मथुरा कैसे बन रही BJP के लिए 2027 की रणनीतिक धुरी?

राम मंदिर के बाद मथुरा पर बढ़ता BJP का फोकस अब सिर्फ धार्मिक प्रतीक तक सीमित नहीं रह गया है

janmashtami, mathura
मुुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बीते साल जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा पहुंचे थे

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद BJP के लिए सबसे बड़ा सवाल यह था कि अगला प्रतीकात्मक और राजनीतिक पड़ाव कौन-सा होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी नेतृत्व के पिछले बयानों और गतिविधियों को देखें तो जवाब साफ है- मथुरा. 

खुद पीएम मोदी ने 23 नवंबर 2023 को मथुरा में कहा था कि काशी और अयोध्या के बाद अब मथुरा की बारी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बीते साल होली के मौके पर और फिर लोकसभा चुनाव के दौरान सांसद हेमा मालिनी के नामांकन के समय यही बात दोहराई. 

वृंदावन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ 'मन की बात' सुनते हुए

इन बयानों को महज धार्मिक भावनाओं से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. इसके पीछे साफ राजनीतिक गणित और 2027 की तैयारी छिपी है. इसी कड़ी में BJP के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का पहला उत्तर प्रदेश दौरा और उसकी शुरुआत मथुरा से होना खास महत्व रखता है. 20 जनवरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार संभालने के बाद नितिन नबीन 25 जनवरी को पहली बार मथुरा पहुंचे. उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी मौजूद रहे. कार्यक्रम का औपचारिक बहाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात सुनना था, लेकिन संदेश कहीं ज्यादा बड़ा और गहरा था. 

वृंदावन के अक्षय पात्र स्थित चंद्रोदय मंदिर परिसर में मन की बात सुनने के बाद नितिन नबीन ने जिस तरह से अपने अध्यक्षीय कार्यकाल की शुरुआत मथुरा से की, उसे पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा गया. उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल की खुलकर सराहना की, विपक्ष पर तीखा हमला बोला और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से जुट जाने का आह्वान किया. 

मथुरा को केंद्र में रखने की BJP की रणनीति का सबसे संवेदनशील और प्रभावी पहलू कृष्ण जन्मभूमि विवाद है. पिछले एक साल में इस विवाद ने कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर फिर से गति पकड़ी है. श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़े मामलों में निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक सुनवाई चल रही है. कई याचिकाओं में ईदगाह मस्जिद के सर्वे और विवादित ढांचे के धार्मिक स्वरूप को लेकर दावे किए गए हैं. हालांकि BJP सीधे तौर पर अदालत में चल रहे मामलों पर टिप्पणी से बचती रही है, लेकिन पार्टी नेताओं के बयान और गतिविधियां यह संकेत जरूर देती हैं कि यह मुद्दा उसके राजनीतिक एजेंडे में अहम स्थान रखता है. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बार-बार दिए गए बयान, जिनमें उन्होंने कहा कि “जिसने गलती की है, उसे सच स्वीकार करना होगा”, मथुरा विवाद से जोड़कर देखे जाते हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि BJP ने कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे पर अयोध्या जैसी खुली आक्रामकता नहीं दिखाई है, लेकिन यह एक सोची-समझी रणनीति है. सामाजिक व राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आर.के. पांडेय कहते हैं, “BJP इस मुद्दे को अदालत और सामाजिक विमर्श के रास्ते आगे बढ़ने देना चाहती है. पार्टी जानती है कि मथुरा का मामला भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील है और इसका राजनीतिक लाभ लंबी अवधि में मिलेगा.” वहीं बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “अयोध्या के बाद BJP को एक नए सांस्कृतिक प्रतीक की जरूरत थी. मथुरा वह खाली जगह भरता है. नितिन नबीन का पहला दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है.” 

