बिहार में नदियों से माल ढुलाई बड़े काम की योजना, लेकिन इसे जमीन पर उतारना क्यों है मुश्किल?

बिहार सरकार अपनी सात नदियों पर नौ-परिवहन की सुविधा विकसित करने की तैयारी में है और इसके लिए योजना बनाकर केंद्र सरकार से सहयोग मांगा है

Cargo Ship in Patna, Ganga Water way (Photo by : Pushyamitra)
पटना में गाय घाट पर खड़े मालवाहक जहाज (फोटो : पुष्यमित्र)

राजधानी पटना से सटे गाय घाट के पास गंगा नदी में भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) का एक मालवाहक जहाज खड़ा है. यह झारखंड के पाकुड़ से स्टोन चिप्स को लेकर साहिबगंज से चला था और अब पटना पहुंचा है.  बीते पूरे साल प्राधिकरण के ऐसे चार जहाज जलमार्ग से होते हुए पटना और वाराणसी जाते रहे हैं.

इस वित्त वर्ष में इन जहाजों ने कुल 3363 मीट्रिक टन स्टोन चिप्स की ढुलाई की है. अगर यही स्टोन चिप्स ट्रकों पर आता तो इसकी ढुलाई का खर्चा तीन गुना अधिक होता. इस लिहाज से परिवहन का यह साधन काफी सस्ता साबित हो रहा है. इसके अलावा इसी रूट पर पांच लक्जरी रिवर क्रूज भी चल रहे हैं, जिनसे इस वित्त वर्ष में दिसंबर, 2025 तक पांच हजार से ज्यादा यात्रियों ने सफर किया.

इसी अनुभव को देखते हुए बिहार सरकार के परिवहन विभाग ने तय किया है कि वह माल ढुलाई के लिए अब राज्य की नदियों में जल परिवहन को बढ़ावा देगी. इसी वजह से 23 जनवरी, 2026 को कोच्चि में जब आंतरिक जलमार्ग विकास परिषद की तीसरी बैठक आयोजित हुई तो राज्य के परिवहन मंत्री श्रवण कुमार ने केंद्र सरकार से गंगा नदी पर हर सौ किमी पर टर्मिनल बनाने की मांग की. उन्होंने खासकर बक्सर और बेगूसराय के सिमरिया में मल्टी मॉडल टर्मिनल और ट्रांसपोर्टेशन हब बनाने की भी मांग रखी और कहा कि केंद्र सरकार बिहार को ऐसी सुविधाएं दे ताकि भारत-नेपाल सीमा पर व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सके.

पटना में वॉटर मेट्रो चलाने की तैयारी

इस मौके पर उन्होंने जानकारी दी कि बिहार में सात अधिसूचित जलमार्ग हैं. इनकी लंबाई 1887 किमी है. इनमें मुख्य जलमार्ग यानी गंगा नदी पर बने राष्ट्रीय जलमार्ग-एक, की लंबाई 480 किमी है. गंगा जलमार्ग को विकसित करने का काम 827 करोड़ रुपए की लागत से पूरा कर लिया गया है. इसके अलावा पटना शहर के लिए वॉटर मेट्रो चलाने की तैयारी हो रही है. इसके लिए जेटी टर्मिनल का विकास और जहाजों की खरीद की जा रही है, जिसमें 12 सौ करोड़ रुपए खर्च होंगे.

इस समय बिहार में अलग-अलग नदियों पर 1550 घाट बने हुए हैं, जिनसे होकर सात हजार से अधिक नावों का परिचालन हो रहा है. बिहार सरकार 150 अन्य घाटों पर भी सामुदायिक जेटी का निर्माण करने की योजना बना रही है. कटिहार के मनिहारी में रो-रो, रो-पैक्स टर्मिनल और सोन नदी के जरिए नौवहन की भी योजना सरकार की है.

