यूपी में परीक्षाओं के सवालों पर बार-बार क्यों उठ रहे सवाल?

बार-बार गलत सवाल, आपत्तिजनक विकल्प और जवाबदेही की कमी से घिर रही यूपी की परीक्षा प्रणाली, छात्रों का भरोसा कमजोर, सरकार सख्ती के दावे के बावजूद सुधार अब भी अधूरा

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सांकेतिक फोटो

उत्तर प्रदेश में भर्ती और शैक्षणिक परीक्षाओं का मकसद प्रतिभा का निष्पक्ष आकलन होता है, लेकिन इन परीक्षाओं में प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता खुद एक बड़ा सवाल बन गई है. ताजा मामला आगरा में परिषदीय स्कूलों की कक्षा सात की संस्कृत परीक्षा का है, जहां एक पहेली में ‘पंडित’ शब्द के इस्तेमाल ने ब्राह्मण समाज को आक्रोशित कर दिया. 

17 मार्च को हुई इस परीक्षा में एक पहेली पूछी गई थी- “वह कौन हो जो बिना पैर के दूर तक जाता है, साक्षर है लेकिन पंडित नहीं” इसने विवाद की चिंगारी को हवा दी. विकल्पों में वायु, पक्षी, पत्र और बादल जैसे उत्तर दिए गए थे, लेकिन ‘पंडित’ शब्द के उपयोग को लेकर आपत्ति उठी. 

उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के संगठन मंत्री ब्रजेश दीक्षित का आरोप है कि यह महज एक भाषाई प्रयोग नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया प्रयास है, जिससे एक विशेष समाज को अपमानित किया जा सके. उनका कहना है कि जिस पाठ से यह प्रश्न लिया गया बताया जा रहा है, उसमें ऐसी कोई पहेली नहीं है, जिससे यह संदेह और गहरा होता है कि प्रश्न किसी स्तर पर मनमाने ढंग से जोड़ा गया. इस विरोध के बीच प्रशासनिक स्तर पर भी संवेदनशीलता दिखाई गई है. आगरा के बेसिक शिक्षा अधिकारी जितेंद्र गौड़ ने जांच के आदेश देते हुए कहा है कि दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी. लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या हर बार विवाद के बाद जांच और कार्रवाई की बात ही पर्याप्त है, या फिर समस्या कहीं ज्यादा गहरी है.

दरअसल, यह पहला मौका नहीं है जब ‘पंडित’ शब्द को लेकर विवाद हुआ हो. कुछ ही दिन पहले 14 मार्च को दरोगा भर्ती परीक्षा में सामान्य हिंदी के एक प्रश्न में ‘अवसरवादी’ के विकल्प के रूप में ‘पंडित’ दिया गया था. सवाल था- “अवसर के हिसाब से बदल जाने वाले को क्या कहेंगे?” और विकल्पों में ‘पंडित’ शामिल होना कई अभ्यर्थियों और सामाजिक संगठनों को आपत्तिजनक लगा. इस मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ा. 

उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इसे अस्वीकार्य बताते हुए कार्रवाई की बात कही, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी भर्ती बोर्डों को सख्त निर्देश दिए कि जाति और धर्म से जुड़े किसी भी प्रकार के अमर्यादित या संवेदनशील शब्दों से बचा जाए. उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार ऐसी गलती करने वाले संस्थानों या व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट किया जाए.

इन घटनाओं को एक साथ देखें तो साफ होता है कि समस्या केवल एक शब्द के चयन की नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की है जिसके तहत प्रश्न तैयार किए जाते हैं. प्रश्नपत्र तैयार करने के लिए आमतौर पर विषय विशेषज्ञों की एक टीम बनाई जाती है, जिनसे अपेक्षा होती है कि वे पाठ्यक्रम के अनुरूप, संतुलित और निष्पक्ष प्रश्न तैयार करें. लेकिन बार-बार सामने आ रही गड़बड़ियां इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर रही हैं. 

अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह समस्या और स्पष्ट हो जाती है. वर्ष 2024 में हुई पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा, जो राज्य की सबसे बड़ी भर्तियों में से एक थी, उसमें 70 प्रश्नों पर अभ्यर्थियों की आपत्तियां सही पाई गईं. इनमें से 25 प्रश्न पूरी तरह निरस्त करने पड़े, क्योंकि उनके विकल्प ही त्रुटिपूर्ण थे. 29 प्रश्न ऐसे थे, जिनमें एक से अधिक विकल्प सही थे, और 16 प्रश्नों के उत्तर बाद में बदलने पड़े. यह स्थिति केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि गंभीर अकादमिक लापरवाही को दर्शाती है. 

