटना को लेकर विवादों में घिरे हों. पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम कई ऐसे मामलों में सामने आया, जिन्होंने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस पैदा की. दिलचस्प यह है कि लगभग हर विवाद के बाद मंत्री ने अपनी ओर से सफाई भी दी और खुद को राजनीतिक साजिश का शिकार बताया.
मई 2024 में आगरा स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिनेश कुशवाहा के जहर खाने का मामला काफी चर्चित हुआ था. कर्मचारी की पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति के साथ मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के छोटे बेटे अलौकिक उपाध्याय ने मारपीट की थी, जिससे आहत होकर उसने यह कदम उठाया. आरोप यह भी लगाया गया कि दिनेश को दो वर्षों से विश्वविद्यालय की जगह मंत्री के घर पर ड्यूटी करनी पड़ रही थी, उसे छुट्टियां नहीं मिलती थीं और देर रात तक रोका जाता था.
मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय कर्मचारियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया. कुलपति कार्यालय के बाहर धरना दिया गया, हड़ताल हुई और यह सवाल उठा कि आखिर किसके आदेश पर विश्वविद्यालय का कर्मचारी मंत्री के निजी आवास पर तैनात था. छात्र संगठनों ने भी प्रदर्शन और पुतला दहन किया. बढ़ते दबाव के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति गठित करने की घोषणा की और डिप्टी रजिस्ट्रार पवन सिंह से दायित्व वापस ले लिए गए.
हालांकि इस पूरे मामले में योगेंद्र उपाध्याय ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया. उन्होंने बयान जारी कर कहा कि उनके खिलाफ सुनियोजित साजिश रची जा रही है. मंत्री का कहना था कि इससे पहले भी उन्हें एक अन्य मामले में फंसाने की कोशिश की गई थी, लेकिन जांच में उनकी कोई भूमिका सामने नहीं आई. उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक विरोधी लगातार उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है.
इसके कुछ महीने पहले नवंबर 2023 में एक और घटना ने योगेंद्र उपाध्याय को विवादों के केंद्र में ला दिया था. जम्मू-कश्मीर के राजौरी में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान आगरा के कैप्टन शुभम गुप्ता शहीद हो गए थे. सरकार की ओर से सहायता राशि का चेक देने के लिए योगेंद्र उपाध्याय और आगरा कैंट विधायक डॉ. जीएस धर्मेश शहीद के घर पहुंचे थे. इस दौरान कैमरों के सामने तस्वीरें खिंचवाने का प्रयास हुआ और बेटे की शहादत से टूट चुकी मां भावुक होकर रो पड़ीं. उन्होंने कहा, “मेरी प्रदर्शनी मत लगाओ, मुझे मेरा बेटू वापस चाहिए.”
शहीद की मां का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और लोगों ने मंत्री की संवेदनहीनता को लेकर आलोचना की. विपक्ष ने भी सरकार पर हमला बोला और कहा कि शहादत जैसे संवेदनशील मौके को राजनीतिक प्रदर्शन में बदला जा रहा है. हालांकि बाद में योगेंद्र उपाध्याय ने अपनी सफाई में कहा कि मीडिया ने घटना को गलत तरीके से प्रस्तुत किया. उनका कहना था कि वह शहीद परिवार के पुराने परिचित हैं और शुभम की मां कैमरे वालों से कह रही थीं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए, लेकिन इसे इस तरह दिखाया गया जैसे वह बातें सीधे उनसे कही जा रही हों. मंत्री ने कहा था कि उनका उद्देश्य केवल परिवार को सांत्वना देना और सरकार की ओर से सहायता पहुंचाना था.
जनवरी 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आगरा में जमीन कब्जे के एक मामले ने भी राजनीतिक हलचल बढ़ा दी थी. इस विवाद में योगेंद्र उपाध्याय और बीजेपी सांसद राजकुमार चाहर आमने-सामने दिखाई दिए. आरोप था कि एक जमीन पर अवैध कब्जे को लेकर दोनों नेताओं के समर्थक अलग-अलग पक्षों में खड़े थे. मंत्री ने आरोप लगाया था कि कि सांसद ने सैफई परिवार से जुड़े व्यक्ति का समर्थन किया, जबकि सांसद राजकुमार चाहर ने खुलकर इसका विरोध किया.
विवाद इतना बढ़ा कि बीजेपी के भीतर भी खींचतान की चर्चा होने लगी. सांसद चाहर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर जमीन कब्जे के मामले में कहीं भी उनका नाम साबित हो जाए तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे. मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचा और संगठन स्तर पर भी इसे गंभीरता से लिया गया. हालांकि योगेंद्र उपाध्याय ने इस विवाद पर प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा बयान नहीं दिया, लेकिन उनके समर्थकों का कहना था कि जमीन विवाद को राजनीतिक रंग देकर मंत्री की छवि धूमिल करने की कोशिश की गई.
इन विवादों की श्रृंखला ने योगेंद्र उपाध्याय की राजनीतिक छवि को लगातार चर्चा में बनाए रखा है. एक तरफ वे योगी सरकार में शिक्षा और संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण मंत्री माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके बयान और उनसे जुड़े घटनाक्रम अक्सर विपक्ष को हमला करने का मौका देते रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगेंद्र उपाध्याय की शैली स्पष्टवादी और आक्रामक रही है, जिसके कारण उनके बयान जल्दी सुर्खियों में आ जाते हैं. समर्थकों के मुताबिक वे भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा को लेकर मुखर रहते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि कई बार उनके बयान अनावश्यक विवाद पैदा कर देते हैं.
“जॉनी-जॉनी यस पापा” विवाद ने भी एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा व्यवस्था में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की चर्चा जरूरी है या फिर लोकप्रिय बाल कविताओं को वैचारिक बहस का हिस्सा बनाना अतिशयोक्ति है. लेकिन इतना तय है कि योगेंद्र उपाध्याय का नाम एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है. उनके समर्थक इसे भारतीयता की आवाज बताते हैं, जबकि विरोधियों के लिए यह विवादों की नई कड़ी है.