हेमंत सोरेन 75 फीसदी स्थानीय कोटा पर प्राइवेट कंपनियों को क्यों दे रहे हैं चेतावनी?

हेमंत सरकार ने साल 2021 में निजी क्षेत्र में 40 हजार रुपये तक की सैलरी वाली नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसदी आरक्षण के लिए कानून बनाया था लेकिन हाईकोर्ट ने बाद में इस पर रोक लगा दी

हेमंत सोरेन ने पिता शिबू सोरेन को किया याद. (Photo: PTI)
हेमंत सोरेन (फाइल फोटो)

झारखंड में इन दिनों झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) का स्थापना दिवस मनाया जा रहा है. दुमका से लेकर धनबाद तक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. बीते 4 फरवरी को धनबाद में आयोजित 54वें स्थापना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शब्दों, भाव-भंगिमाओं और तेवर में उनके पिता और झारखंड आंदोलन के प्रतीक नेता शिबू सोरेन की स्पष्ट झलक दिखी.

राज्य बनने से पहले जिस अंदाज में शिबू सोरेन अपने लोगों को संबोधित करते थे, अपने हक़ और अधिकार के लिए ललकारते थे, हेमंत सोरेन की शारीरिक और शाब्दिक भाषा भी उसी परंपरा को दोहराती नज़र आई. उन्होंने कहा,  “धनबाद कोयला को लेकर दुनिया भर में एक अलग स्थान रखता है. यहां  सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल), भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल), ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) जैसी सरकारी कोयला कंपनियां आउटसोर्सिंग के जरिए निजी कंपनियों को घुसा रही हैं. ये निजी कंपनियां इन खदानों में मजदूरी के लिए बाहर के मजदूरों को लाने लगी हैं. उन लोगों को लगता है कि लोकल लोगों को रखेंगे तो आंदोलन होगा. लेकिन याद रखिएगा, अब हमने कानून बनाया है. कोई भी आउटसोर्सिंग कंपनी हो, 75 फीसदी स्थानीय लोगों को रखना अनिवार्य होगा”

मुख्यमंत्री ने स्थानीय लोगों से अपील की कि वे एकजुट होकर अपने हक और अधिकार के लिए आगे आएं और उन्हें हासिल करने का प्रयास करें, क्योंकि बिना दबाव बनाए कंपनियां अपने स्तर पर अधिकार देने को तैयार नहीं होतीं.

मुख्यमंत्री के इस तेवर पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तुरंत सामने आई. विपक्षी दल बीजेपी ने आरोप लगाया कि एक तरफ हेमंत सोरेन दावोस जाकर निजी कंपनियों को झारखंड में निवेश का आमंत्रण देते हैं और वहां से लौटकर 1.27 लाख करोड़ रुपये के संभावित निवेश प्रस्तावों की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य में निजी कंपनियों को धमकी देते हुए लोगों से कब्जा करने की अपील कर रहे हैं.
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने कहा, “मुख्यमंत्री लाख विदेश यात्राएं कर लें, खूब मौज-मस्ती कर लें, लेकिन अगर व्यापार और निवेश के प्रति नीयत साफ नहीं होगी तो कोई निवेशक यहां निवेश करने नहीं आएगा.”

मुख्यमंत्री के कोयला आपूर्ति रोकने से जुड़े बयानों पर आदित्य साहू ने कहा कि झारखंड किसी पार्टी या परिवार की जागीर नहीं है, बल्कि साढ़े तीन करोड़ लोगों का राज्य है और भारत का अभिन्न हिस्सा भी है. वे आगे कहते हैं, “हम सभी भारत के निवासी हैं. इसलिए भारत को खंड-खंड में देखने का नजरिया राष्ट्र विरोधी है. झारखंड का कोयला है, तो किसी दूसरे राज्य से कुछ और आता है. सबसे मिलकर विकसित भारत बनता है.”

आखिर चेतावनी की वजह क्या है?

यह कोई पहली बार नहीं है जब हेमंत सोरेन ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से केंद्र सरकार को कोयला बंद करने की चेतावनी दी हो. वे कोयला सहित अन्य खनिजों से संबंधित लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये की लंबित देनदारी की मांग लगातार करते रहे हैं. भुगतान नहीं होने की स्थिति में वे पहले भी कोयला आपूर्ति रोकने की बात कह चुके हैं.

दूसरी बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि हाल ही में आए केंद्रीय बजट 2026–27 में ‘रेयर अर्थ मटेरियल कॉरिडोर’ की घोषणा की गई है. यह भारत की एक रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य चीन पर लगभग 93 फीसदी आयात निर्भरता को कम करना है. यह कॉरिडोर ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित किया जाएगा. जबकि रेयर अर्थ मटेरियल की संभावनाओं के बावजूद झारखंड को इस परियोजना में स्थान नहीं मिला, इसे लेकर भी राज्य सरकार के भीतर नाराज़गी बताई जा रही है.

