लखनऊ में लोध समाज का जुटान क्यों कर रहा BJP को परेशान?
वैसे तो लोध या लोधी समाज BJP का समर्थक रहा है लेकिन पिछले लोकसभा में चुनाव में समाजवादी पार्टी भी इन्हें कुछ हद तक लुभाने में कामयाब रही थी

लखनऊ के एमजी मार्क स्थित विश्वेश्वरैया सभागार में 8 फरवरी की सुबह से ही हलचल थी. सभागार के बाहर लोध महासभा के झंडे, बैनर और पोस्टरों के बीच प्रदेश के अलग अलग जिलों से आए लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो चुकी थी. बुंदेलखंड से लेकर पश्चिमी यूपी और अवध तक, हर इलाके की पहचान बताते गमछे, टोपी और पारंपरिक पहनावे में लोग एक दूसरे से मिलते दिखे. सभागार के भीतर कुर्सियां भर चुकी थीं और बाहर खड़े लोगों को अंदर प्रवेश दिलाने के लिए स्वयंसेवक मशक्कत कर रहे थे.
यह कोई सामान्य सामाजिक कार्यक्रम नहीं था. लखनऊ में पहली बार लोध समाज इतनी बड़ी संख्या में एक मंच पर इकट्ठा हुआ था और इस जुटान ने सियासी गलियारों में पहले से ही हलचल पैदा कर दी थी. यह सम्मेलन लोध समाज की सबसे पुरानी सामाजिक संस्था “अखिल भारतीय लोधा, लोधी, लोध महासभा” के बैनर तले आयोजित किया गया था. आधिकारिक तौर पर कार्यक्रम का उद्देश्य महासभा की पत्रिका “अवंती चेतना” के विशेषांक का विमोचन और एक जागरूकता संगोष्ठी था. लेकिन मंच पर मौजूद चेहरे, सभागार में मौजूद जनसमूह और आयोजन का समय, सब कुछ इसे एक साधारण सामाजिक कार्यक्रम से कहीं आगे ले जा रहा था.
सम्मेलन में केंद्र सरकार में राज्य मंत्री बी. एल. वर्मा और योगी सरकार में पशुधन विकास विभाग के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे. इनके अलावा प्रदेश भर से आए लोध समाज के विधायक, पूर्व विधायक, जिला पंचायत सदस्य और बड़ी संख्या में BJP कार्यकर्ता भी कार्यक्रम का हिस्सा बने.
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस सम्मेलन पर इसलिए भी टिकी थी क्योंकि यह आयोजन ऐसे वक्त पर हुआ जब कुछ ही दिन पहले प्रदेश BJP अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जातीय सम्मेलनों और जुटानों से दूरी बनाए रखने का स्पष्ट निर्देश दिया था. इसके बावजूद लोध महासभा के झंडे तले यूपी BJP के लोध जाति के कई विधायक और सैकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी. सवाल यह था कि क्या यह सम्मेलन सिर्फ सामाजिक जागरूकता तक सीमित है या इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किसी बड़ी राजनीतिक लामबंदी की तैयारी है.
इस सम्मेलन की टाइमिंग और भी अहम इसलिए मानी जा रही है क्योंकि इससे कुछ दिन पहले महोबा जिले के चरखारी से लोध जाति के विधायक ब्रजभूषण राजपूत और योगी सरकार में जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के बीच “हर घर नल योजना” के अधूरे कार्यों को लेकर तीखी नोकझोंक हुई थी. यह टकराव सार्वजनिक रूप से सामने आया और इसके बाद लोध समाज के भीतर असंतोष की चर्चा तेज हो गई. ऐसे में लखनऊ में हुई यह बड़ी जुटान कई लोगों को एक सोची समझी राजनीतिक संदेशबाजी भी लगी.
हालांकि “अखिल भारतीय लोधा, लोधी, लोध महासभा” के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एटा से विधायक विपिन कुमार डेविड इन कयासों को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि लखनऊ सम्मेलन की रूपरेखा करीब एक महीने पहले ही तय कर ली गई थी और इसका मकसद समाज के भीतर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर खुलकर चर्चा करना था. डेविड के मुताबिक, “लोध समाज लंबे समय से अपनी हिस्सेदारी को लेकर सवाल उठा रहा है. सम्मेलन में इन्हीं मुद्दों पर बात हुई.” फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सम्मेलन के जरिए लोध बिरादरी ने अपनी एकजुटता का खुला प्रदर्शन किया. BJP संगठन के भीतर इसे शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अलग अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है. लोध समाज की यह सक्रियता BJP की उसी बैलेंसिंग रणनीति के सामने एक नई चुनौती के रूप में उभरी है.
उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों में यादव और कुर्मी के बाद लोध समाज एक प्रमुख राजनीतिक ताकत रहा है. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निधन के बाद यह समाज नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है. वर्ष 2001 में आई सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के अनुसार यूपी में पिछड़ी जातियों की कुल आबादी का 4.90 प्रतिशत हिस्सा लोध समाज का है. यह प्रतिशत यादवों की 19.40 और कुर्मियों की 7.46 प्रतिशत आबादी के बाद आता है. हालांकि विपिन कुमार डेविड इन आंकड़ों से सहमत नहीं हैं. उनका दावा है कि यूपी में पिछड़ी जातियों की कुल आबादी में लोध समाज की हिस्सेदारी सात प्रतिशत से अधिक है.