पहली नजर में ऐसी योजनाएं काफी महत्वपूर्ण लग रही हैं. सरकार की योजना बिहार में गंगा के अलावा गंडक, कोसी, घाघरा, सोन और पुनपुन नदी में जलमार्ग को विकसित करने की है. इनमें से ज्यादातर नदियों में सर्वेक्षण का काम चल रहा है, कई जगह पूरा भी हो गया है. गंडक और कोसी नदी सरकार की प्राथमिकताओं में है, क्योंकि इन नदियों में जल परिवहन विकसित होगा तो इसका फायदा नेपाल को भी मिलेगा. नेपाल के पास समुद्री तट नहीं है. ऐसे में भारतीय बंदरगाहों से नेपाल तक माल ट्रकों में जाता है और इसकी लागत काफी बढ़ जाती है.  अगर गंडक औऱ कोसी में जलमार्ग विकसित हो जाता है तो वह इनके जरिए ही अपना सामान बंगाल की खाड़ी से सीधे मंगा सकता है. इसके बदले में वह भारत को इन नदियों पर यहां डैम बनाने की इजाजत दे सकता है. नेपाल में बने डैम बिहार में बाढ़ को नियंत्रित कर सकते हैं.

मगर सवाल यह है कि कागजों पर यह योजना जितनी आसान दिख रही है, क्या उसे जमीन पर उतारना उतना ही आसान है? बिहार की नदियों के विशेषज्ञ और जल संसाधन विभाग के पूर्व अधिकारी गजानन मिश्र कहते हैं, “यहां नदियों में जल परिवहन की व्यवस्था पौराणिक काल से रही है. 1925 तक हुगली से जहाज चलकर गंगा, बूढ़ी गंडक और बागमती की दो अलग धाराओं से गुजरते हुए दरभंगा तक आते थे. सोन नदी की नहरों में भी नौवहन की व्यवस्था थी. इसका फायदा नेपाल को भी मिलता था. बिहार की इन्हीं नदियों से होकर उनका जहाज नेपाल के महेंद्र राजमार्ग तक पहुंचता था. इसलिए अगर बिहार सरकार इसे फिर से बहाल करने की तैयारी कर रही है तो यह अच्छी बात है, मगर यह सब सिर्फ सदिच्छा से मुमकिन नहीं है.”

गजानन मिश्र आगे बताते हैं, “दरअसल पिछले सौ सालों में पहले अंग्रेजों ने, फिर हम लोगों ने ही अपने राज्य की नदियों को तबाह किया है. अंग्रेजों ने नौ-परिवहन के बदले रेलमार्ग को बढ़ावा दिया. इससे नौ-परिहन का महत्व घटा. फिर हमने इन नदियों पर बराज और तटबंध बनाए, नेपाल में हिमालय पर पेड़ों की कटाई हुई. इससे इन नदियों में सिल्ट (गाद) बढ़ा और उनमें परिवहन की गुंजाइश घटती गई.”

बिहार की नदियों में जगह-जगह पुल बने हैं. इनके अलावा मौसमी पीपा और चचरी पुल भी खूब बनते हैं जो नदियों में परिवहन के लिए दिक्कतें पैदा सकते हैं, मगर सबसे बड़ी समस्या गाद है. गाद इतना ज्यादा है कि नदियों में सालभर जहाज या नाव चलना मुश्किल हो जाता है. गंगा में छह से आठ महीने और दूसरी नदियों में तीन से चार महीने ही इतना पानी होता है, जिसमें जहाज चल सके.

ऐसे में जलमार्ग प्राधिकरण गंगा में लगातार ड्रेजर मशीन से खुदाई करता रहता है, ताकि जहाजों के रास्ते में पर्याप्त पानी हो. हालांकि यह स्थाई समाधान नहीं है. गजानन मिश्र कहते हैं, “यह महंगा भी है और समस्या पूरी तरह नहीं सुलझती. इसलिए सबसे जरूरी है कि सरकार इन नदियों को सदानीरा बनाने की दिशा में सोचे और स्थाई समाधान की तरफ बढ़े. इसके लिए सबसे जरूरी है कि इन नदियों में गाद जमा न हो. इसके लिए नेपाल के सहयोग से हिमालय पर वृक्षारोपण करना और कम से कम फरक्का बराज जैसी बाधाओं पर विचार करना जरूरी है. सरकार को नदियों पर अनावश्यक बराज बनाने के फैसले पर भी पुनर्विचार करना होगा. अगर सरकार ऐसा नहीं करती है, तो वॉटर-वे की पूरी घोषणा कोरी ही साबित होगी.”

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