रोजी-रोजगार की उम्मीद जगाने वाले बिहार के इथेनॉल प्लांट से कैसे पहुंचे बंद होने के कगार पर?
बीते चार साल में दो दर्जन के करीब इथेनॉल प्लांट लगने से बिहार में स्थानीय स्तर पर रोजी-रोजगार की बड़ी उम्मीद जगी थी लेकिन केंद्र सरकार की एक नीति में बदलाव से यह धराशायी होती दिख रही है

महज दो माह पहले की बात होगी. बक्सर जिले के नवानगर गांव का प्रिंस BJP के इलेक्शन कैंपेन का स्टार बना हुआ था. 16-17 साल की उम्र से ही पलायन के लिए मजबूर प्रिंस दो साल पहले अपने गांव लौट आया, जब वहां इथेनॉल का प्लांट खुला था. वह रिवर्स माइग्रेशन का आदर्श उदाहरण था, इसलिए BJP ने उसकी कहानी को अपने चुनावी अभियान में शामिल किया था.
मगर अब प्रिंस के चेहरे पर अनिश्चितता के बादल छाए दिखते हैं, क्योंकि जिस इथेनॉल प्लांट में वह ऑफिस ब्वाय का काम कर रहा है, वह बंद होने के कगार पर पहुंच गया है. इंडिया टुडे से बातचीत में प्रिंस कहता है, "लगता है सुख के दिन बीत गए. अब रोजी-रोटी के लिए फिर से अहमदाबाद औऱ सूरत में भटकना पड़ेगा.”
दरअसल प्रिंस जिस भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड में काम करता है, केंद्र सरकार ने उससे इथेनॉल खरीद का कोटा आधे से भी कम कर दिया है. यानी अब यह प्लांट साल में छह महीने ही उत्पादन करेगा. और यह स्थिति सिर्फ इसी प्लांट की नहीं है, बिहार के 14 ग्रेन बेस्ड इथेनॉल कंपनियां कमोबेश इसी संकट से गुजर रही हैं. ग्रेन बेस्ड का मतलब है कि ये कंपनियां चावल और मक्के से इथेनॉल बनाती हैं.
भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य प्रबंध निदेशक (CMD) अजय सिंह इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं, “नवंबर, 2025 में अचानक बिहार की कंपनियों से इथेनॉल खरीद का कोटा 45 फीसदी कर दिया गया है. जबकि इससे पहले हम जितना इथेनॉल तैयार करते थे, कंपनियां सारा का सारा खरीद लेती थीं. बिहार की ग्रेन बेस्ड इथेनॉल कंपनियां इथेनॉल बनाती ही इसलिए हैं कि उसे पेट्रोल में मिलाया जा सके. अब जबकि हमारा कोटा कम हो गया है तो हमारे सामने उत्पादन घटाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है.” वे आगे यह भी कहते हैं, “कोटा घटाने का सबसे अधिक नुकसान बिहार को हो रहा है क्योंकि गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों का अभी भी सौ फीसदी कोटा है. ओडिशा, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मेघालय, असम और तेलंगाना का कोटा 80 फीसदी से अधिक है.”
उद्योगहीनता का दंश झेल रहे बिहार में जब अप्रैल, 2022 में पूर्णिया में पहली ग्रेन बेस्ड इथेनॉल फैक्टरी शुरू हुई तो लगा कि इथेनॉल के जरिये राज्य इस अभिशाप को खत्म कर सकता है. तब 17 इथेनॉल प्लांट लगने की बात हुई थी और राज्य सरकार ने अपनी इथेनॉल पॉलिसी भी तैयार की थी. आने वाले दिनों में यहां 14 ग्रेन बेस्ड इथेनॉल प्लांट लगे और सात गन्ने से इथेनॉल बनाने के प्लांट स्थापित हुए. अजय कहते हैं, “जब हम लोग प्लांट लगा रहे थे तब पेट्रोल में सिर्फ दस फीसदी इथेनॉल मिलाया जा रहा था. बाद में इथेनॉल ब्लैंडिंग 20 फीसदी हो गई. इसलिए हम जो इथेनॉल तैयार करते वह सरकार हमसे ले लेती.” जनवरी, 2022 में हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और IOCL ने उनसे इथेनॉल खरीदने का करार किया था. अजय बताते हैं, “उस करार में यह तय हुआ था कि अगर ये कंपनियां कोटा से अधिक इथेनॉल खरीदना चाहेंगी तो वह ग्रेन बेस्ड इथेनॉल कंपनियों को तरजीह देंगी. मांग बढ़ी तो ये कंपनियां हमारा सारा माल खरीदने लगीं.”
