यूपी में लाइनमैनों के लिए जान का खतरा कम क्यों नहीं हो पा रहा?

शटडाउन में लापरवाही, सुरक्षा किट की कमी और संविदा व्यवस्था के बीच यूपी में बिजली विभाग के लाइनमेन लगातार हादसों का शिकार हो रहे हैं

सुल्तानपुर में लाइनमैन की मौत. (Photo: Representational )
लाइनमैनों का आरोप है कि उन्हें जरूरी सुरक्षा उपकरण तक नहीं मिलते (फाइल फोटो)

लखनऊ के कल्याणपुर इलाके में जगरानी अस्पताल के पास रिंग रोड पर 27 फरवरी की देर रात 45 वर्षीय संविदा लाइनमैन परशुराम रावत बिजली लाइन ठीक करने के लिए खंभे पर चढ़े थे. रात करीब दो बजे का समय था. साथियों के मुताबिक काम शुरू करने से पहले उन्होंने बिजली घर से शटडाउन मांगा था, लेकिन आरोप है कि लाइन चालू रहने के दौरान ही उन्हें तार जोड़ने का निर्देश दिया गया.

जैसे ही उन्होंने सीढ़ी लगाई, 33 केवी लाइन से जोरदार करंट लगा और वह नीचे गिर पड़े. मौके पर ही उनकी मौत हो गई. परशुराम पिछले करीब 20 वर्षों से संविदा पर बिजली विभाग में काम कर रहे थे. उनके परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है. हादसे के बाद गुस्साए परिजन और साथी कर्मचारियों ने शव को सड़क पर रखकर घंटों प्रदर्शन किया. मृतक की बेटी तनु का सवाल था, “अगर काम के दौरान बिजली नहीं काटी गई, तो जिम्मेदार कौन है?”

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है. उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को दुरुस्त रखने वाले हजारों लाइनमैन हर दिन इसी तरह के जोखिम के बीच काम करते हैं. बिजली के खंभों और ट्रांसफार्मरों पर चढ़कर फॉल्ट ठीक करने वाले ये कर्मचारी अक्सर खुद ही सुरक्षा व्यवस्था के अभाव में जान गंवा देते हैं. फरवरी में ही प्रदेश के अलग-अलग जिलों में हुई घटनाएं बताती हैं कि बिजली कर्मियों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है.

सोनभद्र जिले के करमा थाना क्षेत्र के जोगनी लोढ़ौता गांव में 26 फरवरी की शाम संविदा लाइनमैन संतोष धरिकार ट्रांसफार्मर चढ़ाने के दौरान करंट की चपेट में आ गए. उन्हें गंभीर हालत में वाराणसी के ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. जांच के बाद विभाग ने इस मामले में एग्जिक्यूटिव इंजीनियर, एसडीओ और जेई को निलंबित कर दिया, जबकि दो संविदा कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया.

इसी तरह 15 फरवरी को कुशीनगर जिले के रामपुर बुजुर्ग इलाके में 38 वर्षीय संविदा लाइनमैन अमरजीत सिंह ट्रांसफार्मर पर तार जोड़ते समय करंट की चपेट में आ गए. बताया गया कि शटडाउन लेने के बावजूद अचानक बिजली आपूर्ति बहाल हो गई और वे बुरी तरह झुलस गए. अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई.

इन घटनाओं का पैटर्न लगभग एक जैसा है. अधिकतर मामलों में या तो लाइन पूरी तरह बंद नहीं की जाती या बिना सूचना के बिजली आपूर्ति चालू कर दी जाती है. नतीजा यह होता है कि खंभे पर काम कर रहा लाइनमैन सीधे हाई-टेंशन करंट की चपेट में आ जाता है.

आंकड़ों में हादसों की भयावह तस्वीर

उत्तर प्रदेश में बिजली से होने वाले हादसों के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं हैं. विद्युत सुरक्षा निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में करंट से मौत के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. वर्ष 2022-23 में राज्य में करंट लगने से 1,428 लोगों की मौत हुई थी. इसका मतलब है कि औसतन हर दिन करीब चार लोग बिजली के करंट से जान गंवा रहे थे. अगर पिछले ढाई वर्षों के आंकड़ों को देखें तो स्थिति और गंभीर दिखाई देती है. मार्च 2023 से सितंबर 2025 के बीच बिजली से जुड़े हादसों में 3,606 लोगों की मौत दर्ज की गई.

इनमें 257 बिजली कर्मचारी भी शामिल थे. इसी अवधि में हजारों लोग घायल हुए और लगभग 11 हजार बिजली हादसे दर्ज किए गए. वित्तीय वर्ष के हिसाब से देखें तो 2023-24 में 103 बिजली कर्मियों की मौत, 2024-25 में 105 और 2025-26 (सितंबर 2025 तक) में 49 बिजली कर्मियों की मौत हुई है. यानी हर साल बड़ी संख्या में बिजली कर्मी काम के दौरान जान गंवा रहे हैं.

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार बिजली वितरण व्यवस्था में सबसे ज्यादा जोखिम लाइनमैन के काम में होता है. गांव से लेकर शहर तक बिजली की सप्लाई बनाए रखने, फॉल्ट ठीक करने, ट्रांसफार्मर बदलने और नई लाइन जोड़ने जैसे काम इन्हीं के जिम्मे होते हैं. आंधी, बारिश, ठंड या गर्मी-हर मौसम में ये कर्मचारी खंभों पर चढ़कर बिजली व्यवस्था को दुरुस्त करते हैं. कई बार रात में भी फॉल्ट आने पर इन्हें तुरंत मौके पर जाना पड़ता है. लेकिन विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था को यह ठीक करते हैं, वही व्यवस्था उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाती.

