राजस्थान की राजनीति में बार-बार क्यों चर्चा में आता है वसुंधरा राजे का 'शायरी मॉडल'ॽ

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने भाषणों में कवि-शायरों की पंक्तियां अक्सर बोलती हैं जो राजस्थान की राजनीति में कई तरह के कयासों को जन्म दे जाती हैं

Former Rajasthan CM Vasundhara Raje Scindia
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया. (Photo: X/@VasundharaBJP)

15 जनवरी की तारीख और समय था दोपहर 12 बजे. झालावाड़ के उन्हेल कस्बे में सांसद दुष्यंत सिंह की आशीर्वाद यात्रा शुरू होने वाली थी. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया यात्रा को हरी झंडी दिखाने आईं थी. यात्रा को रवाना करते हुए राजे ने कहा,  ''मैं चलती रही उम्रभर दुआओं के साथ, पांव के छाले कभी मेरी राहें नहीं रोक पाए.''  वसुंधरा राजे ने सीधे तौर पर अपने बेटे दुष्यंत सिंह को यह नसीहत दी कि सियासत में खूब मुश्किलें आती हैं, मगर हम उनकी परवाह किए बिना आगे बढ़ते रहे तो जरूर सफल होंगे. 

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब वसुंधरा राजे ने शायरना अंदाज में अपनी बात कही हो. वे अक्सर सीधी-सपाट भाषा से अलग शेर-ओ-शायरी और साहित्यिक संकेतों के सहारे अपनी बात कहती रही हैं. जानकार मानते हैं कि वसुंधरा राजे की हर पंक्ति में कोई न कोई सियासी अर्थ छिपा है और हर शेर में कोई न कोई संदेश.  

2 मई 2025 को सिरोही जिले के रेवदर में आंजनी माता मंदिर के एक समारोह में उन्होंने एक शायरी के माध्यम से गहरी बात कही. उसके बाद राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं. कयास लगाए जाने लगे कि राजस्थान में अब कुछ बड़ा होने वाला है. राजे ने पहले प्रख्यात शायर कुंवर बेचैन का यह शेयर सुनाया, ‘‘गमों की आंच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग किसी पर भी डाल कर देखो, तुम्हारे दिल की चुभन जरूर कम होगी, किसी के पांव से कांटा निकाल कर तो देखो.’’ इसके बाद उन्होंने राजस्थान में अपने 25 साल के राजनीतिक अनुभव का जिक्र करते हुए कहा - ‘‘आजकल राजनीति ऐसी हो गई जिसमें कोई किसी के आंसू नहीं पोंछता, अब तो आंसू उबल रहे हैं.’’ 

17 अगस्त 2024 को उदयपुर के ऋषभदेव में जैन संत आचार्य पुलक सागर महाराज के ज्ञान गंगा कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजे ने कहा, ‘‘काश ऐसी बारिश आए जिसमें अहं डूब जाए, मतभेद के किले ढह जाएं, घमंड चूर-चूर हो जाए, गुस्से के पहाड़ पिघल जाएं, नफरत हमेशा के लिए दफन हो जाए.'' धार्मिक कार्यक्रम में वसुंधरा के इस अंदाज को सियासी कटाक्ष से जोड़कर देखा गया. सियासी हलकों में ये कयास लगाए जाने कि वसुंधरा राजे प्रदेश नेतृत्व से खफा हैं.  

विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वसुंधरा राजे की अनदेखी का दर्द उदयपुर के एक कार्यक्रम में छलका. तब राजे ने कहा– “वफा का वह दौर अलग था, यह दौर अलग है. आज लोग उसी अंगुली को पहले काटते हैं जिसको पकड़कर वो चलना सीखते हैं.” इस बयान के जरिए उन्होंने पार्टी के उन नेताओं पर हमला बोला जिन्हें आगे बढ़ाने में वसुंधरा राजे का बहुत बड़ा योगदान था मगर वसुंधरा राजे को राजस्थान में तीसरी बार कमान दिए जाने का सबसे ज्यादा विरोध भी इन्हीं नेताओं ने किया. 

BJP के वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर को सिक्किम का राज्यपाल बनाए जाने पर जयपुर में आयोजित सम्मान समारोह में वसुंधरा राजे ने शेरो-ओ-शायरी के जरिए वहां मौजूद कई नेताओं को घेर लिया. राजे ने कहा- ''चाहत भले ही आसमान छूने की रखो, मगर पांव हमेशा जमीन पर रखो.''  उन्होंने फिर बाद में बात आगे बढ़ाई कि ओम प्रकाश माथुर चाहे कितनी ही बुलंदियों पर पहुंच गए मगर उनके पांव हमेशा धरातल पर ही रहे. वरना कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें पीतल की लौंग भी मिल जाए तो वे खुद को सर्राफ (सोने का कारोबारी) समझने लगते हैं.  