मगर धीरे-धीरे इथेनॉल के मामले में प्राथमिकता बदलने लगी. अब गन्ने से बने इथेनॉल को प्राथमिकता दी जाने लगी, क्योंकि वह सस्ता होता है. इसके अलावा पेट्रोलियम कंपनियां अपने पास के प्लांट से इथेनॉल खरीदने को प्राथमिकता देने लगी, क्योंकि इससे उनका ट्रांसपोर्टेशन खर्च कम होने लगा. इसी वजह से एक तो ग्रेन बेस्ड इथेनॉल का कोटा घटने लगा. और उसमें भी गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों के ग्रेन बेस्ड इथेनॉल को तरजीह दी जाने लगी. ऐसे में बिहार जैसे राज्य, जिसने अपना सारा फोकस ग्रेन बेस्ड इथेनॉल पर डाल रखा था, को सबसे अधिक नुकसान भुगतना पड़ रहा है. अजय के मुताबिक, “दिक्कत यह है कि जहां दूसरे राज्यों की कंपनियों के पास एक विकल्प शराब बनाने का भी रहता है. उनका कोटा कम होता है तो वे बचे कोटे की शराब बना लेती हैं. बिहार में हम जैसी कंपनियों के पास वह विकल्प भी नहीं है, क्योंकि हमें इसी शर्त पर बिहार में प्लांट खोलने की इजाजत मिली है. बिहार में भी तीन ग्रेन बेस्ड कंपनियों को शराब बनाने की इजाजत है, मगर शेष 11 को नहीं है.”
बिहार की 14 में से 11कंपनियों का उत्पादन 2024-25 में जहां 47.64 करोड़ लीटर प्रति वर्ष था, वह 2025-26 में घटकर 23.82 करोड़ लीटर सालाना रह गया है. ये कंपनियां बदली परिस्थितियों में सबसे अधिक नुकसान झेल रही हैं और इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को लगातार पत्र भेज रही हैं. कंपनियों के शीर्ष अधिकारी बिहार के मुख्य सचिव से मिलकर समस्या का समाधान करने की मांग कर रहे हैं. इनकी एक ही मांग है कि 2022 के समझौते के हिसाब से उनका इथेनॉल खरीदा जाए.
अजय कहते हैं, “हमने तो सरकार से लिखित आश्वासन और लंबे वक्त की डील के आधार पर ही प्लांट लगाए थे. अब अचानक नियम बदलने से हम गंभीर संकट में हैं और कई कंपनियां बंद होने के कगार पर हैं. अब सरकार अपने समझौते का पालन करे या फिर हमें भी अल्कोहल बनाने की इजाजत दी जाए. नहीं तो अगले कुछ महीनों में कई प्लांट पूरी तरह बंद हो जाएंगे. जैसे कुछ दशक पहले बिहार की चीनी मिलों में ताला लग गया था.”
इस मसले पर बिहार सरकार की राय जानने के लिए हमने कई दफा राज्य के उद्योग मंत्री दिलीप कुमार जायसवाल से लिखित और फोन पर संपर्क किया, मगर उनका जवाब हमें नहीं मिला है. जवाब मिलते ही हम इस खबर को अपडेट करेंगे.