BSP ब्राह्मणों को कैसे रिझा रही; क्या मायावती 2007 वाला इतिहास दोहरा पाएंगी?
BSP ने 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी और तब ब्राह्मणों ने पार्टी का भरपूर साथ दिया था

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण वोटर हमेशा से एक निर्णायक कारक रहे हैं. 1990 के दशक के बाद जिस तरह मंडल बनाम कमंडल की राजनीति उभरी, उसमें सवर्ण मतदाता धीरे-धीरे अलग-अलग दलों में बंटते चले गए. बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने एक समय इस वर्ग को अपने साथ जोड़कर इतिहास रचा, लेकिन फिर वही वर्ग उससे दूर भी होता चला गया.
अब सवाल यह है कि क्या BSP एक बार फिर ब्राह्मणों का भरोसा जीतने की स्थिति में है, या यह कोशिश सिर्फ एक सीमित राजनीतिक संदेश तक सिमट कर रह जाएगी. दरअसल लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित पार्टी कार्यालय में 15 जनवरी को अपने 70वें जन्मदिन पर मायावती ने जिस तरह ब्राह्मणों को सीधे संबोधित किया, उसने इस बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है.
मायावती ने न सिर्फ यह दावा किया कि ब्राह्मणों की सम्मान, प्रतिनिधित्व और आजीविका से जुड़ी आकांक्षाएं केवल BSP शासन में पूरी हुईं, बल्कि यह भी कहा कि BJP, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को गुमराह कर रही हैं. उनके बयान का समय और लहजा, दोनों यह संकेत देते हैं कि BSP 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवर्ण वोटरों को लेकर एक नई या कहें पुनर्जीवित रणनीति पर काम कर रही है.
ब्राह्मणों को लेकर BSP की पुरानी रणनीति
राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के प्रतिष्ठित अवध गर्ल्स कालेज की प्राचार्य बीना राय बताती हैं, “BSP की राजनीति की नींव दलित आंदोलन पर टिकी रही है. कांशीराम ने शुरू से यह साफ किया था कि सत्ता की चाबी तभी हाथ आएगी, जब बहुजन समाज के साथ कुछ सवर्ण वर्ग भी जुड़ेंगे. इसी सोच से “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का नारा निकला, जो बाद में मायावती की राजनीति की पहचान बना.”
2007 का विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण था. उस चुनाव में BSP ने खुलकर ब्राह्मणों को साधा. टिकट वितरण में बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे गए. पार्टी के भीतर इस जाति के चेहरों को आगे किया गया. “ब्राह्मण भाईचारा समितियों” का गठन हुआ और मायावती ने खुद कई ब्राह्मण सम्मेलनों को संबोधित किया. नतीजा यह हुआ कि दलित-ब्राह्मण गठजोड़ ने BSP को पूर्ण बहुमत दिला दिया.
यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण था, जब BSP ने अपने दम पर सरकार बनाई. बीना राय कहती हैं, “2007 में ब्राह्मणों का समर्थन BSP को इसलिए मिला क्योंकि उस वक्त सपा के शासन से कानून-व्यवस्था को लेकर असंतोष था और BJP कमजोर दौर से गुजर रही थी. मायावती ने ब्राह्मणों को यह भरोसा दिया कि सत्ता में उनकी भागीदारी होगी और प्रशासनिक स्तर पर उन्हें सम्मान मिलेगा.”
2007 के बाद बढ़ती दूरी के कारण
लेकिन ब्राह्मणों के साथ यह गठजोड़ लंबे समय तक टिक नहीं पाया. 2012 का विधानसभा चुनाव आते-आते ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा BSP से दूर हो चुका था. इसके कई कारण बताए जाते हैं. पहला कारण सत्ता के दौरान पैदा हुई यह धारणा थी कि BSP सरकार में असली प्राथमिकता दलित प्रतीकों और स्मारकों को दी जा रही है, जबकि ब्राह्मणों की अपेक्षाओं पर उतना ध्यान नहीं दिया गया.
