मुरादाबाद के इलाकों से क्यों जुड़ रहे आतंकी नेटवर्क के तार?

मार्च में पांच दिन के भीतर तीन गिरफ्तारियों के बाद मुरादाबाद मंडल में आतंकी नेटवर्क और स्लीपर सेल की बढ़ती सक्रियता के कई निशान मिले हैं

UP ATS arrest BDS student from Moradabad
16 मार्च को मुरादाबाद से गिरफ्तार हारिस अली पर ऑनलाइन आतंकी नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद मंडल एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है. बीते कुछ दिनों में सामने आई घटनाओं ने इस पूरे इलाके को आतंकी गतिविधियों के संभावित हॉटस्पॉट के रूप में निशानदेही कर दी. बीते एक हफ्ते के भीतर तीन अलग-अलग मामलों में गिरफ्तारी ने यह संकेत दिया है कि यहां सिर्फ छिटपुट गतिविधियां नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क सक्रिय होने की आशंका है. 

12 मार्च को मुरादाबाद मंडल में आने वाले संभल की इरम को गाजियाबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया है. जांच में सामने आया कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के संपर्क में थी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिला विंग तैयार कर रही थी. इसके चार दिन बाद 16 मार्च को उत्तर प्रदेश ATS ने मुरादाबाद के कोठीवाल डेंटल कॉलेज से सहारनपुर निवासी बीडीएस सेकेंड ईयर के छात्र हारिस अली को गिरफ्तार किया.

हारिस पर आरोप है कि वह आतंकी संगठन ISIS के ऑनलाइन मॉड्यूल से जुड़ा था और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर धकेल रहा था. इसी दिन दिल्ली पुलिस ने रामपुर के एक किशोर को हिरासत में लिया, जो संदिग्ध गतिविधियों में शामिल पाया गया.

हारिस अली का मामला इस पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली को समझने में अहम कड़ी बनकर सामने आया है. जांच एजेंसियों के अनुसार, वह फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए मुस्लिम युवाओं का ब्रेनवॉश करता था और उन्हें कथित ‘जिहाद’ के नाम पर उकसाने की कोशिश करता था. उसने ‘अल इत्तेहाद मीडिया फाउंडेशन’ नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया था, जहां वह भड़काऊ वीडियो, ऑडियो और पोस्ट साझा करता था. 

हारिस ISIS के मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे ‘अल-नाबा’ और ‘दाबिक’ से सामग्री लेकर अपने ग्रुप्स में प्रसारित करता था. इतना ही नहीं, वह आत्मघाती हमलों के लिए भी लोगों को प्रेरित करने की कोशिश कर रहा था. जांच में यह भी सामने आया कि उसके संपर्क भारत के अलावा पाकिस्तान समेत अन्य देशों में मौजूद ISIS हैंडलर्स से भी थे.

इन घटनाओं को अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह पहली बार नहीं है जब मुरादाबाद मंडल आतंकी गतिविधियों को लेकर चर्चा में आया हो. 2014 में बिजनौर में सिमी से जुड़े आतंकियों के बम बनाते समय हुए विस्फोट ने पूरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता को उजागर किया था. इसके बाद से समय-समय पर संभल, रामपुर, अमरोहा और मुरादाबाद से संदिग्ध गतिविधियों और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आती रही हैं. संभल को लेकर तो सुरक्षा एजेंसियों के पास पहले से इनपुट रहे हैं कि यहां अलकायदा और ISIS जैसे संगठनों के प्रति झुकाव रखने वाले लोग सक्रिय रहे हैं. स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जाता रहा है कि संभल के कई युवा पाकिस्तान में मौजूद हैं और वहां से नेटवर्क संचालित करने में भूमिका निभा रहे हैं.

हाल के वर्षों में भी कई गिरफ्तारियां इस ट्रेंड को मजबूत करती हैं. रामपुर के फैजान को दो महीने पहले गुजरात ATS ने गिरफ्तार किया था. 2021 में रामपुर के अनस को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पकड़ा था. 2025 में मुरादाबाद के शहजीद को लखनऊ ATS ने गिरफ्तार किया. इससे पहले 2018 में अमरोहा से मुफ्ती सुहैल की गिरफ्तारी हुई थी, जिसे हरकत-उल-मुजाहिद्दीन से जुड़ा बताया गया था. इन सभी मामलों को जोड़कर देखें तो एक पैटर्न साफ दिखता है कि यह क्षेत्र लंबे समय से आतंकी संगठनों के लिए एक सॉफ्ट टारगेट बना हुआ है.

