यूपी में मांगें मनवाने के लिए ‘बसंती’ क्यों चढ़ रही टावर पर?
फिल्म 'शोले' की तरह प्रेमी से शादी और अपनी मांगें मनवाने के लिए यूपी में बढ़ रहा है ‘टावर प्रोटेस्ट’ का ट्रेंड लेकिन अंतर बस इतना है कि यह कदम लड़कियां उठा रही हैं

प्रयागराज के मऊआइमा थाना क्षेत्र के कल्याणपुर गांव में 1 जून की दोपहर अचानक लोगों की निगाहें आसमान की ओर उठ गईं. गांव में लगे मोबाइल टावर पर एक युवती चढ़ गई थी. बारिश होने लगी थी, लेकिन युवती नीचे उतरने को तैयार नहीं थी. उसकी एक ही मांग थी, पड़ोस में रहने वाले युवक से उसकी शादी कराई जाए.
करीब दो घंटे तक पुलिस, परिवार और ग्रामीण उसे मनाते रहे. आखिरकार बातचीत और आश्वासन के बाद वह नीचे उतरी और पुलिस उसे थाने ले गई. यह कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में प्रेमी से शादी कराने, प्रेमी को जेल से छुड़ाने या परिवार के विरोध को दरकिनार करने के लिए युवतियों द्वारा मोबाइल टावर, पानी की टंकी और हाईटेंशन बिजली के खंभों पर चढ़ने की घटनाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है.
इन घटनाओं ने पुलिस, समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर युवतियां अपनी बात मनवाने के लिए इतने जोखिम भरे रास्ते क्यों चुन रही हैं.
हिंदी सिनेमा की चर्चित फिल्म ‘शोले’ में वीरू पानी की टंकी पर चढ़कर बसंती से शादी की जिद करता है. दशकों बाद उत्तर प्रदेश में उसी दृश्य का एक नया संस्करण दिखाई दे रहा है, लेकिन इस बार भूमिकाएं बदल गई हैं. अब युवतियां टावरों और खंभों पर चढ़कर अपनी मांगें मनवाने की कोशिश कर रही हैं. आगरा के शमसाबाद क्षेत्र में 23 मई को एक युवती प्रेमी से शादी की मांग को लेकर हाईटेंशन बिजली के टावर पर चढ़ गई.
तीन घंटे तक चले हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद पुलिस ने उसे सुरक्षित नीचे उतारा. बताया गया कि युवक और युवती के बीच वर्षों से प्रेम संबंध था, लेकिन शादी को लेकर दोनों परिवारों में विवाद था. युवक पहले पॉक्सो मामले में जेल भी जा चुका था. जमानत पर बाहर आने के बाद उसने शादी से इनकार कर दिया जिससे नाराज होकर युवती ने यह कदम उठाया.
इसी तरह बस्ती जिले के रुधौली क्षेत्र में नादिया खातून नाम की युवती कुछ दिनों के अंतराल में दो बार मोबाइल टावर पर चढ़ गई. उसका आरोप था कि पुलिस ने प्रेमी से शादी कराने का भरोसा दिया था, लेकिन वादा पूरा नहीं हुआ. दूसरी बार टावर पर चढ़ने के बाद वह पूरे इलाके में ‘टावर वूमेन’ के नाम से चर्चित हो गई.
पूर्वांचल में तेजी से उभरता पैटर्न
बलिया, जौनपुर, आजमगढ़, प्रतापगढ़, मऊ, बस्ती और प्रयागराज जैसे जिलों में ऐसी घटनाओं का एक स्पष्ट पैटर्न उभरकर सामने आ रहा है. अधिकांश मामलों में कारण प्रेम संबंध, शादी को लेकर पारिवारिक विरोध या सामाजिक दबाव है. बलिया में एक युवती ने प्रेमी के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न के मुकदमे के बीच मोबाइल टावर पर चढ़कर शादी की मांग कर दी. पुलिस के दखल के बाद आखिरकार दोनों का विवाह हो गया.
वहीं जौनपुर में एक नाबालिग लड़की अपने प्रेमी को जेल से छुड़ाने और साथ रहने की मांग को लेकर टावर पर चढ़ गई थी. पुलिस ने उसे नीचे उतारकर बालिका गृह भेज दिया. प्रतापगढ़ में मार्च और अप्रैल के बीच ऐसे कम से कम पांच मामले दर्ज हुए, जिनमें 18 से 22 वर्ष की युवतियां मोबाइल टावरों या पानी की टंकियों पर चढ़ गईं. कहीं प्रेमी से शादी की मांग थी तो कहीं परिवार द्वारा तय किए गए विवाह का विरोध. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पहले ऐसी हरकतें आमतौर पर पुरुष करते थे लेकिन अब महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है.
आखिर क्यों चुन रही हैं इतना खतरनाक रास्ता?
