मुंबई लोकल में हुई हत्या को क्यों नहीं रोका जा सका?

दुनिया का सबसे व्यस्त मुंबई लोकल ट्रेन नेटवर्क हर दिन करीब एक करोड़ यात्रियों को ढोता है. ऐसे में एयरपोर्ट और मेट्रो जैसी सुरक्षा व्यवस्था लागू करना लगभग असंभव है

2024 के दौरान मुंबई लोकल में दो हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई

23 जून की रात 10 बजे के पांच मिनट बाद तेज बारिश हो रही थी, जब 22 वर्षीय मयंक लोहार अंधेरी स्टेशन पर चर्चगेट-नालासोपारा फास्ट लोकल में सवार हुए. कुछ ही मिनटों में उनकी चाकू मारकर हत्या कर दी गई. 

विवाद कोच का दरवाजा बंद करने को लेकर हुआ था. हत्या में जिस हथियार का इस्तेमाल हुआ, वह एक बड़ा चाकू था जिसे दूसरे यात्री ने अपने बैग से निकाला था. घटना चलती ट्रेन में हुई और आरोपी बोरीवली स्टेशन पहुंचने से पहले ही फरार हो गया.

कोच के अंदर से बने मोबाइल वीडियो में एक व्यक्ति के हाथ में चाकू और फर्श पर खून दिखाई दिया. पश्चिम रेलवे ने घटना की पुष्टि की. सरकारी रेलवे पुलिस (GRP) ने 24 घंटे के भीतर एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया. 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, सभी राज्यों में महाराष्ट्र में रेलवे से जुड़े सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए. इनमें हत्या, चोरी और हमला जैसे अपराध शामिल हैं. रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के तहत 1,57,418 और GRP के तहत 20,519 मामले दर्ज किए गए. महाराष्ट्र में रेलवे संपत्ति पर चोरी के 19,266 मामले दर्ज हुए, जो सबसे ज्यादा थे. देशभर में GRP के अधिकार क्षेत्र में हत्या के 173 मामले दर्ज किए गए. इनमें पश्चिम बंगाल (29), हरियाणा (24) और बिहार (16) में सबसे ज्यादा मामले थे.

GRP दुर्घटनाओं में होने वाली ‘अस्वाभाविक मौतों’ का भी रिकॉर्ड दर्ज करती है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की ओर से लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार 2024 में मुंबई लोकल में 2,282 लोगों की मौत हुई. ये मौतें रेलवे ट्रैक पर अनधिकृत प्रवेश, चलती ट्रेन से गिरने, खंभों से टकराने और प्लेटफॉर्म व ट्रेन के बीच की खाई में फिसलने जैसी घटनाओं में हुईं. यह संख्या देश में सबसे ज्यादा थी. 2023 में ऐसी 2,536 और 2022 में 2,426 मौतें हुई थीं.

RPF के पूर्व महानिदेशक अरुण कुमार कहते हैं कि रेलवे में अपराध नियंत्रण ‘बहुस्तरीय समस्या’ है. सिग्नल क्षेत्र के बाहर स्थानीय पुलिस का अधिकार क्षेत्र होता है. दो रेलवे सिग्नलों के बीच GRP जिम्मेदार होती है. वहीं यात्रियों और रेलवे संपत्ति की सुरक्षा RPF देखती है. कुमार कहते हैं, "यह तीन-स्तरीय व्यवस्था प्रभावी अपराध नियंत्रण में दिक्कत पैदा करती है. वर्षों में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है."

