बस्तर में पांचवीं के बजाय अब छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग क्यों उठ रही?
छठवीं अनुसूची केवल पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों जैसे असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों में लागू है. इसके तहत स्वायत्त जिला परिषदों और स्वायत्त क्षेत्रीय परिषदों का गठन होता है

बस्तर बदल रहा है. जैसे–जैसे यहां माओवादियों का प्रभाव कम हो रहा है, राजनीति व विकास से जुड़ी मांग, बहस, चर्चा आदि की श्रृंखला जुड़ने और बढ़ने लगी है. इलाके में एक बार फिर छठवीं अनुसूची की मांग उठनी शुरू हो गई है. इसका झंडा उठाया है पूर्व विधायक और राज्य के वरिष्ठ आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने. बीते 27 जनवरी को उनके नेतृत्व में सुकमा जिले में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया.
इसमें कुंजाम का कहना था, "बस्तर फिलहाल पांचवीं अनुसूची के दायरे में आता है. ग्राम सभाओं की मंजूरी महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है. कई जगहों पर फर्जी ग्राम सभाओं के जरिए जंगलों, पहाड़ियों और खनिज संसाधनों को निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है. पेसा कानून का जिक्र तो किया जाता है, मगर जमीन पर उसका असर न के बराबर दिखता है.’’
इलाके के आम आदिवासी इस बात से आशान्वित हैं कि माओवाद खत्म होने के बाद इस इलाके में विकास तेजी से आएगा. साथ ही संभावना भी बढ़ रही है कि उतनी ही तेजी से अब सरकार और कंपनियों की नजर बस्तर के खनिज-समृद्ध इलाकों पर पड़ेगी. आगे की आशंका यह है कि आदिवासियों को कहीं इसके चक्कर में अपने जल-जंगल-जमीन से बेदखल न होना पड़े.
मनीष कुंजाम छठवीं अनुसूची की मांग के बारे में दलील देते हैं, "छठवीं अनुसूची लागू होने से स्थानीय स्वशासी संस्थाओं को प्रशासनिक मामलों और संसाधनों पर सीधा नियंत्रण मिल जाएगा. इससे आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जमीन और जंगलों की बेहतर रक्षा संभव होगी. यह मांग किसी को विस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि बस्तर की मूल पहचान और संसाधनों को बचाने के लिए है.’’
क्या अंतर है पांचवीं और छठवीं अनुसूची में
भारत के संविधान में पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) और छठवीं अनुसूची (Sixth Schedule) का प्रावधान आदिवासी बहुल क्षेत्रों के प्रशासन और संरक्षण के लिए किया गया है. लेकिन दोनों के दायरे, अधिकारों और संरचना में महत्वपूर्ण अंतर है.
पांचवीं अनुसूची झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान जैसे राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों पर लागू है. इन क्षेत्रों का प्रशासन राज्य सरकार के अधीन रहता है. इसके लिए राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं. वे आदिवासी क्षेत्रों में लागू कानूनों को संशोधित कर सकते हैं या रोक सकते हैं. इन क्षेत्रों के विकास के लिए आदिवासी सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council) का गठन किया जाता है.. इसके माध्यम से आदिवासियों के हितों की रक्षा की जाती है. हालांकि, यहां स्वशासन की संस्थागत व्यवस्था सीमित है और वास्तविक सत्ता राज्य सरकार के पास रहती है.
इसके उलट, छठवीं अनुसूची केवल पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों जैसे असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों में लागू है. इसके तहत स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) और स्वायत्त क्षेत्रीय परिषदों का गठन होता है. इन परिषदों को भूमि, वन, जल, स्थानीय कर, न्याय (सीमित स्तर तक), संस्कृति और सामाजिक रीति-रिवाजों पर कानून बनाने का अधिकार होता है. यानी यहां आदिवासियों को कहीं अधिक स्वायत्तता और स्वशासन प्राप्त होता है. साधारण शब्दों में समझें तो पांचवीं अनुसूची संरक्षण और परामर्श पर केंद्रित है, जबकि छठवीं अनुसूची स्वायत्त शासन और विधायी अधिकार प्रदान करती है.
बस्तर संभाग (Bastar Division) में कुल 7 जिले हैं- बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर. अगर छठवीं अनुसूची लागू होती है तो इन जिलों में आदिवासियों की अपनी स्वायत्त सरकार होगी.
क्या लागू करना आसान होगा
ऐसे में दो सवाल महत्वपूर्ण है. पहला कि क्या छठवीं अनुसूची लागू होनी चाहिए और दूसरा कि क्या इसे लागू किया जा सकता है? इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री रह चुके वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम कहते हैं, "इसे लागू तो किया जा सकता है, लागू किया जाना चाहिए. लेकिन इसमें कई व्यवहारिक अड़चनें हैं. दरअसल बस्तर में कभी 80 प्रतिशत आदिवासी थे, अब उनकी संख्या 60 प्रतिशत रह गई है. छठवीं अनुसूची वहां लागू होती है जहां 90 या इससे अधिक प्रतिशत आदिवासी होते हैं. जहां सारा अधिकार आदिवासियों के हाथ में और आदिवासियों के लिए होता है.’’
अरविंद नेता आरोप लगाते हुए आगे यह भी कहते हैं, "इसे लागू करना केंद्र के अधीन है, लेकिन हमारे देश में केंद्र सरकार और नौकरशाही आदिवासियों के मामलों को गंभीरता से नहीं लेते. जब बंगाल में नक्सलवाद खत्म हो गया, तो फिर देश के बाकी राज्यों में क्यों पनपा. इसका मतलब है कि आदिवासियों को समझने में चूक हुई है.’’
बस्तर के स्थानीय लोग और उनसे सीधे संबंध रखनेवाले नेता तो इसकी मांग पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं. लेकिन राज्य की दो प्रमुख पार्टियां BJP और कांग्रेस फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य के वरिष्ठ आदिवासी नेता दीपक बैज ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है. जबकि स्थानीय आदिवासी अजीत नरुती कहते हैं, "हम बस यही चाहते हैं कि हमारे बस्तर पर बाहरी लोगों का नियंत्रण न हो. केवल अपनी जगह पर रहने भर के लिए हमारे हजारों लोगों का खून बह गया है. हमने इसके लिए यही शहादत दी है. यह बर्बाद नहीं होना चाहिए.’’ नरुती यह भी जानकारी देते हैं कि 10 फरवरी को भूमकाल दिवस के दिन एक बड़ी बैठक आयोजित होने जा रही है. जहां छठवीं अनुसूची की मांग के लिए एक बड़े आंदोलन की नींव रखे जाने की तैयारी की जाएगी.