60 साल पहले जिस बैंक को जॉर्ज फर्नांडिस ने किया था शुरू, अब वो क्यों जांच के घेरे में?
साल 1968 में मशहूर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस ने बॉम्बे लेबर कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की स्थापना की थी. लेकिन आज यह बैंक 122 करोड़ रुपये के घोटाले का सामना कर रहा है

साल 1924 में जर्मनी में एक बैंक की स्थापना की गई थी, जिसका नाम था - जर्मन लेबर बैंक. तब यह बैंक जर्मनी के सबसे बड़े बैंकों में से एक था और इससे व्यापारियों, उद्योगपतियों, कर्मचारियों की जरूरतें तो पूरी होती ही थीं, यहां तक कि मजदूरों को भी आसानी से ऋण (लोन) मिल जाता था.
करीब 48 साल बाद इसी तर्ज पर तब राजनीतिक फलक पर उभरते सितारे जॉर्ज फर्नांडिस ने एक कोऑपरेटिव बैंक के विचार को मूर्त रूप दिया, जो मजदूरों को आसानी से लोन तक पहुंच सुनिश्चित करता था. बैंक का नाम था - बॉम्बे लेबर कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड. लेकिन मौजूदा समय में यह बैंक गलत कारणों से चर्चा में है.
भारत की राजनीति में जॉर्ज फर्नांडिस एक बड़ा नाम रहे हैं. 1968 में जब इस कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना हुई, तब वे मुंबई में एक प्रमुख समाजवादी मजदूर संघ के आयोजक और समाजवादी नेता थे. वे जर्मन लेबर बैंक के मॉडल से प्रेरित थे और चाहते थे कि देश में भी ऐसा ही एक बैंक हो जो मजदूरों और व्यापारियों के बीच की खाई को पाटने में मददगार हो.
इस तरह, 1968 में बॉम्बे लेबर कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड वजूद में आया. यह उस घटना के ठीक एक साल बाद हुआ जब फर्नांडिस ने दक्षिण मुंबई लोकसभा सीट से मुंबई में कांग्रेस के निर्विवाद नेता सदाशिव कान्होजी उर्फ सा.का. पाटिल को करारी शिकस्त दी थी.
इंडिया टुडे की अपनी एक रिपोर्ट में वरिष्ठ संवाददाता धवल एस. कुलकर्णी लिखते हैं, "बैंक का हेडक्वार्टर फोर्ट के बाजारगेट में फर्नांडिस के करीबी सहयोगी रंजीत भानु के निवास पर था, जिसकी शुरुआत 555 सदस्यों से हुई थी. सबने मिलकर 1 लाख रुपये की मूल शेयर पूंजी का योगदान दिया था. बॉम्बे लेबर कोऑपरेटिव बैंक बाद में न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक बन गया. भानु पेशे से वकील थे और बाद में मुंबई के कोलाबा से विधायक भी बने."
हालांकि, अब यह न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक गलत कारणों से चर्चा में है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इसे नए लोन जारी करने से रोक दिया है और इसमें डिपॉजिट राशि को अगले छह महीनों तक निकालने से सस्पेंड कर दिया है. ऐसा इसलिए कि यह बैंक 122 करोड़ रुपये के गबन की जांच का सामना कर रहा है. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने इस मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें बैंक के पूर्व महाप्रबंधक हितेश मेहता भी शामिल हैं.
कुलकर्णी से बातचीत में मुंबई में फर्नांडिस के करीबी सहयोगी रहे सुनील चिटणीस बताया कि जर्मनी की यात्रा के बाद फर्नांडिस को बैंक शुरू करने की प्रेरणा मिली थी. फर्नांडिस तब नगरपालिका कर्मचारियों से लेकर डॉक वर्कर्स और टैक्सी चालकों की यूनियनों की कमान संभालते थे.
उन्होंने ही ऐसी संस्थाओं के निर्माण पर जोर दिया और कई नई योजनाएं शुरू की. जैसे, उनके यूनियन का हिस्सा रहे टैक्सी चालक सुबह मुंबई सेंट्रल, दादर टीटी, गोरेगांव और वडाला में यूनियन द्वारा संचालित चार पेट्रोल पंपों से ईंधन ले सकते थे और शाम को अपना काम पूरा करने के बाद पैसे चुका सकते थे. इसी तरह, वे अपनी टैक्सियों के लिए स्पेयर पार्ट्स खरीद सकते थे और आसान किस्तों में पैसे चुका सकते थे.
