यूपी में फिर क्यों सक्रिय हो रही है बाहुबली ब्रिगेड?

विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में धनंजय सिंह, बृजेश सिंह, अंसारी परिवार, विनय शंकर तिवारी और अमनमणि जैसे प्रभावशाली राजनीतिक नेटवर्क फिर सक्रिय, नए समीकरणों की तलाश में जुटे हैं

brijbhushan sharan singh and dhananjay singh political chemistry 2027 election
धनंजय सिंह पूर्व सांसद बृजभूषण सिंह के साथ (फाइल फोटो)

लखनऊ स्थित मुख्यमंत्री आवास पर 11 मई को हुई एक मुलाकात ने पूर्वांचल की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. जौनपुर की जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीकला सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. तस्वीरों में उनके साथ एमएलसी बृजेश सिंह ‘प्रिंसू’ भी दिखाई दिए, जिन्हें जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह का करीबी माना जाता है.

मुलाकात के बाद कोई औपचारिक राजनीतिक घोषणा नहीं हुई लेकिन राजनीतिक हलकों में इसकी चर्चा तेजी से फैल गई है. इस मुलाकात को सामान्य शिष्टाचार भेंट से ज्यादा राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. वजह साफ है. श्रीकला सिंह केवल जिला पंचायत अध्यक्ष नहीं हैं, बल्कि पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी भी हैं.

धनंजय सिंह लंबे समय से पूर्वांचल की राजनीति के प्रभावशाली और विवादित चेहरों में गिने जाते रहे हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री से उनकी पत्नी की मुलाकात और उसमें सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में पुराने बाहुबली नेटवर्क खुद को नए राजनीतिक स्वरूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.

यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में कई प्रभावशाली राजनीतिक परिवार और बाहुबली पृष्ठभूमि वाले नेता अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने की कवायद में जुटे दिखाई दे रहे हैं. कोई अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में आगे बढ़ा रहा है, कोई नए दलों से समीकरण बना रहा है, तो कोई सत्ता के करीब पहुंचने की कोशिश कर रहा है.

बदल चुका है उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य

राजनीतिक विश्लेषक और लंबे समय से पूर्वांचल की राजनीति पर नजर रखने वाले पूर्व शिक्षक देवेंद्र उपाध्याय बताते हैं, “एक समय था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबली नेताओं का सीधा प्रभाव चुनावी नतीजों को प्रभावित करता था. पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक कई क्षेत्रों में स्थानीय दबदबा, जातीय समीकरण और संगठनात्मक शक्ति से अधिक महत्व व्यक्तिगत प्रभाव और भय की राजनीति को दिया जाता था.”

विश्लेषक मानते हैं कि पिछले एक दशक में तस्वीर काफी बदली है. योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान अपराध और माफिया के खिलाफ अभियान, पुलिस की सक्रियता, चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी और मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताओं ने पुराने राजनीतिक ढांचे को कमजोर किया है. लखनऊ के बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्याहय के प्रोफेसर सुशील पांडेय का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बाहुबल की राजनीति का प्रत्यक्ष प्रभाव पहले की तुलना में काफी घटा है. हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि बाहुबली नेताओं के सामाजिक और जातीय नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं.

कई इलाकों में ये नेटवर्क अब भी स्थानीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. यही वजह है कि अब बाहुबली राजनीति पुराने स्वरूप में नहीं बल्कि नए राजनीतिक प्रबंधन, परिवारवाद और रणनीतिक गठबंधनों के रूप में सामने आ रही है.

धनंजय सिंह और पूर्वांचल की नई हलचल

पूर्वांचल की राजनीति में धनंजय सिंह का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है. BSP के इस पूर्व सांसद का जौनपुर, वाराणसी और आसपास के जिलों में मजबूत व्यक्तिगत आधार माना जाता है. हालांकि हाल के वर्षों में कानूनी विवादों और अदालती मामलों ने उनकी राजनीतिक संभावनाओं को प्रभावित किया है. इसी बीच वाराणसी की विशेष सांसद-विधायक अदालत ने 2002 में धनंजय सिंह पर हुए कथित जानलेवा हमले के मामले में विधायक अभय सिंह, विधान परिषद सदस्य विनीत सिंह समेत सभी छह आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. यह मामला दो दशक से अधिक समय से चर्चा में था और पूर्वांचल की उस दौर की हिंसक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक माना जाता रहा है.

अदालत का फैसला भले पुराने विवाद का कानूनी निष्कर्ष हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे एक बार फिर पूर्वांचल की पुरानी राजनीतिक रेखाएं चर्चा में आ गई हैं. इसी पृष्ठभूमि में श्रीकला सिंह और मुख्यमंत्री योगी की मुलाकात को देखा जा रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि जौनपुर में धनंजय सिंह का सामाजिक और जातीय प्रभाव आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. BJP अगर 2027 में पूर्वांचल में अपने समीकरण और मजबूत करना चाहती है तो ऐसे प्रभावशाली स्थानीय समूहों को पूरी तरह नजरअंदाज करना उसके लिए आसान नहीं होगा.

बृजेश सिंह की नई राजनीतिक सक्रियता

पूर्वांचल के एक और चर्चित नाम बृजेश सिंह भी इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं में हैं. कभी मुख्तार अंसारी के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले बृजेश सिंह अब सीधे चुनावी राजनीति में बड़ी भूमिका तलाशते दिखाई दे रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वे अपने बेटे सिद्धार्थ सिंह को जिला पंचायत और भविष्य की चुनावी राजनीति में स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में सक्रिय राजनीति से अपेक्षाकृत दूरी बनाने के बावजूद उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. पूर्वांचल की राजनीति में मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह के बीच चली लंबी प्रतिद्वंद्विता ने एक दौर में पूरे क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित किया था. आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, लेकिन उस दौर के सामाजिक और जातीय नेटवर्क अभी भी कई क्षेत्रों में मौजूद हैं. यही नेटवर्क अब नए राजनीतिक स्वरूप में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं.