असुरक्ष‍ित हैं लाइनमैन का जीवन

कई जिलों में लाइनमैनों का आरोप है कि उन्हें जरूरी सुरक्षा उपकरण तक नहीं मिलते. उदाहरण के तौर पर बलिया जिले में संविदा लाइनमैनों का कहना है कि एक वर्ष से अधिक समय से उन्हें टूल किट नहीं दी गई है. नियम के अनुसार ठेकेदार को सभी संविदा कर्मचारियों को हेलमेट, ग्लव्स, प्लास, सेफ्टी बेल्ट, सुरक्षा जूते और अन्य उपकरण देना होता है. लेकिन कई जगह पुरानी किट खराब हो जाने के बाद भी नई किट उपलब्ध नहीं कराई जाती.

ऐसे में कर्मचारियों को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरण के ही खंभों पर चढ़कर एलटी लाइन से लेकर 11 केवी और 33 केवी तक की हाई-टेंशन लाइनों पर काम करना पड़ता है. पावर कार्पोरेशन में तैनात रहे एक अधिकारी बताते हैं, “बिजली विभाग में नियमित कर्मचारियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में बिजली आपूर्ति बनाए रखने का बड़ा हिस्सा संविदा या आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे है. मीटरी रीडिंग से लेकर लाइन दुरुस्त करने, सब स्टेशन पर काम करने और बिल वसूली तक कई काम अलग-अलग कंपनियों के माध्यम से कराए जा रहे हैं.”

संविदा कर्मचारी बताते हैं कि उन्हें नियमित कर्मचारियों की तुलना में आधे से भी कम वेतन मिलता है, लेकिन काम उतना ही जोखिम भरा होता है. इन कर्मचारियों की शिकायत है कि कई बार महीनों तक वेतन नहीं मिलता, सुरक्षा उपकरण समय पर उपलब्ध नहीं होते, दुर्घटना होने पर इलाज और मुआवजे को लेकर अनिश्चितता रहती है.

नियम के अनुसार आउटसोर्स लाइनमैन को महीने में 26 दिन और रोजाना 8 घंटे काम करना चाहिए. लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि उनकी ड्यूटी का कोई निश्चित समय नहीं होता. फॉल्ट आने पर उन्हें रात में भी तुरंत बुला लिया जाता है. कई बार लगातार कई घंटे काम करना पड़ता है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस तरह के दबाव में काम करने से दुर्घटनाओं की संभावना और बढ़ जाती है.

क्यों नहीं रुक रहे हादसे

बिजली लाइनों पर काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए कई नियम बनाए गए हैं.  इनमें मुख्य रूप से- किसी भी हाई-टेंशन लाइन पर काम से पहले शटडाउन लेना अनिवार्य है, लाइन पर काम करने वाले कर्मचारी को हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, इंसुलेटेड ग्लव्स और अर्थ रॉड जैसे उपकरण पहनना जरूरी है. संविदा कर्मचारियों को भी सुरक्षा प्रशिक्षण देना अनिवार्य है. अगर सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं हैं तो संबंधित अधिकारी या ठेकेदार जिम्मेदार माना जाएगा. हाल ही में पावर कॉर्पोरेशन ने निर्देश जारी किए हैं कि यदि कोई कर्मचारी बिना सुरक्षा उपकरण के लाइन पर काम करता पाया जाता है तो संबंधित सब-स्टेशन ऑपरेटर के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

यूपी पावर कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार गोयल कहते हैं कि उपकेंद्रों पर ऑपरेटर के पद पर केवल विभाग के नियमित तकनीकी कर्मचारी ही तैनात रहेंगे. वर्तमान में तैनात संविदा ऑपरेटरों को तत्काल हटाकर फील्ड कार्य में लगाया जाएगा. इंजीनियरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे नियमित कर्मियों से राजस्व या अन्य कार्यों के बजाय उनके मूल तकनीकी कार्यों में ड्यूटी लें. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हादसों के पीछे कई कारण हैं. बिजली लाइनों का पुराना और जर्जर नेटवर्क, शटडाउन प्रक्रिया में समन्वय की कमी, संविदा कर्मचारियों का पर्याप्त प्रशिक्षण न होना, सुरक्षा उपकरणों की कमी और कर्मचारियों की कमी के कारण बढ़ता कार्यभार. इन कारणों के चलते कई बार छोटी-सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो जाती है.

हादसे के बाद ही क्यों होती है कार्रवाई

अक्सर देखा गया है कि किसी हादसे के बाद विभागीय जांच बैठती है और अधिकारियों पर कार्रवाई होती है. सोनभद्र के मामले में भी एग्जिक्यूटिव इंजीनियर, एसडीओ और जेई को निलंबित किया गया. लेकिन कर्मचारी संगठनों का कहना है कि कार्रवाई अक्सर घटना के बाद होती है, जबकि जरूरत पहले से सुरक्षा सुनिश्चित करने की है. बिजली से होने वाली मौत के मामलों में सरकार की ओर से आमतौर पर पांच लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है. लेकिन कर्मचारियों के परिवारों का कहना है कि केवल मुआवजा समस्या का समाधान नहीं है.

लखनऊ में परशुराम रावत की मौत के बाद उनके परिवार का कहना था कि अगर शटडाउन लिया गया था तो लाइन चालू कैसे हुई. यह सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है. यह सवाल हर उस लाइनमैन का है जो हर दिन खंभे पर चढ़कर हजारों घरों तक रोशनी पहुंचाता है. जब तक बिजली व्यवस्था की इस सबसे अहम कड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक हर फॉल्ट ठीक करने की कोशिश किसी न किसी लाइनमैन के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. 

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