प्रोफेसरी मिली नहीं, उल्टे विवाद में कैसे फंस गए बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी?

बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी ने असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी के लिए जरूरी परीक्षाएं पास कर लीं इसके बावजूद उनको नियुक्ति नहीं मिल पाई

नीतीश कुमार पर लिखी अपनी किताब एक पार्टी कार्यकर्ता को सौंपते अशोक चौधरी (दाएं)

“हमने उनका (अशोक चौधरी) मामला कमीशन (बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग) में भेज दिया है. कमीशन जांच करेगा और आगे की कार्रवाई तय करेगा. हमने गहराई से इस मामले को देखा था. इसमें डिफरेंसेस (गड़बड़ी) पाए गए थे.” बिहार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने यह जवाब तब दिया, जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आखिर बिहार कैबिनेट में उनके सहयोगी रहे अशोक चौधरी के मामले में ऐसा क्या हुआ कि इंटरव्यू में सफल होने के बावजूद असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर उनकी नियुक्ति रोक दी गई है.  

दरअसल नीतीश कुमार के करीबी बताए जाने वाले बिहार सरकार में ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने 2020 में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा आयोजित की गई असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के लिए आवेदन किया था. यह आवेदन उन्होंने क्यों किया इस संबंध में उन्होंने कभी सार्वजनिक बयान नहीं दिया, मगर व्यक्तिगत बातचीत में वे कहते थे कि अपने राजनीतिक कैरियर की अस्थिरता को देखते हुए उन्होंने यह आवेदन किया था. हालांकि जिस वक्त उन्होंने इस पद के लिए आवेदन किया था, तब भी वे बिहार सरकार में भवन निर्माण मंत्री थे.

इंटरव्यू के बाद साल 2025 के जून महीने में जब इस भर्ती का रिजल्ट जारी हुआ और वे सफल साबित हुए.  राजनीति विज्ञान विषय के कुल 276 अभ्यर्थी सफल हुए थे, उनमें अनुसूचित जाति की श्रेणी में चौधरी का दसवां स्थान था.  अनुसूचित जाति की श्रेणी में कुल 45 अभ्यर्थी सफल हुए थे.

मगर 15 दिसंबर, 2025 को इन सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति के लिए उच्च शिक्षा विभाग द्वारा पत्र जारी किया गया तो उसमें यह उल्लेख था, “आयोग से प्राप्त अनुशंसा पत्र में अनुसूचित जाति के चयनित अभ्यर्थी के क्रमांक 10 में अंकित नाम को तत्काल स्थगित रखते हुए अन्य 275 अभ्यर्थियों के नियुक्ति की कार्रवाई की जाएगी.”  इस पत्र में अभ्यर्थी अशोक चौधरी के नाम का उल्लेख नहीं था, मगर चूंकि अनुसूचित जाति श्रेणी के रिजल्ट में दसवें क्रमांक पर उन्हीं का नाम था, इसलिए इस खबर ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था.  इसलिए पत्रकारों ने शिक्षा मंत्री से यह सवाल पूछा.

चूंकि अपने जवाब में शिक्षा मंत्री ने यह साफ नहीं किया था कि आखिर किस वजह से अशोक चौधरी की नियुक्ति को रोका गया है और इसे पुनर्विचार के लिए बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग के पास फिर से भेजा गया है. ऐसे में इंडिया टुडे ने शिक्षा मंत्री सुनील कुमार से मिलकर उनसे यह सवाल पूछा और स्थिति साफ करने का आग्रह किया.

हमें भी अपने जवाब में उन्होंने इतना ही कहा, “आप यह समझिएं कि उनके मामले में विसंगतियां हैं, इसलिए आयोग के पास मंतव्य (राय-मशविरे) के लिए भेजा गया है. इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता.” 

जब इंडिया टुडे ने उनसे यह जानना चाहा कि विसंगतियां क्या उनके प्रमाण पत्रों में है, या कोई और बात है. इस सवाल पर उन्होंने कहा, “हर बात बताई नहीं जा सकती. मैं जितना बता सकता था, मैंने बता दिया. इस बात को मैं इससे अधिक साफ नहीं कर सकता.”

जाहिर है, उनके इस अधूरे जवाब की वजह से मामला और संदिग्ध हो गया है. चूंकि मामला JDU के बड़े नेता, नीतीश कुमार के करीबी और बिहार सरकार के मंत्री का है, इसलिए इस पर लगातार चर्चा हो रही है. मीडिया में खबरें आ रही हैं और विपक्षी दलों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया है.

RJD के प्रवक्ता नवल किशोर यादव ने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को पत्र लिखकर इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है. इस पूरे मसले पर सबसे अधिक मुखर कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी नजर आ रहे हैं. वे लगातार मीडिया में इस मसले को उठा रहे हैं.

इंडिया टुडे से बातचीत में असित कहते हैं, “इस पूरे प्रकरण में जो बात साफ-साफ नहीं कही जा रही है, वह यह है कि मंत्री अशोक चौधरी की पीएचडी की डिग्री संदिग्ध है. इसी वजह से उनकी नियुक्ति पर रोक लगी है और शिक्षा मंत्री ने आयोग के पास मामले को भेजा है.” वे आगे यह भी आरोप लगाते हैं, “मंत्री अशोक चौधरी ने मगध विश्वविद्यालय के कुलपति से मिलकर यह फर्जीवाड़ा किया है. इसी वजह से उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर उन्हें एएन कॉलेज के प्रिंसिपल से मगध विवि का कुलपति बनवा दिया. उनकी पीएचडी डिग्री ही नहीं, डी-लिट की वह डिग्री भी संदिग्ध है, जो उन्हें हाल ही में मिली है.”

