क्या छत्तीसगढ़ सरकार के एक फैसले से लाखों साल में बनी बस्तर की ग्रीन केव खत्म हो जाएगी?
बस्तर में बनी इस ग्रीन केव को छत्तीसगढ़ सरकार पर्यटकों के लिए खोलने जा रही है

छत्तीसगढ़ सरकार ने बस्तर जिले में स्थित कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान की दुर्लभ और पर्यावरणीय रूप से अत्यंत संवेदनशील ‘ग्रीन केव’ को पर्यटकों के लिए खोलने का फैसला किया है. क्षेत्र में माओवादी गतिविधियों में कमी आने के बाद राज्य सरकार बस्तर के अधिक से अधिक स्थलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाने के विकल्प तलाश रही है.
इसी लिहाज से ग्रीन केव को एक संभावित पर्यटन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है. राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप का कहना है कि इस गुफा को पर्यटन स्थल में शामिल करने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी. उनका कहना है, "पर्यटक इस अद्भुत गुफा की प्राकृतिक खूबसूरती का सीधा अनुभव कर सकेंगे. वन विभाग द्वारा सभी जरूरी तैयारियां पूरी कर ली गई है. इसे पर्यटकों के लिए जल्द ही खोल दिया जाएगा.’’
हालांकि सरकार के इस निर्णय को लेकर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने कड़ा विरोध जताया है. विशेषज्ञों का कहना है कि कोटमसर क्षेत्र में स्थित प्राकृतिक रूप से बनी ग्रीन केव का निर्माण हजारों से लेकर लाखों वर्षों में भूवैज्ञानिक और जल-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के जरिए हुआ है. यह गुफा केवल अत्यंत विशिष्ट प्राकृतिक परिस्थितियों में ही मूल स्वरूप में रह सकती है. इसके लिए रोजाना थोड़ी देर के लिए सूर्य की रौशनी, स्थिर तापमान, अत्यधिक आर्द्रता और पोषक तत्वों की उपलब्धता जरूरी है.
इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है. राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) के सामने इस संबंध में एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने आपत्ति दर्ज कराई थी और उन्होंने ही यह PIL दाखिल की है. हालांकि मामला अब कोर्ट में है. ऐसे में कोर्ट के निर्देश के मुताबिक वे अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते.
चूंकि यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो गया है इसलिए राज्य के विशेषज्ञ नाम जाहिर न करने की शर्त पर ही इससे जुड़े खतरों के बारे में मीडिया में बात कर रहे हैं. एक विशेषज्ञ का कहना है कि अगर इंसान अनजाने में ही गुफा की दीवारों को छू लें तो उससे उन सूक्ष्मजीवी परतों और बायोफिल्म्स के नष्ट होने का खतरा पैदा हो सकता है जिन्हें बनने में हजारों साल लगे हैं. इसके अलावा कृत्रिम रोशनी से आक्रामक शैवाल (‘लैम्पन-फ्लोरा’) पनप सकते हैं, जो गुफा की पारिस्थितिकी को मूल रूप से बदल देते हैं.
वहीं कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि अगर कभी पर्यटन की अनुमति दी भी जाती है, तो वह नियंत्रित, न्यूनतम और विज्ञान-आधारित होनी चाहिए. इसमें मनोरंजन से अधिक संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए. नेशनल केव्स रिसर्च एंड प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन के निदेशक जयंत बिस्वास दुनियाभर की ऐसी 70 से अधिक गुफाओं में जा चुके हैं. वे कहते हैं, "पर्यटकों के वहां जाने से कुछ नुकसान नहीं होगा. जिस ग्रीन केव की बात हो रही है, वह बहुत छोटी है. यह केव आधी खुली है, पूरी तरह बंद भी नहीं है. इन्हें ग्रीन केव इसलिए कहते हैं कि यहां कुछ हिस्सों में दिन में एक बार सूर्य की रोशनी पड़ती है, जिससे काई जम जाती है.’’
बिस्वास सुझाव देते हैं कि सरकार कुछ नियम बनाकर, गाइड को प्रशिक्षित कर, वहां बैरिकेट लगाकर लोगों को जाने दे सकती है. इससे कुछ नुकसान नहीं होगा. जिस आर्टिफिशियल लाइट के कारण आपत्ति जताई जा रही है, वहां उसकी जरूरत ही नहीं है.
दुनिया में और कहां हैं ग्रीन केव
भारत के अलावा वियतनाम, क्रोएशिया, इटली, चीन जैसे देशों में भी ग्रीन केव हैं. वियतनाम की ग्रीन केव दुनिया में इस तरह की सबसे बड़ी संरचना मानी जाती है. इसकी विशाल गुफाओं और वनस्पति को सुरक्षित रखते हुए सतत भविष्य सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हर साल यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या 450 तक सीमित रखी गई है. लगभग 200 मीटर से अधिक ऊंचाई, 150 मीटर चौड़ाई और 5 किलोमीटर लंबाई वाली वियतनाम की हांग सोन डूंग केव इतनी विशाल है कि इसके भीतर अपनी नदी, जंगल और अलग जलवायु मौजूद है.