कुछ ऐसा ही वाकया झालावाड़ के झालरापाटन में महाराणा प्रताप जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम दिखाई दिया. राजे ने मंच से कहा- '' सांप से कितना ही प्रेम कर लो, वह अपने स्वभाव के अनुरूप कभी न कभी आप पर जहर जरूर उगलेगा.'' यहां राजे का इशारा प्रदेश के उन नेताओं की ओर था जो पार्टी में उनके धुर विरोधी हैं. 

वहीं बात पिछले साल के 19 अगस्त की करें तो उस दिन धौलपुर में रामकथा में जुटे श्रृद्धालुओं को संबोधित करते हुए राजे ने कहा- ''वनवास कभी न कभी सबके जीवन में आ ही जाता है, मगर आता है तो जाता भी है. बस राम जैसा धर्य रखने की जरुरत है.'' 

ऐसा नहीं है कि वसुंधरा राजे शेरो-शायरी का साहित्यिक पंक्तियों के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं पर हमला बोलती हैं. विपक्ष में रहते हुए भी वसुंधरा राजे कांग्रेस पर खूब हमलावर रहती थीं. राजस्थान की पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ वसुंधरा राजे ने 'नहीं सहेगा राजस्थान' अभियान की शुरूआत भी शायराना अंदाज में ही की थी. एक भाषण में राजे ने कहा -  ''युवा पीड़ित हैं और पीड़ित किसान, दलित दुखी है महिला हैं परेशान, कदम-कदम पर सबका है अपमान, नहीं सहेगा राजस्थान, नहीं सहेगा राजस्थान.'' बाद में इन्हीं शब्दों को एक गीत में पिरोया गया और यह BJP के चुनाव अभियान का थीम सांग बना. 

मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बजट भाषणों के जरिए भी वसुंधरा राजे ने कांग्रेस पर खूब हमले बोले. अपने दूसरे कार्यकाल के एक बजट भाषण में कांग्रेस पर आर्थिक कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए राजे ने कुछ इस तरह कटाक्ष किया- ''तुम चाहते तो हालात बदल भी सकते थे, ये हालात अवाम की आंखों से देख भी सकते थे. मगर तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरह, दरिया बनते तो बहुत दूर निकल भी सकते थे.'' अपनी सरकार के भविष्य के इरादों को भी उन्होंने एक शेर के जरिए इस तरह पेश किया- ''नई बुलंदियों को छूने में वक्त तो लगता है, नई इमारत को बनने में वक्त तो लगता है. कुछ किया है हमने और बहुत कुछ करेंगे अब हम, पर सबके सपनों को सच करने में वक्त तो लगता है.” 

राजे ही नहीं, अब उनके समर्थक भी शेरो-शायरी में बात करने लगे हैं. 10 अक्टूबर 2025 को वसुंधरा राजे चूरू जिले के रतनगढ़ में एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचीं तो उनके एक समर्थक ने उन्हें कैफी आजमी की नज्म की दो लाइनें सुनाई - ''हमें बुजुर्ग समझकर न घर से बाहर कर..कि यही चिराग अंधेरों में काम आते हैं.'' समर्थक का इशारा साफ था और वसुंधरा राजे भी इस शायरी का मर्म समझ चुकी थी. वहां मौजूद जनता को भी जोश आ चुका था. ऐसे में नारा लगा - हमारा सीएम कैसा हो, वसुंधरा राजे जैसा हो. वसुंधरा ने कार्यकर्ताओं को बीच में ही रोक कर कहा - कैसा हो नहीं, कैसी हो. फिर नारा लगा -हमारी सीएम कैसी हो, वसुंधरा राजे जैसी हो. बाद में इस नारे और शायरी को लेकर खूब सियासी चर्चाएं हुई. 

वसुंधरा राजे का यह शायराना अंदाज़ न सिर्फ़ उनकी भावनाओं का आईना बन रहा है बल्कि सियासी गलियारों में हलचल भी पैदा कर रहा है. उनके हर मिसरे को बयान नहीं बल्कि संकेत की तरह पढ़ा जा रहा है.

Read more!