मथुरा पर BJP का बढ़ता फोकस सिर्फ राष्ट्रीय नेतृत्व तक सीमित नहीं है. प्रदेश स्तर पर भी यही तस्वीर दिखती है. 14 दिसंबर को यूपी BJP के अध्यक्ष की कमान संभालने वाले पंकज चौधरी ने 27 दिसंबर को अपने संगठनात्मक सफर की शुरुआत वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से की. पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने ब्रज यात्रा शुरू की और पार्टी के प्रेरणा स्रोत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मस्थली नगला चंद्रभान जाकर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया. इसके बाद आगरा में ब्रज क्षेत्र की पहली बड़ी संगठनात्मक बैठक हुई. उन्होंने 2027 विधानसभा चुनाव में ब्रज क्षेत्र से प्रचंड जीत दिलाने का वचन कार्यकर्ताओं से लिया. यह सब उस समय हो रहा है, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में ब्रज क्षेत्र में BJP के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है.

आंकड़े बताते हैं कि ब्रज क्षेत्र BJP के लिए कितना अहम है और साथ ही कितनी बड़ी चुनौती भी. संगठनात्मक दृष्टि से ब्रज क्षेत्र में 13 लोकसभा और 65 विधानसभा सीटें आती हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में BJP ने यहां की 13 में से 11 सीटें जीती थीं. 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 12 हो गया. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी केवल 8 सीटों पर सिमट गई. हालांकि विधानसभा चुनावों में स्थिति थोड़ी बेहतर रही है, लेकिन वहां भी ट्रेंड चिंता बढ़ाने वाला है. 2017 के विधानसभा चुनाव में ब्रज क्षेत्र की 65 में से 57 सीटें BJP ने जीती थीं. 2022 में यह संख्या घटकर 53 रह गई. आगरा और अलीगढ़ मंडल, जो ब्रज क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हैं, वहां 2022 में 40 में से 33 सीटें BJP के खाते में गईं, जबकि 7 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की. आगरा में BJP ने 2017 और 2022 दोनों चुनावों में 9 की 9 सीटें जीतीं, लेकिन अलीगढ़, एटा और मथुरा जैसे जिलों में मुकाबला धीरे-धीरे कड़ा होता जा रहा है.

यही वजह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी ब्रज क्षेत्र पर फोकस लगातार बढ़ा है. योगी सरकार के दौरान मथुरा और आसपास के इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यटन और धार्मिक स्थलों के विकास पर खास ध्यान दिया गया है. वृंदावन कॉरिडोर, मथुरा-वृंदावन के सड़क प्रोजेक्ट, यमुना सफाई और ब्रज क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा मानी जाती हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ मथुरा को सिर्फ एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि BJP के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अगली प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं. सुशील पांडेय कहते हैं, “योगी आदित्यनाथ की राजनीति में प्रतीकात्मकता बहुत अहम है. काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर और अयोध्या में राम मंदिर के बाद मथुरा अगला स्वाभाविक कदम है. इससे BJP को वैचारिक और चुनावी दोनों स्तर पर फायदा दिखता है.”

हालांकि, BJP के लिए ब्रज क्षेत्र की राह पूरी तरह आसान नहीं है. समाजवादी पार्टी ने इस इलाके में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटों की संख्या घटने के बाद BJP को यह अहसास हुआ है कि ब्रज क्षेत्र में जातीय और स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सपा ने खासतौर पर यादव, जाट और मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिशें तेज कर दी हैं. स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने, किसान मुद्दों को उठाने और बेरोजगारी जैसे सवालों को सामने लाने की रणनीति पर सपा काम कर रही है. मथुरा के रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक आलोक शर्मा बताते हैं, “मथुरा और ब्रज क्षेत्र में धार्मिक ध्रुवीकरण अब भी असरदार है, लेकिन यह अकेला फैक्टर नहीं रहा. सपा ने पिछले कुछ सालों में स्थानीय असंतोष को पकड़ने की कोशिश की है. BJP का मथुरा पर फोकस इस चुनौती का जवाब भी है.” 

BJP के सामने एक और चुनौती कार्यकर्ताओं की नाराजगी और संगठनात्मक ढीलापन है, जिसकी झलक 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखी. इसी वजह से पंकज चौधरी और नितिन नबीन दोनों ने अपने भाषणों में बार-बार बूथ स्तर पर सक्रियता की बात कही. संदेश साफ है कि मंदिर और प्रतीक के साथ-साथ संगठन की जमीन भी मजबूत करनी होगी.

Read more!