चिटणीस ने बताया, "फर्नांडिस रचनात्मक काम में लगे हुए थे, लेकिन उन्होंने इससे नाम और शोहरत नहीं चाही." कुर्ला में टैक्सी वालों की कॉलोनी भी फर्नांडिस के दिमाग की उपज थी. बाद में फर्नांडिस राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आ गए और अपना आधार मुंबई से कहीं दूर बिहार में स्थानांतरित कर लिया. इसका मतलब यह हुआ कि शरद राव, नारायण फेनानी, महाबल शेट्टी, रंजीत भानु, प्रभाकर मोरे, दिनकर सकरीकर और अन्य जैसे उनके सहयोगियों ने उनकी अलग-अलग यूनियनों और संस्थाओं का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया.
कुलकर्णी लिखते हैं कि फर्नांडिस 1940 के दशक में अपने पैतृक शहर मैंगलोर और कैथोलिक सेमिनरी से भागकर मुंबई आ गए थे, जहां वे पादरी बनने की ट्रेनिंग ले रहे थे. शुरुआती दिनों में उनकी हालत ऐसी थी कि उन्हें सड़कों पर सोना पड़ता था. उस समय उन्हें मराठी में सिर्फ एक ही लाइन आती थी, "माझ्या साथी कहीं काम आहे का?" (क्या आपके पास मेरे लिए कोई काम है?) बहुभाषी फर्नांडिस ने जल्द ही इस भाषा में भी महारत हासिल कर ली. उन्हें कम से कम 15 भाषाओं का ज्ञान था जिन्हें वे बोल सकते थे.
बहरहाल, फर्नांडिस दिग्गज यूनियन नेता प्लासिड डी'मेलो के शिष्य बन गए, जिनका मुंबई में डॉक मजदूरों के बीच मजबूत आधार था. फर्नांडिस भी राजनीति और समाजवादी आंदोलन में कूद पड़े. 1960 के दशक में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के लिए चुने गए फर्नांडिस और सोशलिस्ट पार्टी के उनके साथियों ने नगर निकाय में मराठी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करने के लिए संघर्ष किया. मृणाल गोरे और शोभनाथ सिंह जैसे साथी पार्षदों के साथ मिलकर उन्होंने यह तय किया कि कामकाज अंग्रेजी के बजाय मराठी में हो.
1967 के लोकसभा चुनावों में फर्नांडिस ने पाटिल को हराया, जिनका मुंबई की राजनीति में जबरदस्त दबदबा था. पाटिल को बड़े बिजनेसमैन लोगों से नजदीकी के लिए जाना जाता था और कहा जाता था कि वे कांग्रेस के खजाने पर कंट्रोल रखते थे. फर्नांडिस ने एक नया नारा दिया जिसने दक्षिण मुंबई के वोटरों पर अच्छा असर किया - 'तुम्हीं सा का पटलना हरवु शक्त' (आप सा.का. पाटिल को हरा सकते हैं). हालांकि पाटिल गुजरात के बनासकांठा से उपचुनाव में लोकसभा के लिए फिर से चुने गए, लेकिन वे कभी भी अपना प्रभाव वापस नहीं पा सके. इधर, फर्नांडिस समाजवादी राजनीति के एक जबरदस्त रंगरूट के रूप में उभरे.
कुलकर्णी अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि राजनीतिक मतभेद के बावजूद फर्नांडिस का एक और तूफानी नेता दिवंगत शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के साथ मधुर निजी संबंध था. ऐसा कहा जाता है कि फर्नांडिस उन चंद लोगों में से थे जो ठाकरे को सम्मानसूचक 'बालासाहेब' के बजाय उनके पहले नाम 'बाल' से बुला सकते थे.
फर्नांडिस ने 1980 के दशक में शिवसेना की दशहरा रैलियों के दौरान ठाकरे के साथ मंच साझा किया था. शिवसेना के अलावा यह फर्नांडिस ही थे जिनके बारे में कहा जाता था कि मुंबई उनके एक इशारे पर थम सकती है. उन्हें मराठी कल्ट मूवी सिंहासन (1979) में यूनियन लीडर 'डिकोस्टा' के रूप में भी अमर कर दिया गया था.