मुरादाबाद का नाम बार-बार सामने क्यों आ रहा है

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं. पहला कारण सामाजिक-आर्थिक है. इस क्षेत्र के कई इलाकों में बेरोजगारी, शिक्षा की कमी और सामाजिक असंतोष जैसे मुद्दे मौजूद हैं, जिनका फायदा उठाकर आतंकी संगठन युवाओं को अपने जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं. 

दूसरा बड़ा कारण इंटरनेट और सोशल मीडिया की आसान उपलब्धता है. अब कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने के लिए किसी जमीनी नेटवर्क की जरूरत नहीं रह गई है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाना आसान हो गया है, जैसा कि हारिस अली के मामले में देखने को मिला. तीसरा महत्वपूर्ण कारण सीमापार नेटवर्क का सक्रिय होना है. ISIS जैसे संगठन लंबे समय से भारत में स्लीपर सेल तैयार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. इसके लिए स्थानीय युवाओं को टारगेट किया जाता है, उन्हें धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित किया जाता है और फिर उन्हें छोटे-छोटे कामों में लगाया जाता है. इरम का मामला इसी दिशा में इशारा करता है, जहां महिला विंग तैयार करने की कोशिश की जा रही थी.

यूपी ATS में तैनात एक अधिकारी बताते हैं, “इन आतंकी तत्वों की मॉडस ऑपरेंडी भी समय के साथ बदलती दिख रही है. पहले जहां फिजिकल मीटिंग्स और ट्रेनिंग कैंप के जरिए नेटवर्क तैयार होता था, वहीं अब डिजिटल प्लेटफॉर्म इसका मुख्य माध्यम बन चुके हैं. फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए युवाओं को जोड़ा जाता है. उन्हें धार्मिक भावनाओं के नाम पर भड़काया जाता है और धीरे-धीरे उन्हें कट्टरपंथी बना दिया जाता है. इसके बाद उन्हें छोटे-छोटे टास्क दिए जाते हैं, जैसे प्रचार सामग्री फैलाना, नए लोगों को जोड़ना या संवेदनशील जानकारी जुटाना.” 

अब यह भी अहम सवाल है कि आखिर सुरक्षा एजेंसियां इन्हें शुरुआत में क्यों नहीं पकड़ सकीं. इसका जवाब भी इसी बदलती रणनीति में छिपा है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले ये नेटवर्क काफी गुप्त तरीके से ऑपरेट करते हैं. फर्जी पहचान, वीपीएन और एन्क्रिप्टेड चैट के कारण इनकी ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है. इसके अलावा, ये लोग शुरुआत में कोई बड़ा कदम नहीं उठाते, जिससे वे लंबे समय तक एजेंसियों की नजर से बचे रहते हैं. जब तक इनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिलते, तब तक कार्रवाई करना भी आसान नहीं होता. हालांकि, हाल की गिरफ्तारियों से यह साफ है कि सुरक्षा एजेंसियां अब ज्यादा सतर्क और सक्रिय हो गई हैं. ATS, खुफिया एजेंसियां और स्थानीय पुलिस मिलकर ऐसे नेटवर्क की पहचान और उन्हें तोड़ने में जुटी हैं. सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को मजबूत किया गया है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाया गया है.

सरकार की ओर से भी इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है. एक तरफ जहां सुरक्षा एजेंसियों को आधुनिक तकनीक और संसाधनों से लैस किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामुदायिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. युवाओं को कट्टरपंथ से दूर रखने के लिए शिक्षा, रोजगार और काउंसलिंग पर भी जोर दिया जा रहा है. 

यूपी गृह विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है. अलग-अलग राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया को तेज किया गया है. हाल के मामलों में भी यह देखने को मिला कि अलग-अलग एजेंसियों के समन्वय से ही इन आरोपियों तक पहुंचना संभव हो पाया.

मुरादाबाद मंडल में बढ़ती इन गतिविधियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि खतरा सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है. ऐसे में जरूरत है कि सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ समाज भी सतर्क रहे. परिवार, शिक्षण संस्थान और स्थानीय समुदाय अगर समय रहते संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी साझा करें, तो कई बड़े खतरे टाले जा सकते हैं. 

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