आंकड़े चाहे जो हों, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से लोध समाज की मौजूदगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं है. मेरठ से लेकर बस्ती, कौशांबी और पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र की करीब 150 विधानसभा सीटों पर लोध मतदाताओं की संख्या 10 हजार से एक लाख के बीच मानी जाती है. इनमें से करीब 80 विधानसभा सीटों पर लोध मतदाता 25 हजार से अधिक की संख्या में हैं. यही वजह है कि हर बड़े चुनाव से पहले यह समाज राजनीतिक दलों के लिए अहम हो जाता है.
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में लोध जाति के कुल 17 विधायक चुने गए थे, जिनमें से तीन समाजवादी पार्टी से थे. इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में 23 लोध विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. लोकसभा चुनावों में भी लोध समाज का प्रतिनिधित्व लगातार घटता-बढ़ता रहा है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में लोध जाति के तीन सांसद मुकेश राजपूत, साक्षी महाराज और अजेंद्र राजपूत चुने गए, जबकि 2019 में यह संख्या पांच थी. सरकार और संगठन में प्रतिनिधित्व की बात करें तो तस्वीर और भी सीमित नजर आती है. मौजूदा योगी सरकार में लोध समाज से सिर्फ दो मंत्री हैं. पशुधन विकास विभाग के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह और बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह. वहीं BJP के प्रदेश संगठन में लोध समाज से सिर्फ एक पदाधिकारी शंकरलाल हैं, जो प्रदेश मंत्री हैं. लगातार घटते इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व ने समाज के भीतर असंतोष और एकजुटता की जमीन तैयार की है.
लखनऊ सम्मेलन में इस भावना को मंच से भी खुलकर अभिव्यक्त किया गया. मुख्य अतिथि केंद्रीय राज्य मंत्री बी. एल. वर्मा ने अपने संबोधन में कहा, “देश और प्रदेश में लोधी समाज की जनसंख्या अच्छी खासी है, लेकिन उस हिसाब से राजनीति और सरकार में भागीदारी नहीं है. जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.” वर्मा का यह बयान सीधे तौर पर लोध समाज की वर्षों पुरानी मांग को सामने रखता है. लोध बिरादरी को लंबे समय से BJP का सबसे वफादार वोट बैंक माना जाता रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दौर से ही यह समाज हिंदुत्व और BJP के साथ मजबूती से खड़ा रहा. अयोध्या आंदोलन से लेकर सत्ता की राजनीति तक, कल्याण सिंह लोध समाज के निर्विवाद नेता के तौर पर उभरे थे. लेकिन उनके निधन के बाद यह समाज एक तरह की नेतृत्व शून्यता से जूझ रहा है.
BJP ने इस खालीपन को भरने के लिए कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह को आगे बढ़ाने की कोशिश की. उन्हें बेसिक शिक्षा विभाग का राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया. पार्टी की रणनीति थी कि कल्याण सिंह की विरासत के जरिए लोध समाज में नया नेतृत्व तैयार किया जाए. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रयोग अब तक सफल नहीं हो पाया. इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में साफ दिखा, जब संदीप सिंह के पिता और कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह को एटा लोकसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा. राजनीतिक विश्लेषक अमित राजपूत कहते हैं कि BJP की यह रणनीति जमीन पर असर नहीं दिखा सकी. उनके मुताबिक, “यूपी में कई जगह कल्याण सिंह की प्रतिमाओं की स्थापना, लखनऊ के कैंसर संस्थान का नाम उनके नाम पर रखना और उनके करीबी नेताओं को सरकार में जगह देना जैसी कोशिशें की गईं, लेकिन लोध समाज में इससे कोई मजबूत नेतृत्व उभर नहीं सका. अब समाज के भीतर नए और प्रभावी नेतृत्व की मांग तेज हो रही है.”
यूपी BJP में लोध जाति पर लंबे समय तक दो राजनीतिक परिवारों का प्रभाव रहा है. एक तरफ कल्याण सिंह का परिवार और दूसरी तरफ एटा के गंगा प्रसाद वर्मा का परिवार. गंगा प्रसाद वर्मा 1957 से लगातार छह बार हिंदू महासभा के टिकट पर विधायक चुने गए थे. इसके बाद उनके बड़े बेटे ने तीन बार BJP के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता. वर्ष 2017 से लगातार दो बार गंगा प्रसाद वर्मा के छोटे बेटे विपिन कुमार डेविड एटा से विधायक चुने जा रहे हैं. लखनऊ में आयोजित महासभा के कार्यक्रम के दौरान कई लोध नेताओं ने खुले तौर पर मांग की कि BJP कल्याण सिंह परिवार से इतर नेताओं को भी तवज्जो दे, ताकि समाज के भीतर एक व्यापक और प्रभावी नेतृत्व तैयार हो सके.
इस बीच समाजवादी पार्टी की बढ़ती सक्रियता ने भी BJP की चिंता बढ़ा दी है. अखिलेश यादव लगातार लोधी कार्ड खेलने की कोशिश करते रहे हैं. खासतौर पर हमीरपुर और महोबा जैसे लोध बहुल इलाकों में सपा की सक्रियता साफ दिखाई देती है. इसी क्षेत्र में इस बार समाजवादी पार्टी ने लोध समाज का सांसद जिताकर BJP के मजबूत गढ़ में सेंध लगा दी. यह संकेत BJP के लिए चेतावनी की तरह देखा जा रहा है. लखनऊ के विश्वेश्वरैया सभागार में हुआ यह सम्मेलन इसलिए भी अहम है क्योंकि इसने लोध समाज की नाराजगी, अपेक्षाओं और राजनीतिक महत्व, तीनों को एक साथ सामने रख दिया है. यह जुटान केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि एक ऐसा मंच बन गई जहां से आने वाले चुनावी संकेतों को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा.