'सरना धर्म' पर मोहन भागवत का बयान JMM की राय से उलट, लेकिन पार्टी चुप क्यों है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने सरना धर्म को अलग पूजा पद्धति बताया लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) इसे आदिवासियों का अलग धर्म बताता है

हिंदू कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत यह बात तमाम मंचों से कई बार कह चुके हैं. अब उन्होंने आदिवासियों के संदर्भ में इसकी व्याख्या की है. बीते 24 जनवरी को मोहन भागवत जनजातीय समुदाय के साथ चर्चा के लिए रांची पहुंचे थे. यहां उन्होंने कहा कि सरना कोई धर्म नहीं, बल्कि पूजा पद्धति है. संघ और भागवत यह बात तो लगातार कहते आ रहे हैं कि आदिवासी हिंदू हैं, लेकिन सरना धर्म को पहली बार सिरे से खारिज किया है.
सरना एक प्रकृति-पूजा आधारित आदिवासी परंपरा है. इसमें वन, जल, पर्वत आदि को देवता माना जाता है. मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी लंबे समय से यह मांग करते आ रहे हैं कि उनके लिए अलग से सरना धर्म कोड बनाया जाए, सीधे शब्दों में कहें तो उन्हें सरना धर्म का अनुयायी माना जाए, न कि हिंदू धर्म का.
झारखंड में मोहन भागवत के इस बयान के बाद कांग्रेस सहित सरना समाज के लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है. कांग्रेस नेता और राज्य की कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि RSS प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि “आदिवासी और हिंदू एक ही हैं” एक गहरी चिंता पैदा करता है क्योंकि यह बात ज़्यादातर चुनावी समय या सत्ता साधने के प्रयासों के दौरान ही सामने आती है.
शिल्पी नेहा आगे यह भी जोड़ती हैं, "अगर वास्तव में आदिवासी और हिंदू एक समान हैं, तो फिर जब उन पर अत्याचार होता है, अपमान किया जाता है, तब यह समानता कहां चली जाती है? आदिवासी और हिंदू एक हैं, जैसे बयान आदिवासी पहचान के सम्मान से ज़्यादा राजनीतिक बयानबाज़ी लगते हैं. यह सोच, आदिवासियों द्वारा लंबे समय से की जा रही अपनी पहचान की मांग को नकारती है. जिसका सबसे बड़ा उदाहरण सरना धर्मकोड की लंबे समय से चली आ रही, जायज़ मांग की लगातार अनदेखी है.”
राज्य में सरना धर्मकोड की मांग लगातार उठती रही है. हेमंत सोरेन की नेतृत्व वाली सरकार ने 12 नवंबर 2020 को सरना धर्मकोड विधानसभा से पारित कर, उसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया है. दिलचस्प बात है कि इसके बावजूद पार्टी की तरफ से मोहन भागवत के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. राज्य में चर्चा इस बात की है कि कहीं यह शिबू सोरेन को मिले हाल ही में मिले पद्मभूषण सम्मान का असर तो नहीं है?
इस मसले पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के सांसद नलिन सोरेन ने किसी तरह की प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया. विधायक समीर मोहंती ने कहा, "पार्टी की तरफ से कोई बयान नहीं आया है तो मैं कैसे इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता हूं. पहले हम अपने पार्टी फोरम पर इसके बारे में बात करेंगे, फिर कुछ कह पाएंगे.’’ वहीं रघुवर दास की सरकार में समाज कल्याण मंत्री रह चुकी और अब JMM की विधायक लुईस मरांडी भी समीर की ही बात दोहराती हैं. वे कहती हैं, "जब पार्टी की तरफ से कुछ दिशा-निर्देश मिलेगा, तब मैं कुछ कहूंगी.’’ नाम जाहिर न करने की शर्त पर पार्टी के दो विधायकों ने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को उठाया था, लेकिन पार्टी की तरफ से फिलहाल इस पर चुप रहने को कहा गया है.
बीते 29 अगस्त 2025 को दिवंगत शिबू सोरेन के लिए भारत रत्न की मांग को झारखंड विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया था. लेकिन पद्मभूषण मिलने पर भारत रत्न की मांग की कोई खास चर्चा किए बिना हेमंत सोरेन ने इसके लिए भारत सरकार का शुक्रिया कहा. लोग यह भी कह रहे हैं कि BJP के पूर्व सांसद और पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष रह चुके करिया मुंडा को भी पद्मभूषण मिला है. शिबू सोरेन तो कद में करिया मुंडा से कहीं बड़े नेता थे. हालांकि महासचिव विनोद पांडेय ने जरूर कहा कि पद्मभूषण सम्मान के बावजूद गुरुजी को भारत रत्न देने की मांग आगे भी जारी रहेगी.
पूर्व मंत्री रहे कांग्रेसी नेता की बेटी संघ की बैठक में
हालांकि इन सबके बीच एक और बात चर्चा में रही. संघ की इस बैठक में राजस्व सेवा की अधिकारी निशा उरांव भी शामिल हुई. निशा उरांव का एक और परिचय है कि वे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और राज्य के पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव की बेटी हैं. इसके अलावा हाल ही में लागू हुए पेसा नियमावली का ड्राफ्ट तैयार करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रही हैं, क्योंकि वे राज्य के पंचायती राज विभाग में बतौर निदेशक काम कर रही थीं. ड्राफ्ट तैयार करने का जिम्मा इसी विभाग के पास था. हालांकि इसके पास होने के बाद उन्होंने नियमावली की कुछ व्याख्याओं पर आपत्ति दर्ज की और शिकायत दर्ज कराने सीधे राज्यपाल के पास पहुंच गईं.
निशा उरांव की आपत्ति वही आपत्ति है, जिसे BJP और संघ लगातार उठा रहे हैं. तीनों का कहना है कि पूरी नियमावली से ‘रूढ़िगत परंपरा’ शब्द को हटा दिया गया है. यानी इसका मतलब है कि पेसा के तहत उन आदिवासियों को भी अधिकार मिलेगा जो किसी दूसरे धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं.
RSS की बैठक में शामिल होने को लेकर निशा उरांव कहती हैं, ‘’मैं आदिवासी समाज की सदस्य हूं. मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, इसिलिए मैं वहां गई थी. वो भारतीय धर्म को बांटने की बात नहीं करते हैं. विविधता में एकता की बात करते हैं, उनके ये विचार मुझे बहुत अच्छे हैं. वो आगे कहती हैं, पेसा को लेकर RSS की जो विचारधारा है, अगर वो समाज के अन्य लोगों की विचारधारा हो रही है, तो उसमें दिक्कत क्या है.’’