क्या वाकई धनबाद में बाहरी मजदूरों को तरजीह मिल रही है?

झरिया की पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता पूर्णिमा नीरज सिंह कहती हैं,  “जहां तक आउटसोर्सिंग कंपनियों में स्थानीय लोगों के रोजगार की बात है, बिना स्थानीय लोगों को रखे कोई कंपनी सुचारू रूप से काम कर ही नहीं सकती. काम तभी चल सकता है जब स्थानीय स्तर पर विरोध कम हो. हां, नियम के मुताबिक 75 फीसदी लोगों को रोजगार मिल रहा है, इस पर मुझे संदेह है. लेकिन इसके लिए कंपनियों के साथ-साथ लेबर डिपार्टमेंट भी जिम्मेदार है.”

वे आगे कहती हैं,  “मुख्यमंत्री केवल आउटसोर्सिंग कंपनियों की बात नहीं कर रहे हैं. वे सीसीएल, बीसीसीएल और ईसीएल जैसी कंपनियों के कामकाज के तरीकों पर भी सवाल उठा रहे हैं. सीसीएल का एसओपी है कि यदि खनन में किसी रैयत की दो एकड़ या उससे अधिक जमीन जाती है, तो 84 दिनों के भीतर जमीन का मुआवजा और नौकरी देना अनिवार्य है. हालात यह हैं कि लोग दस-दस साल तक इनके दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिलती.”

गौरतलब है कि हेमंत सरकार ने वर्ष 2021 में निजी क्षेत्र में 40 हजार रुपये तक के वेतन वाली नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसदी आरक्षण लागू करने के उद्देश्य से ‘झारखंड रोजगार अधिनियम, 2021’ पारित किया था. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि यह नियम अब तक जमीनी स्तर पर क्यों लागू नहीं हो पाया?

राज्य सरकार द्वारा कानून लाए जाने के बाद इसके विरुद्ध लघु उद्योग संघ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट ने इस अधिनियम के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी. सुनवाई के दौरान संघ के वकील ए.के. दास ने दलील दी कि यह अधिनियम संविधान के उन सिद्धांतों के विरुद्ध है, जो रोजगार में समानता की गारंटी देते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इससे पहले पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय इसी तरह के कानून को खारिज कर चुका है. फिलहाल यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है.

75 फीसदी आरक्षण पर सवाल

25 मार्च 2025 को विधानसभा में विधायक जयराम महतो  ने 75 फीसदी आरक्षण लागू न होने को लेकर सरकार से सीधा सवाल किया. उन्होंने कहा, “मैं मानता हूं कि हाईकोर्ट ने रोक लगाई है, लेकिन मैं सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं हूं क्योंकि हाईकोर्ट के रोक लगाने से पहले के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं. सरकार 2021 से 2024 तक का आंकड़ा दे रही है और खुद मान रही है कि पे-रोल पर 2,46,000 वर्कर नामित हैं. मगर इनमें केवल 53,000 ही झारखंडी हैं. प्रतिशत में देखें तो यह लगभग 21 प्रतिशत बैठता है. ऐसे में सरकार किस आधार पर 75 प्रतिशत आरक्षण की बात करती है?”

बीजेपी के प्रवक्ता अजय शाह का कहना है, “हेमंत सरकार निजी कंपनियों में 75 फीसदी आरक्षण की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. हाल ही में भाजपा ने शराब नीति में स्थानीय महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग उठाई थी, लेकिन सरकार ने इस नीति का प्रत्यक्ष लाभ छत्तीसगढ़ के व्यापारियों को सौंप दिया. इसी तरह बालू घाटों की नीलामी में ऐसी शर्तें रखी गईं, जिनसे स्थानीय लोग बाहर हो गए और बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बालू घाट आवंटित कर दिए गए. कोचिंग संस्थानों के रेगुलेशन में भी कठोर शर्तें जोड़ दी गईं, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर संचालित छोटी-छोटी कोचिंग संस्थाएं बंद होने के कगार पर पहुंच गईं और बाहर के कॉर्पोरेट ग्रुप्स के लिए रास्ता खुल गया.”

जाहिर है, इन सवालों के बीच मंच से दिए गए सख्त बयानों और 75 फीसदी स्थानीय आरक्षण के दावों के बीच, झारखंड में निजी क्षेत्र के रोजगार की ज़मीनी तस्वीर सरकार के लिए लगातार असहज सवाल बनती जा रही है.

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