अंसारी परिवार की नई रणनीति

मुख्तार अंसारी की मृत्यु के बाद यह सवाल उठ रहा था कि उनके राजनीतिक प्रभाव का क्या होगा. लेकिन हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि अंसारी परिवार अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश में जुटा हुआ है. मुख्तार अंसारी के बेटे और वर्तमान विधायक अब्बास अंसारी को लेकर चर्चा है कि वे समाजवादी पार्टी के करीब आ सकते हैं. अब्बास अब खुलकर सपा के कार्यक्रमों में शि‍रकत कर रहे हैं. अब्बास 25 मई को मऊ के परदह ब्लॉक क्षेत्र में इटौरा गांव पहुंचे थे. यहां उन्होंने अपनी विधायक निधि से निर्मित एक इंटरलॉकिंग सड़क का उद्घाटन किया.

समाजवादी पार्टी की तरफ से आयोजित इस कार्यक्रम में अब्बास अंसारी के साथ सपा के जिलाध्यक्ष समेत कई नेताओं ने अपनी मौजूदगी दिखाई थी. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के NDA के साथ जाने के बाद अब्बास अंसारी के लिए नई राजनीतिक राह तलाशना जरूरी हो गया है. मऊ, गाजीपुर और पूर्वांचल के कुछ अन्य जिलों में अंसारी परिवार का प्रभाव अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. मुस्लिम और कुछ पिछड़ी जातियों के बीच उनकी राजनीतिक पहचान कायम है. ऐसे में 2027 से पहले उनका अगला राजनीतिक कदम कई दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.

हरिशंकर तिवारी की विरासत पर दावा

पूर्वांचल के एक और बड़े राजनीतिक परिवार में भी हलचल दिखाई दे रही है. हरिशंकर तिवारी के निधन के बाद यह माना जा रहा था कि उनका राजनीतिक नेटवर्क धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा. लेकिन हाल के महीनों में उनके बेटे विनय शंकर तिवारी की बढ़ती सक्रियता कुछ और संकेत दे रही है. विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार विधानसभा सीट से BSP के टिकट पर 2017 में विधायक चुने गए थे. राजनीतिक जानकार उनकी मौजूदा सक्रियता को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पुराने समर्थक आधार को फिर से संगठित करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं. ब्राह्मण राजनीति के प्रभावशाली केंद्र रहे तिवारी परिवार की पकड़ भले पहले जैसी न रही हो, लेकिन पूर्वांचल के कई इलाकों में उनका सामाजिक नेटवर्क अब भी मौजूद है. ऐसे में विनय शंकर तिवारी की बढ़ती सक्रियता को पूर्वांचल की बदलती राजनीतिक बिसात का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है.

अमनमणि की वापसी की कोशिश

महराजगंज के नौतनवा क्षेत्र से जुड़े अमन मणि त्रिपाठी भी राजनीतिक पुनर्वास की कोशिश में दिखाई दे रहे हैं. पत्नी की मृत्यु के मामले में गिरफ्तारी और उसके बाद उपजे विवादों के कारण उनका राजनीतिक करियर लंबे समय तक प्रभावित रहा. महराजगंज जिले की नौतनवा विधानसभा सीट पर अमनमणि त्रिपाठी एक बार फिर राजनीतिक सक्रियता बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं. पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि ने 2017 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नौतनवा से विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई थी.

हालांकि 2022 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. पिछले कुछ महीनों से वे क्षेत्र में जनसंपर्क, सामाजिक कार्यक्रमों और समर्थकों के साथ बैठकों में लगातार सक्रिय हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अमनमणि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं. नौतनवा क्षेत्र में अब भी उनका एक प्रभावशाली समर्थक वर्ग मौजूद माना जाता है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी सक्रियता

बाहुबली राजनीति की चर्चा केवल पूर्वांचल तक सीमित नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी कई प्रभावशाली नेता अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. खतौली से विधायक मदन भैया इसका प्रमुख उदाहरण हैं. लंबे समय से विवादों और आपराधिक मामलों के कारण चर्चा में रहने के बावजूद वे गुर्जर राजनीति के एक प्रभावशाली चेहरे बने हुए हैं. राष्ट्रीय लोक दल के साथ उनकी मौजूदगी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थानीय प्रभाव की राजनीति को दर्शाती है. इसी तरह कैसरगंज के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह का परिवार भी लगातार अपने राजनीतिक विस्तार में जुटा है. बेटों को विधायक और सांसद बनाने के बाद अब परिवार के अन्य सदस्यों को भी राजनीति में आगे बढ़ाने की चर्चा है.

उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अधिकांश बाहुबली नेता स्वयं चुनावी मैदान में उतरने के बजाय अपने परिवार के सदस्यों को आगे बढ़ा रहे हैं. धनंजय सिंह की जगह श्रीकला सिंह, बृजेश सिंह के बेटे सिद्धार्थ सिंह, हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी, मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी और बृज भूषण शरण सिंह के बेटे तथा अन्य पारिवारिक सदस्य इसका उदाहरण हैं.

यह रणनीति कई कारणों से अपनाई जा रही है. पहला, कई नेताओं पर कानूनी या राजनीतिक प्रतिबंध हैं. दूसरा, नई पीढ़ी को अपेक्षाकृत साफ-सुथरी छवि के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है. तीसरा, परिवार के माध्यम से पुराना वोट बैंक भी सुरक्षित रहता है. यानी चेहरे नए हैं लेकिन राजनीतिक नेटवर्क पुराने ही बने हुए हैं.

Read more!