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इन घटनाओं को सीधे आत्महत्या की कोशिश मानना सही नहीं होगा. अधिकतर मामलों में यह ध्यान आकर्षित करने और दबाव बनाने की रणनीति होती है. मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष शुक्ल के अनुसार, यह व्यवहार अक्सर 'इंस्ट्रूमेंटल एग्रेशन' की श्रेणी में आता है. यानी व्यक्ति किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जोखिमपूर्ण और नाटकीय व्यवहार का इस्तेमाल करता है. उनके मुताबिक, “अधिकांश मामलों में इन युवतियों का उद्देश्य मरना नहीं होता. वे परिवार, प्रेमी या प्रशासन को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी बात सुनी जाए. यह एक तरह की ‘अल्टीमेट बार्गेनिंग’ यानी मोल-भाव है, जिसमें व्यक्ति अपने पास मौजूद अंतिम विकल्प का प्रदर्शन करता है.”
विशेषज्ञों का कहना है कि जब युवती किसी ऊंचे टावर पर चढ़ती है तो कुछ ही मिनटों में वहां भीड़ जुट जाती है. मोबाइल कैमरे चालू हो जाते हैं. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने लगते हैं. जिस मुद्दे पर घर के भीतर कोई ध्यान नहीं दे रहा था, वह अचानक सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाता है. यही तत्काल ध्यान इस व्यवहार को बढ़ावा देता है.
सोशल मीडिया बना नया उत्प्रेरक
इन घटनाओं के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. गांवों और कस्बों में भी अब वायरल वीडियो, रील्स और डिजिटल प्रसिद्धि की संस्कृति गहराई तक पहुंच चुकी है. सामाजिक विश्लेषक राजेश्वर यादव का कहना है कि युवाओं को यह एहसास हो चुका है कि किसी टावर पर चढ़ने का वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है. कई बार स्थानीय विवाद राष्ट्रीय खबर बन जाता है. बस्ती, बलिया और जौनपुर के हालिया मामलों में भी लोगों ने सबसे पहले वीडियो बनाए, बाद में मदद की कोशिश की.
कई मामलों में भीड़ तमाशबीन बनी रही जबकि पुलिस और प्रशासन युवती को सुरक्षित नीचे उतारने में जुटे रहे. समाजशास्त्री डॉ. बृजेश पांडे का कहना है कि यह केवल प्रेम संबंधों का मामला नहीं है बल्कि बदलते सामाजिक ढांचे का भी संकेत है. उनके अनुसार, “नई पीढ़ी अपनी व्यक्तिगत पसंद और निर्णयों को लेकर पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर है. जब परिवार या समाज उनकी बात नहीं सुनता तो वे असाधारण और नाटकीय तरीकों का सहारा लेते हैं.”
पुलिस के लिए बढ़ती चुनौती
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसी घटनाएं कानून-व्यवस्था और जनसुरक्षा दोनों के लिए गंभीर चुनौती हैं. एक तरफ युवती की जान बचानी होती है, दूसरी तरफ भीड़ को नियंत्रित करना पड़ता है. वाराणसी जोन के एडीजी पीयूष मोर्डिया के अनुसार, ऐसे मामलों से निपटने के लिए पुलिस के पास स्पष्ट मानक प्रक्रिया यानी एसओपी है. उनका कहना है, “हम सबसे पहले व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं. अनुभवी अधिकारी मनोवैज्ञानिक तरीके से बातचीत करते हैं. अगर कोई युवती टावर पर चढ़ी है तो महिला पुलिसकर्मियों और परिजनों की मदद ली जाती है. उद्देश्य किसी भी कीमत पर उसे सुरक्षित नीचे उतारना होता है.”
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई बार घंटों की मशक्कत करनी पड़ती है. बारिश, तेज हवा या बिजली के तारों की मौजूदगी जोखिम को और बढ़ा देती है. विशेष रूप से हाईटेंशन बिजली के टावरों पर चढ़ना जानलेवा साबित हो सकता है. कई मामलों में व्यक्ति सीधे तार को छुए बिना भी करंट की चपेट में आ सकता है.
क्या कानून पर्याप्त है?
कई पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल समझाइश पर्याप्त नहीं है. अगर कार्रवाई नहीं होगी तो यह प्रवृत्ति और बढ़ सकती है. बस्ती की नादिया खातून का मामला इसका उदाहरण माना जा रहा है. एक बार टावर पर चढ़ने के बाद उसके खिलाफ कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई. कुछ ही दिनों बाद उसने फिर वही हरकत दोहरा दी.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक संपत्ति पर चढ़ना, यातायात बाधित करना, भीड़ जुटाना और जान जोखिम में डालना विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकता है. लेकिन अक्सर मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कठोर कार्रवाई से बचा जाता है. यही नरमी कई बार दूसरों के लिए प्रेरक उदाहरण बन जाती है. वि शेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं के मूल में संवादहीनता की बड़ी भूमिका है. अधिकांश मामलों में युवती और परिवार के बीच लंबे समय से तनाव चल रहा होता है. कहीं प्रेम विवाह का विरोध है, कहीं जातिगत बाधाएं हैं तो कहीं सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल. जब बातचीत के रास्ते बंद हो जाते हैं तो टकराव चरम पर पहुंच जाता है. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कई परिवार अब भी युवाओं के भावनात्मक जीवन को गंभीरता से नहीं लेते. नतीजा यह होता है कि युवा अपनी बात मनवाने के लिए सार्वजनिक और खतरनाक तरीके चुन लेते हैं.