अपनी पहली ही परीक्षा में फंसते क्यों दिख रहे हैं झारखंड BJP अध्यक्ष आदित्य साहू?
झारखंड में फरवरी के आखिरी हफ्ते के दौरान नगर निकायों के चुनाव होने हैं. इससे पहले अपनी पार्टी को एकजुट रखना राज्य के BJP अध्यक्ष आदित्य साहू के लिए मुश्किल साबित हो रहा है

झारखंड में 23 फरवरी को नगर निकायों का चुनाव होने जा रहा है. राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक झारखंड की कुल 48 नगरपालिकाओं, 9 नगर निगम, 20 नगर परिषद तथा 19 नगर पंचायतों के कुल 1087 वार्डों में वार्ड पार्षदों के साथ इन सभी नगरपालिका-नगर निगमों के अध्यक्ष और महापौर का प्रत्यक्ष निर्वाचन होना है. उपमहापौर/ उपाध्यक्ष का पद अनारक्षित है, जिस पर अप्रत्यक्ष निर्वाचन होना है.
यह चुनाव भले ही दलीय आधार पर न हो रहे हों, लेकिन सभी दल पूरी तैयारी से चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं BJP के नव-नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू अपनी पहली ही परीक्षा में उलझते नजर आ रहे हैं. दरअसल सालों से पार्टी टिकट का इंतजार कर रहे BJP नेता आपस में ही एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने को उतर चुके हैं.
हजारीबाग नगर निगम में मेयर पद के लिए पार्टी के छह नेताओं ने नामांकन कर दिया है. चतरा में नगर परिषद अध्यक्ष पद के लिए तीन BJP नेताओं ने नामांकन कर दिया है. एकाध जगहों को छोड़ कर राज्यभर में BJP नेता आपस में ही लड़ने को तैयार हैं. जबकि पार्टी ने कई दौर की बैठकों के बाद तय किया था कि चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हो रहे हैं, लेकिन वह पार्टी के स्तर पर घोषित प्रत्याशियों के समर्थन में खुलकर चुनाव लड़ेगी.
फिलहाल सबसे अधिक चर्चा में धनबाद नगर निगम की सीट है. यहां पार्टी ने अपने कार्यकर्ता संजीव अग्रवाल को समर्थन दिया है. लेकिन यहां पर झरिया की BJP विधायक रागिनी सिंह के पति और झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह ने भी नामांकन कर दिया है. पार्टी ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने. इस सीट पर BJP की नेता और धनबाद के पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल ने भी दावा किया था. लेकिन पार्टी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया. अब उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का झंडा पकड़ लिया है. यही हाल पलामू, आदित्यपुर, मानगो, चास जैसी सीटों पर भी है.
ऐसे में सवाल है कि आदित्य साहू अपनी पहली ही परीक्षा में क्यों फंसते नजर आ रहे हैं. पार्टी के सूत्रों के मुताबिक वे थोड़े नरम मिजाज हैं, जिससे अनुशासन के मामले में आम कार्यकर्ताओं पर जो नियंत्रण होना चाहिए, वह होता नहीं दिख रहा है. एक नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "उनकी कोशिश है कि सबको मिलाकर चला जाए, इस चक्कर में वे पार्टी समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में भी मजबूती से खड़े नहीं दिख रहे.”
हालांकि प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू इन बातों को सिरे से खारिज करते हैं. वे कहते हैं, "कार्यकर्ताओं की नाराजगी की बात से मैं इंकार नहीं कर रहा हूं. लेकिन सभी बड़े और स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं से लंबी चर्चा के बाद ही किसी प्रत्याशी को समर्थन देने का फैसला लिया गया है. अब जो निर्णय हो गया है, सभी कार्यकर्ताओं को उसके साथ जाना होगा. जो ऐसा नहीं करेंगे चुनाव बाद पार्टी उनके बारे में विचार जरूर करेगी.’’
पलामू में BJP के पूर्व जिलाध्यक्ष परशुराम ओझा ऐसे ही एक बागी हैं. उन्होंने अपनी पत्नी जानकी ओझा को मैदान में उतारा है. आदित्य साहू की चेतावनी पर वे कहते हैं, "जब पार्टी ने सिंबल नहीं दिया है, तो फिर बगावत की बात कहां से हो गई. अगर सिंबल दिया होता तो हम चुनाव नहीं लड़ते. मैं बीते 40 साल से BJP में हूं. जनता के बीच हूं. पार्टी ने जिन्हें समर्थन दिया है, पिछले टर्म में उन्हें चैंबर में बैठना तक मंजूर नहीं था. मैं आम जनता के कहने पर चुनाव लड़ रहा हूं. पार्टी कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है.’’ बता दें, BJP ने पलामू से पूर्व मेयर अरुणा शंकर को समर्थन दिया है. यहां के पूर्व डिप्टी मेयर मंगल सिंह भी बागी हो गए हैं. उन्होंने भी अपनी पत्नी रिंकू सिंह को मैदान में उतारा है.
वहीं BJP के राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा अपने अध्यक्ष की बातों से सहमत दिखते हैं. वे कहते हैं, "ऐसी स्थिति केवल नगर निकाय चुनाव में नहीं, बल्कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी आती है. हमारी पार्टी बड़ी है, सभी चुनाव लड़ने को इच्छुक रहते हैं. लेकिन हमारी कोशिश है कि पहले की तरह इस बार भी अपने कार्यकर्ताओं को मनाएं और पार्टी ने जिनको समर्थन दिया है, उनके लिए पूरे मन से काम करें.’’
BJP की कोशिश है कि वह सभी नगर निगम की सभी 9 सीटों पर जीत दर्ज करे. पार्टी के प्रवक्ता अजय साह कहते हैं, "बीते विधानसभा चुनाव में शहरी क्षेत्रों में हमारे वोट पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़े ही हैं. ऐसे में हमें पूरा भरोसा है कि BJP नगर निगम की सभी 9 सीटें जीतेगी. पार्टी कार्यकर्ताओं को जो संदेश प्रदेश स्तर से भेजा गया है, वही सबसे प्रभावी होने जा रहा है.’’
इन सब के बीच पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने यह भी कह दिया कि निगम चुनाव वाले बागी नेता को हम बागी नहीं मानते. अगर कोई बागी जीत भी गया तो वह भी पार्टी की ही जीत होगी. हालांकि वे बागियों की लड़ाई से संभावित नुकसान की आशंका को खारिज नहीं करते.