नवंबर, 2025 में अशोक चौधरी को मगध विश्वविद्यालय ने डी-लिट की डिग्री दी है. इसका विषय है, “जाति आधारित सर्वेक्षण की प्रासंगिकता, बिहार के परिप्रेक्ष्य में एक सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन.” उन्होंने अपनी पीएचडी की डिग्री 2003 में मगध विश्वविद्यालय से ही हासिल की थी.

इससे पहले अशोक चौधरी ने पटना विश्वविद्लायय से एमए, पटना कॉलेज से इंटरमीडिएट और बीए (आनर्स) और एसजीडी पाटलीपुत्र हाई स्कूल, पटना से मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की थी. असित भले ही उऩकी पीएचडी की डिग्री को संदिग्ध बता रहे हैं, मगर कई लोगों का कहना है कि मामला उनकी डिग्री से जुड़ा न होकर पात्रता की शर्तों से जुड़ा हो सकता है. 

साइंस कॉलेज, पटना के लेक्चरर डॉ. अखिलेश कुमार कहते हैं, “दरअसल यूजीसी ने 2009 में असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली को लेकर जो नया नियम बनाया है, उसके मुताबिक जिन लोगों ने 2009 से पहले पीएचडी की डिग्री हासिल की है, उन्हें फाइव प्वाइंट सर्टिफिकेशन पेश करना होता है. इसमें ये शर्तें होती हैं कि अभ्यर्थी ने पीएचडी की डिग्री रेगुलर कोर्स के जरिए हासिल की हो, शोध प्रबंध का मूल्यांकन कम से कम दो बाहरी पर्यवेक्षकों ने किया हो, मौखिक परीक्षा हुई हो, दो शोध पत्र प्रकाशित किए हों और सेमिनारों में अपने दो शोध पत्र प्रस्तुत किए हों. पुराने पीएचडी धारकों को इन शर्तों के मामले में दिक्कतें होती हैं.”

ऐसा माना जा रहा है कि संभवतः अशोक चौधरी, जिन्होंने अपनी पीएचडी 2003 में पूरी की थी, ने इन शर्तों को पूरा नहीं किया हो, या इसमें कुछ शर्तें आधी-अधूरी रह गई हों. और आयोग ने इन मसलों पर ठीक से गौर नहीं किया हो, इसलिए उच्च शिक्षा विभाग ने इन विसंगतियों का उल्लेख करते हुए फिर से उनके डोजियर को आयोग के पास भेजा होगा.

हैरत की बात यह है कि अशोक चौधरी की नियुक्ति से जुड़ा जो डोजियर आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग को भेजा, वह उच्च शिक्षा विभाग के उन कर्मियों के पास भी नहीं पहुंचा, जो इनका निपटारा कर रहे थे. विभाग के सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक आयोग ने राजनीति विज्ञान के सभी सफल अभ्यर्थियों के डोजियर काफी पहले भेज दिए थे. अमूमन इनके मिलते ही विभाग इन्हें संबंधित कॉलेजों को नियुक्ति की अनुशंसा करते हुए भेज देता था. मगर इस बार इस काम में एक महीने से अधिक वक्त लग गया. सफल अभ्यर्थी जब विभाग में आकर पूछताछ करने लगे तब इन्हें जारी किया गया.

अनौपचारिक बातचीत में विभाग के स्टाफ कहते हैं, उन्होंने अशोक चौधरी का डोजियर देखा ही नहीं, यह कब आया, कहां रखा गया और कब वापस हुआ, यह उनको भी पता नहीं चला. 

वैसे यह भी कहा जा रहा है कि मसला नाम के फर्क का है. अशोक चौधरी ने चुनावी हलफनामे में अपना नाम अशोक चौधरी लिखा है और उनकी शैक्षणिक डिग्रियों में उनका नाम अशोक कुमार है. असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर उन्होंने जो आवेदन किया था, उसमें भी उनका नाम अशोक कुमार था और इसी नाम से उनका रिजल्ट भी आया है.  मगर जानकार बताते हैं कि यह बहुत छोटा मसला है. इस वजह से नियुक्ति रुक जाये ऐसा मुमकिन नहीं, क्योंकि आवेदन तो अशोक कुमार के नाम से ही हुआ है.  

इस पूरे मसले पर मंत्री अशोक चौधरी खुद बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हो पा रहे और आयोग की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया है. इंडिया टुडे ने जब बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के दफ्तर जाकर इस संबंध में जानकारी जुटाने की कोशिश की तो वहां अध्यक्ष और सचिव दोनों अनुपस्थित थे. बाद में जब हमने अध्यक्ष गिरीश कुमार चौधरी के फोन पर संपर्क करने की कोशिश की तो बताया गया कि वे व्यस्त हैं और बात नहीं हो सकती.

बहरहाल मामला जो भी हो, मगर मंत्री रहने के बावजूद प्रोफसर बनने की तमन्ना पाले अशोक चौधरी की नौकरी अभी अटकी हुई है और उनकी दावेदारी को लेकर विवाद जारी है.

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