लोहार की हत्या के बाद सवाल उठा कि हत्यारा भीड़भाड़ वाली ट्रेन में इतना घातक हथियार लेकर कैसे पहुंच गया. इसका जवाब आंकड़ों में छिपा है. मुंबई लोकल में 150 स्टेशनों और 450 किलोमीटर के नेटवर्क पर 3,234 ट्रेन चलती हैं. मध्य रेलवे में हफ्ते के पांच कामकाजी दिनों में रोज करीब 62 लाख यात्री सफर करते हैं. पश्चिम रेलवे में करीब 31 लाख यात्री यात्रा करते हैं. यानी कुल मिलाकर हर दिन लगभग 93 लाख या करीब एक करोड़ यात्री सफर करते हैं. 5 जनवरी को, जो अब तक का सबसे व्यस्त दिन था, यात्रियों की संख्या 1.24 करोड़ से अधिक पहुंच गई थी.

पीक आवर्स में हर 3 से 5 मिनट पर ट्रेन आती है. दादर या अंधेरी जैसे बड़े स्टेशनों पर 12 डिब्बों वाली ट्रेन सिर्फ 10 से 15 सेकंड के लिए रुकती है. इन ट्रेनों में प्राकृतिक वेंटिलेशन है. इनमें न एयर कंडीशनिंग है और न ही दरवाजे अपने आप बंद होने की व्यवस्था. अगर दरवाजे बंद किए जाएं तो यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय लग सकता है. ऐसे हालात में एयरपोर्ट जैसी बैगेज स्क्रीनिंग या दिल्ली मेट्रो जैसी तलाशी व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक नहीं है. रेलवे स्टेशनों पर 3,386 सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और कोचों में भी कैमरे बढ़ाए जा रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ अपराध रिकॉर्ड कर सकते हैं उसे रोक नहीं सकते.

भीड़भाड़ इस व्यवस्था की ढांचागत समस्या है. 12 डिब्बों वाली एक ट्रेन करीब 2,000 यात्रियों के लिए बनाई गई है. लेकिन पीक आवर्स में इसमें आसानी से 4,500 यात्री सवार हो जाते हैं. इंजीनियर इसे ‘सुपर डेंस क्रश लोड’ कहते हैं, यानी प्रति वर्ग मीटर 14 से 16 खड़े यात्री. सांस लेने भर की भी जगह मुश्किल से बचती है. ऐसे में कोहनी की जगह, बैग या दरवाजा बंद करने को लेकर झगड़े होना आम बात है. ज्यादातर मामलों में बात सिर्फ बहस तक रहती है. लेकिन कुछ मामलों में, जैसे लोहार के मामले में, नतीजा हत्या तक पहुंच जाता है.

लोकट रेल मुंबई की जीवनरेखा है. छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से कल्याण तक की दूरी करीब 51 किलोमीटर है. सेकेंड क्लास कोच में 15 रुपए के किराए पर यह सफर 75 से 80 मिनट में पूरा हो जाता है. यही दूरी सड़क मार्ग से पीक समय में तय करने में दो घंटे से भी ज्यादा लग सकते हैं.

मुंबई मेट्रो को अक्सर समाधान के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन वह चार लाइनों पर रोज सिर्फ 9 लाख यात्रियों को ढोती है. यह लोकल के 93 लाख दैनिक यात्रियों का केवल दसवां हिस्सा है. करजत, कसारा और विरार जैसे दूरदराज के इलाकों तक मेट्रो कॉरिडोर ही नहीं हैं. 52,000 करोड़ रुपए की तीन चरणों वाली मुंबई अर्बन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के जरिए नई रेलवे लाइनें, वातानुकूलित लोकल ट्रेनें और मेट्रो कॉरिडोर जोड़े गए हैं. लेकिन इन सबकी संयुक्त क्षमता भी मुंबई लोकल के बराबर नहीं पहुंचती. शहर लगातार फैल रहा है लेकिन परिवहन के विकल्प उसी गति से नहीं बढ़ रहे.

दुनिया के सबसे व्यस्त रेल नेटवर्क की सच्चाई यही है कि वह लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचा सकती है लेकिन उनकी जांच नहीं कर सकती. वह शहर को चलाए रखती है लेकिन हर यात्री की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती.

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