यूपी में IAS एसोसिएशन की सालाना बैठक यानी AGM की परंपरा बंद क्यों हो गई?
फरवरी 2026 में सीनियर अफसरों की कॉन्फ्रेंस की तैयारी के बीच यूपी IAS एसोसिएशन की AGM और सिविल सर्विस वीक पर अब भी सस्पेंस बना है

उत्तर प्रदेश IAS एसोसिएशन की सालाना आम बैठक यानी AGM और सिविल सर्विस वीक का न होना अब सिस्टम के भीतर बदलते रिश्तों, प्राथमिकताओं और असहजताओं की कहानी बन चुका है. जिस प्रस्ताव को 13 साल पहले बड़े आत्ममंथन के बाद पास किया गया था, वही प्रस्ताव आज खुद अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता दिख रहा है.
19 जनवरी 2013 को लखनऊ के सिविल सर्विस इंस्टीट्यूट में हुई AGM में उत्तर प्रदेश IAS एसोसिएशन ने यह औपचारिक संकल्प लिया था कि अब हर साल AGM और सिविल सर्विस वीक आयोजित किया जाएगा.
यह प्रस्ताव किसी उत्सव के माहौल में नहीं, बल्कि एक तरह के अपराधबोध और आत्मस्वीकृति के बाद आया था. वजह साफ थी. 2007 से 2012 तक लगातार पांच साल तक एसोसिएशन अपने सबसे बुनियादी सालाना कार्यक्रम आयोजित करने में नाकाम रही थी. उस दौर में प्रदेश में BSP सरकार थी और नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के रिश्ते सहज नहीं माने जाते थे.
वर्ष 2012 में सत्ता परिवर्तन के बाद माहौल बदला. सपा सरकार के आने के साथ ही 2013 के बाद से एसोसिएशन ने न सिर्फ सिविल सर्विस वीक आयोजित किया, बल्कि उसे हर साल नियमित रूप से कराने का लिखित वादा भी किया. यह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था. इसे IAS कैडर के भीतर संवाद, आत्ममूल्यांकन और सामूहिक सोच के मंच के रूप में देखा गया. उसी क्रम में सद्भावना के प्रतीक के तौर पर IAS इलेवन और मुख्यमंत्री इलेवन के बीच क्रिकेट मैच तक आयोजित किए गए, ताकि राजनीति और नौकरशाही के बीच काम करने लायक तालमेल का संदेश जाए.
वर्ष 2013 की बैठक में पारित प्रस्ताव के बाद 2014, 2015, 2016, 2017 और 2019 में AGM और सिविल सर्विस वीक आयोजित हुए. इन बैठकों में सिर्फ औपचारिक भाषण नहीं हुए, बल्कि कई अहम मुद्दे खुले मंच पर उठे. केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए इम्पैनलमेंट की प्रक्रिया, 360 डिग्री मूल्यांकन की अपारदर्शिता, चाइल्ड केयर लीव में लैंगिक असमानता, युवा IAS अफसरों को शहरी प्रशासन में ज्यादा जिम्मेदारी देने की मांग, रिटायर्ड अफसरों को मेंटरशिप प्रोग्राम में जोड़ने जैसे फैसले इन्हीं बैठकों से निकले.
फरवरी 2019 में हुए सिविल सर्विस वीक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अधिकारियों को संबोधित किया था. उसी दौरान सीएसआई क्लब में हुई AGM में अफसरों ने खुलकर कहा था कि अगर केंद्र में इम्पैनलमेंट नहीं होता है, तो उसका कारण बताया जाना चाहिए. अफसरों का तर्क था कि पारदर्शिता सिर्फ जनता के लिए नहीं, बल्कि सेवा के भीतर भी जरूरी है. महिला अधिकारियों ने पुरुष अधिकारियों को भी समान रूप से चाइल्ड केयर लीव देने का मुद्दा उठाया था. संस्कृति स्कूल में दाखिले 2019 से शुरू करने का फैसला भी उसी बैठक में लिया गया. लेकिन यही वह 2019 था, जिसके बाद यह सिलसिला अचानक थम गया.