इस परीक्षा का आयोजन 23, 24, 25, 30 और 31 अगस्त 2024 को दस पालियों में किया गया था. परीक्षा के बाद जब उत्तर कुंजी जारी की गई और अभ्यर्थियों से आपत्तियां मांगी गईं, तब यह गड़बड़ी सामने आई. बोर्ड को मजबूरन हाई कोर्ट की स्वीकृत व्यवस्था के तहत अंकों का पुनर्वितरण करना पड़ा. 

इसी तरह, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं भी विवादों से अछूती नहीं रही हैं. पीसीएस-2025 की प्रारंभिक परीक्षा में कई प्रश्नों के उत्तरों पर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई थी. आयोग ने जिन उत्तरों को सही बताया था, उन्हें अभ्यर्थियों ने तथ्यों के आधार पर गलत साबित किया. उदाहरण के तौर पर ‘मिशन लाइफ’ के लॉन्च से जुड़े प्रश्न में आयोग ने जून 2022 को सही उत्तर माना, जबकि आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह कार्यक्रम अक्टूबर 2022 में केवड़िया, गुजरात से शुरू हुआ था.

इसी तरह ‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम की शुरुआत को लेकर भी उत्तर कुंजी में गलती पाई गई. अभ्यर्थियों का कहना था कि जब प्रश्न बनाने वाले विशेषज्ञ ही तथ्यों में चूक कर रहे हैं, तो फिर अभ्यर्थियों से शत-प्रतिशत सटीकता की उम्मीद करना कैसे उचित है. यह असंतोष केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए. 

पीसीएस-2019 और 2020 की परीक्षाओं में भी 38 प्रश्नों को या तो हटाना पड़ा या उनके उत्तर बदलने पड़े थे. आयोग की तरफ से जारी संशोधित उत्तर कुंजी ने यह साफ कर दिया था कि प्रारंभिक स्तर पर ही प्रश्नों की गुणवत्ता में गंभीर खामियां थीं. प्रथम और द्वितीय प्रश्नपत्रों में कई प्रश्नों को डिलीट करना पड़ा, जो इस बात का संकेत है कि प्रश्नों की समीक्षा प्रक्रिया भी प्रभावी नहीं रही. 

इन सभी उदाहरणों से एक पैटर्न उभरता है कि प्रश्न तैयार करने और उनकी समीक्षा की प्रक्रिया में लगातार चूक हो रही है. विशेषज्ञों के चयन में पारदर्शिता की कमी, प्रश्नों के क्रॉस-वेरीफिकेशन का अभाव और समय के दबाव में जल्दबाजी में प्रश्न तैयार करना, ये सभी कारण इस समस्या को बढ़ा रहे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय के एक परीक्षक बताते हैं, “कई बार प्रश्न तैयार करने का काम ऐसे लोगों को सौंप दिया जाता है, जिनकी विषय पर पकड़ तो होती है, लेकिन परीक्षा प्रणाली और प्रश्न निर्माण के मानकों की समझ सीमित होती है. इसके अलावा, कई बार प्रश्न बैंक पुराने होते हैं, जिनमें नई जानकारी का अभाव होता है. यही वजह है कि समसामयिक घटनाओं या तथ्यों से जुड़े प्रश्नों में ज्यादा गलतियां सामने आती हैं.” 

दूसरी बड़ी समस्या जवाबदेही की है. हर विवाद के बाद जांच और कार्रवाई की बात तो होती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में कितने लोगों पर सख्त कार्रवाई हुई और भविष्य में ऐसी गलती रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए. जब तक प्रश्न बनाने वाले या उनकी समीक्षा करने वाले लोगों पर स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इस तरह की लापरवाही पर अंकुश लगाना मुश्किल है. 

हालांकि, सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाने के संकेत दिए हैं. इसके अलावा, कई भर्ती बोर्ड अब डिजिटल मॉडरेशन और मल्टी-लेयर वेटिंग सिस्टम लागू करने की बात कर रहे हैं, ताकि प्रश्नों को अंतिम रूप देने से पहले कई स्तरों पर जांचा जा सके. शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अब प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया को और सख्त किया जा रहा है. इसमें विषय विशेषज्ञों के साथ-साथ भाषा विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों की भी भूमिका सुनिश्चित करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि प्रश्न न केवल तथ्यात्मक रूप से सही हों, बल्कि किसी भी वर्ग या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले न हों. 

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