BJP छोड़ कांग्रेस में वापस क्यों आए आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीयॽ

राजस्थान के प्रभावशाली आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय का BJP छोड़कर कांग्रेस में आना राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्र में सियासी रूप से काफी अहम माना जा रहा है

महेंद्रजीत सिंह मालवीय साल 2024 में कांग्रेस छोड़कर ही BJP में शामिल हुए थे

राजस्थान की आदिवासी बहुल वागड़ पट्टी में इन दिनों सियासी हलचल काफी बढ़ी हुई हैं. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस से 40 साल पुराना नाता तोड़कर BJP का दामन थाम लेने वाले मेवाड़-वागड़ के आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय 23 महीने बाद फिर कांग्रेस में चले आए हैं.

19 फरवरी 2024 को विधायक पद से इस्तीफा देकर मालवीय BJP में शामिल हुए थे. बदले में पार्टी ने उन्हें लोकसभा टिकट भी दिया मगर भारतीय आदिवासी पार्टी (BAP) के राजकुमार रोत के सामने उन्हें ढाई लाख वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा. 

मालवीय के BJP में जाने से खाली हुई बागीदौरा सीट पर उप चुनाव में भी वे कोई खास कमाल नहीं दिखा पाए. यहां मालवीय की अनुशंसा पर ही पार्टी ने सुभाष तंबोलिया को अपना उम्मीदवार बनाया था मगर BAP के जयकृष्ण पटेल के सामने वे 51 हजार 434 मतों से चुनाव हार गए. राजनीतिक हलकों में इसे सुभाष तंबोलिया की नहीं बल्कि महेंद्रजीत सिंह मालवीय की हार के तौर पर देखा गया. 

BJP में शामिल होने के बाद महेंद्रजीत सिंह मालवीय से जिस सियासी वजन और प्रभाव की अपेक्षा की जा रही थी वह लगातार दो चुनावी हार के बाद कमजोर पड़ता दिखाई दिया. पार्टी के भीतर उनकी भूमिका सीमित होती चली गई और संगठनात्मक स्तर पर भी उन्हें पहले जैसा सम्मान और महत्व नहीं मिल पाया. वागड़ क्षेत्र में अपेक्षित राजनीतिक लाभ न मिलने से BJP नेतृत्व का भरोसा भी डगमगाया जिससे मालवीय धीरे-धीरे हाशिये पर जाते नजर आए. यही असहजता और उपेक्षा की भावना उन्हें एक बार फिर कांग्रेस की चौखट पर खींच लाई. 

मालवीय की वापसी पर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा कहते हैं, ''कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता के लिए मालवीय ने मुझे पत्र लिखा है. अभी यह मामला कांग्रेस की अनुशासन समिति के पास है. वहां से रिपोर्ट मिलने के बाद ही पार्टी इस संबंध में कोई फैसला करेगी.'' सियासी जानकार मानते हैं कि कांग्रेस में वापस लौटना सिर्फ मालवीय ही नहीं बल्कि कांग्रेस की भी मजबूरी है. फिलहाल कांग्रेस के पास मालवीय के अलावा अन्य कोई दूसरा नेता या विकल्प नहीं है जो बांसवाड़ा-डूंगरपुर जिलों में उसके घटते जनाधार को फिर से मजबूती दे सके. मालवीय कांग्रेस के टिकट पर बांसवाड़ा से एक बार सांसद और बागीदौरा से चार बार विधायक चुने गए. मालवीय के BJP में जाने के बाद इस क्षेत्र

पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में तीसरे पायदान पर पहुंच गई है. BAP के बढ़ते प्रभाव ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया है. हालात ये हो गए हैं कि बागीदौरा सीट पर हुए उपचुनाव में तो कांग्रेस को कोई उम्मीदवार तक नहीं मिला था. इसी के चलते कांग्रेस ने BAP उम्मीदवार जयकृष्ण पटेल को समर्थन दिया. इसी तरह बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पहले यहां अरविंद डामोर को अपना उम्मीदवार बना दिया था. BAP के साथ गठबंधन होने के बाद कांग्रेस ने डामोर से नामांकन वापस लेने की अपील की मगर उन्होंने नाम वापस नहीं लिया और वे कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतर गए. कांग्रेस का साथ नहीं मिलने पर अरविंद डामोर को महज 61 हजार 211 वोट हासिल हुए.  

राजकुमार रोत के सांसद चुने जाने के बाद खाली हुई डूंगरपुर जिले की चौरासी सीट के उपचुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा. यहां BAP के अनिल कटारा ने BJP के कारीलाल निनामा को 24 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. यहां कांग्रेस के महेश रोत तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें महज 15 हजार 915 वोट हासिल हुए.

इसी तरह उदयपुर जिले की आदिवासी सलूंबर सीट के लिए हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस को बड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा. यहां BJP की शांता देवी मीणा को जीत मिली मगर उनकी टक्कर कांग्रेस से नहीं बल्कि BAP उम्मीदवार जितेश कटारा से रही. कांग्रेस को यहां महज 26 हजार 760 वोट हासिल हुए और वह तीसरे स्थान पर लुढ़क गई. 

उदयपुर के बड़े आदिवासी नेताओं में शुमार रहे रघुवीर मीणा भी कांग्रेस में अब हाशिए पर चले गए हैं. सलूंबर उपचुनाव में रघुवीर मीणा टिकट मांग रहे थे मगर पार्टी ने उनकी जगह रेशमा मीणा को उम्मीदवार बनाया मगर रेशमा मीणा अपनी जमानत भी नहीं बचा पाईं. 2018 के विधानसभा चुनाव में रेशमा ने कांग्रेस के खिलाफ बगावत की थी जिसके कारण यहां से कांग्रेस उम्मीदवार रहे रघुवीर मीणा को हार का सामना करना पड़ा. 2023 में कांग्रेस के वोट भारतीय आदिवासी पार्टी के हिस्से चले गए जिसके कारण रघुवीर मीणा को फिर हार का सामना करना पड़ा.  

सियासी मामलों के जानकार डॉ. गजेंद्र सिंह फोगाट कहते हैं, ''आदिवासी बहुल वागड़ और मेवाड़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है मगर भारतीय आदिवासी पार्टी के उभार ने कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. बांसवाड़ा में कांग्रेस के पास पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी जैसे कद्दावर नेता थे मगर अब वहां कांग्रेस के पास गिनाने तक के लिए भी कोई मजबूत नेता नहीं है.'' 

कांग्रेस मालवीय की वापसी को एक नेता नहीं बल्कि आदिवासी राजनीति में अपने खोऐ हुए भरोसे की फिर बहाली के तौर पर देख रही है. हालांकि इससे पहले यहां मालवीय के सामने खुद को साबित करने की चुनौती है.

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