कोविड-19 के कारण 2020 और 2021 में कार्यक्रम नहीं हो सके. 2022 में विधानसभा चुनाव का हवाला दिया गया. इसके बाद 2023, 2024 और 2025 भी निकल गए, लेकिन न AGM हुई और न सिविल सर्विस वीक. यानी जिस स्थिति को दोबारा न आने देने के लिए 2013 में प्रस्ताव पास हुआ था, वही स्थिति एक बार फिर लौट आई. वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि समस्या सिर्फ कोविड या चुनाव तक सीमित नहीं है. असली सवाल सरकारी समर्थन और मंजूरी का है. एक रिटायर्ड IAS अधिकारी कहते हैं, “IAS एसोसिएशन कोई स्वतंत्र सामाजिक संगठन नहीं है. उसके कार्यक्रमों का स्वरूप, समय और दायरा काफी हद तक सरकार की सहमति और सहयोग पर निर्भर करता है. जब राजनीतिक नेतृत्व सहज होता है, तब ऐसे मंचों को जगह मिलती है. जब प्राथमिकताएं बदलती हैं, तो ये मंच अपने आप हाशिये पर चले जाते हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मौजूदा दौर में सत्ता और नौकरशाही के रिश्ते पहले से ज्यादा औपचारिक और नियंत्रित हो गए हैं. लखनऊ के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, “योगी सरकार का प्रशासनिक मॉडल बेहद सेंट्रलाइज्ड है. यहां व्यक्तिगत या सामूहिक मंचों के बजाय आधिकारिक कॉन्फ्रेंस और रिव्यू मीटिंग्स पर जोर है.
सिविल सर्विस वीक जैसे आयोजन, जहां अफसर खुलकर अपनी बात रखते हैं, सरकार की प्राथमिकता सूची में ऊपर नहीं दिखते.” इस संदर्भ में 19 जनवरी 2013 की AGM में तत्कालीन वरिष्ठ IAS अधिकारी जीबी पटनायक की टिप्पणी आज भी गूंजती है. उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा अब “स्टील फ्रेम” से “गायब होने वाली क्रीम” बनती जा रही है. उस वक्त यह टिप्पणी मजाक के तौर पर ली गई थी, लेकिन उसमें छिपी चिंता को कई अफसरों ने गंभीर माना था. हाल ही में जब उनसे उस बयान के बारे में पूछा गया, तो पटनायक ने साफ कहा कि उनकी चिंता सेवा के एक वर्ग में “गायब होते आदर्शों” को लेकर थी. उस बैठक में शामिल रहे अनिल स्वरूप ने तब कहा था कि सर्विस की इमेज सुधारने के लिए अच्छे काम की सराहना जरूरी है. उनके मुताबिक, समस्या सिर्फ बाहरी आलोचना की नहीं, बल्कि अंदरूनी संवाद की कमी की भी है. यही संवाद AGM और सिविल सर्विस वीक जैसे मंचों से संभव होता है.
एक वरिष्ठ IAS अधिकारी बताते हैं कि 2019 के सिविल सर्विस वीक में लिए गए कई फैसले आज भी अधूरे हैं. कुछ लागू हुए भी, तो उनकी समीक्षा नहीं हो पाई. वजह साफ है. जब उसके बाद कोई AGM ही नहीं हुई, तो फॉलो-अप का सवाल ही नहीं उठा. “AGM सिर्फ कार्यक्रम नहीं होती, वह एक तरह का इंस्टीट्यूशनल मेमोरी होती है” एक अधिकारी कहते हैं, “जब वह टूटती है, तो फैसले भी हवा में लटक जाते हैं.”
अब जबकि राज्य सरकार फरवरी 2026 की शुरुआत में सीनियर प्रशासनिक अधिकारियों की कॉन्फ्रेंस आयोजित करने पर विचार कर रही है, तो एक बार फिर उम्मीद जगी है कि अलग-अलग बैच के अधिकारियों को आपस में संवाद का मौका मिलेगा. हालांकि सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ किया है कि फिलहाल सिविल सर्विस वीक आयोजित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. जानकारों का कहना है कि यह कॉन्फ्रेंस AGM का विकल्प नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें एजेंडा सरकार तय करती है, जबकि AGM में एजेंडा सेवा खुद तय करती है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AGM का न होना दरअसल नौकरशाही की सामूहिक आवाज के कमजोर पड़ने का संकेत है. एक विश्लेषक कहते हैं, “जब अधिकारी व्यक्तिगत तौर पर मजबूत होते हैं, लेकिन सामूहिक मंच कमजोर होता है, तो सेवा एक इकाई के रूप में बोलना बंद कर देती है. यह स्थिति लंबे समय में प्रशासनिक संस्थानों के लिए ठीक नहीं है.”
कुल मिलाकर, यूपी IAS एसोसिएशन की AGM का न होना सिर्फ एक तारीख या आयोजन का सवाल नहीं है. यह उस बदलते प्रशासनिक माहौल की कहानी है, जहां संवाद की जगह निर्देश ले रहे हैं और आत्ममंथन की जगह रिपोर्टिंग.