इसके अलावा टिकट वितरण और संगठन में ब्राह्मणों की भागीदारी धीरे-धीरे सीमित होती चली गई. वहीं भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कठोरता को लेकर बनी नकारात्मक छवि ने भी मध्यमवर्गीय सवर्ण मतदाताओं को प्रभावित किया. लखनऊ के ब्राह्मण नेता डी.एस. मिश्र मानते हैं, “2007 के बाद मायावती ने यह मान लिया कि ब्राह्मण वोट उनके साथ स्वाभाविक रूप से रहेगा, जबकि राजनीति में कोई भी समर्थन स्थाई नहीं होता. BJP ने इसी खाली जगह को धीरे-धीरे भरना शुरू किया.”
2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में BJP ने सवर्ण मतदाताओं, खासकर ब्राह्मणों, को बड़े पैमाने पर अपने साथ जोड़ लिया. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार को ब्राह्मणों के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला, भले ही बाद के वर्षों में इस वर्ग के भीतर असंतोष भी उभरा.
मौजूदा दौर में BSP का नया संदेश
मायावती का हालिया बयान इसी असंतोष को भुनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. BJP द्वारा अपने ही ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी को समुदाय-आधारित बैठक और डिनर में शामिल होने को लेकर चेतावनी देने की खबरों ने इस वर्ग में एक संदेश दिया कि पार्टी नेतृत्व ऐसी पहलों को शक की नजर से देख रहा है. मायावती ने इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि ब्राह्मणों को न तो किसी “बाटी-चोखा” की जरूरत है और न ही वे धमकियों से डरने वाले हैं. राजनीतिक विश्लेषक संजय पांडे कहते हैं, “मायावती का यह बयान प्रतीकात्मक से ज्यादा राजनीतिक है. वे यह दिखाना चाहती हैं कि BSP ही वह पार्टी है जो ब्राह्मणों को सम्मान और सुरक्षा का भरोसा दे सकती है, बिना उन्हें किसी दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा किए.”
BSP की मौजूदा रणनीति में एक संतुलन साफ दिखता है. एक तरफ मायावती सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को भरोसा दिला रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वह बार-बार यह दोहराती हैं कि दलित, पिछड़े, मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक उनकी प्राथमिकता बने रहेंगे. यह वही “सर्वजन” वाला प्रयोग है, जिसे नए सियासी हालात में फिर से आजमाने की कोशिश की जा रही है.
गठबंधन से इनकार और उसका असर
मायावती ने साफ कर दिया है कि BSP 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी. उनके मुताबिक गठबंधन से BSP का वोट तो दूसरे दलों को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन खासकर सवर्ण वोट BSP को नहीं मिलते. यह बयान अपने आप में एक स्वीकारोक्ति भी है कि सवर्ण मतदाता अब भी BSP के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. राजनीतिक टिप्पणीकार अमित कुमार कहते हैं, “मायावती जानती हैं कि अगर उन्हें ब्राह्मणों का भरोसा फिर से जीतना है, तो यह काम किसी गठबंधन के सहारे नहीं होगा. उन्हें खुद मैदान में उतरकर यह साबित करना होगा कि BSP सत्ता में आई तो ब्राह्मणों की हिस्सेदारी सिर्फ चुनावी वादे तक सीमित नहीं रहेगी.”
हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि BSP का संगठन पिछले कुछ वर्षों में कमजोर पड़ा है. कैडर आधारित राजनीति, जो कभी उसकी ताकत थी, अब उतनी सक्रिय नहीं दिखती. ब्राह्मण समाज के भीतर भी नई पीढ़ी के मतदाता हैं, जिनका BSP के 2007 वाले दौर से भावनात्मक जुड़ाव नहीं है. कानपुर के एक ब्राह्मण सामाजिक कार्यकर्ता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “BJP से नाराजगी है, खासकर प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक व्यवहार को लेकर. लेकिन BSP को लेकर भी सवाल हैं. क्या पार्टी अब भी उतनी ही मजबूत है? क्या वह सत्ता में आने की स्थिति में है? ब्राह्मण वोटर अब भावनाओं से ज्यादा व्यावहारिक सोचता है.”
तो क्या BSP ब्राह्मणों का भरोसा जीतने में कामयाब हो पाएगी? इसका सीधा जवाब अभी देना मुश्किल है. मायावती का ताजा रुख यह जरूर दिखाता है कि पार्टी सवर्णों को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है. 2007 का अनुभव BSP के पास एक मिसाल के रूप में है, लेकिन 2027 का उत्तर प्रदेश 2007 से काफी अलग है.