उत्तर प्रदेश के कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की संख्या घटती क्यों जा रही है?
शिक्षकों के हजारों खाली पद, गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चलती कक्षाएं और पारंपरिक डिग्री की घटती उपयोगिता के बीच उत्तर प्रदेश के कॉलेजों में दाखिले घटते जा रहे हैं

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय प्रदेश ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में गिना जाता रहा है. यहां दाखिले के लिए छात्रों में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती थी और कई विभागों में सीटें कम पड़ जाती थीं. लेकिन आज इसी विश्वविद्यालय का उदाहरण प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के बदलते हालात को समझने के लिए दिया जा रहा है.
विश्वविद्यालय में 519 स्वीकृत शिक्षकों के पदों के मुकाबले 122 पद खाली हैं और पढ़ाई का बड़ा हिस्सा संविदा या गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चल रहा है. यही स्थिति केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है. प्रदेश के हजारों कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी, ढांचागत समस्याएं और रोजगार से जुड़ी अनिश्चितता के कारण छात्रों का भरोसा पारंपरिक डिग्री पाठ्यक्रमों से धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है. इसका असर सीधे दाखिले के आंकड़ों में दिखाई देने लगा है.
उच्च शिक्षा निदेशालय की ओर से विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 8072 राजकीय, सहायता प्राप्त और वित्तविहीन महाविद्यालयों में इस सत्र में बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे पारंपरिक पाठ्यक्रमों में कुल 48,95,468 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है. पिछले साल यह संख्या 53,28,969 थी. यानी एक साल में करीब चार लाख छात्रों की कमी दर्ज की गई है. इससे पहले 2023-24 सत्र में 54,76,441 छात्र-छात्राएं पंजीकृत थे.
लगातार घटती यह संख्या इस बात का संकेत दे रही है कि प्रदेश के युवाओं का रुझान धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के पारंपरिक ढांचे से कम हो रहा है. हालांकि इन आंकड़ों में एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आता है. उच्च शिक्षा में छात्राओं की संख्या अभी भी छात्रों से अधिक है. इस सत्र में 24,98,560 छात्राओं ने दाखिला लिया, जबकि छात्रों की संख्या 23,96,908 रही. लेकिन कुल संख्या में गिरावट यह बताती है कि राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली को लेकर छात्रों के मन में कई तरह की शंकाएं और असंतोष मौजूद हैं.
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा कारण कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी है. कई संस्थानों में स्थाई शिक्षकों की संख्या इतनी कम है कि पूरी पढ़ाई गेस्ट फैकल्टी या संविदा शिक्षकों के भरोसे चल रही है.
इसी साल 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस समस्या पर गंभीर चिंता जताई है. न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पदों को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए आदेश दिया कि सभी शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को चार महीने के भीतर भरा जाए. अदालत ने यह भी कहा कि कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे प्रशासनिक पद एक महीने के भीतर भरना सुनिश्चित किया जाए. अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्रों से जुड़ी समस्याओं और आत्महत्या की घटनाओं पर सुनवाई हो रही थी.
उत्तर प्रदेश में यह संकट और भी गहरा है. लखनऊ के एक कालेज के शिक्षक रमेश सिंह बताते हैं, “कई जिलों में कॉलेजों की स्थिति ऐसी है कि आधे से भी कम शिक्षकों के सहारे पढ़ाई चल रही है. शिक्षा जगत में इसे व्यंग्य में “अतिथि देवो भवः मॉडल” कहा जाने लगा है, क्योंकि स्थाई शिक्षकों की जगह गेस्ट फैकल्टी के भरोसे कक्षाएं चल रही हैं.” लखनऊ के ही ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय में 74 स्वीकृत शिक्षकों के मुकाबले केवल 39 स्थाई शिक्षक कार्यरत हैं. बाकी कक्षाएं संविदा और गेस्ट फैकल्टी से संचालित की जा रही हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि भर्ती का रोस्टर विवाद अदालत में लंबित होने के कारण 2020 से स्थाई नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं. इसका असर संस्थान की अकादमिक गुणवत्ता पर भी पड़ा है और हाल ही में हुए मूल्यांकन में विश्वविद्यालय को अपेक्षित ग्रेड नहीं मिल सका.
लखनऊ के कई सहायता प्राप्त कॉलेजों की स्थिति भी अलग नहीं है. बप्पा श्रीनारायण वोकेशनल पीजी कालेज यानी केकेवी में फिजिकल एजुकेशन का एकमात्र पद पिछले 15 वर्षों से खाली पड़ा है. अरब कल्चर विषय में दो पद स्वीकृत हैं लेकिन वर्षों से कोई शिक्षक नियुक्त नहीं हुआ, जिसके कारण इस विषय में प्रवेश भी नहीं लिए जा रहे. इसी तरह डीएवी डिग्री कालेज लखनऊ में सांख्यिकी विषय के दो पद करीब 25 वर्षों से खाली हैं और पूरा विभाग एक पार्ट-टाइम शिक्षक के भरोसे चल रहा है. बॉटनी विभाग में भी लंबे समय से पद रिक्त हैं. भूगोल विभाग में तीन में से दो पद पहले से खाली हैं और तीसरे शिक्षक भी जल्द सेवानिवृत्त होने वाले हैं. कॉलेज में कुल 57 स्वीकृत पदों में से 21 पद खाली हैं. शिक्षकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में अकादमिक माहौल बनाना बेहद मुश्किल हो जाता है. एक वरिष्ठ शिक्षक बताते हैं कि जब विभाग में पर्याप्त शिक्षक नहीं होंगे तो न तो रिसर्च का माहौल बन पाएगा और न ही छात्रों को गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई मिल सकेगी.
राजधानी से बाहर जिलों की स्थिति और भी गंभीर है. गोंडा के राजकीय महाविद्यालय भवानीपुर कला में 11 विषयों की पढ़ाई होती है, लेकिन वहां एक भी नियमित प्रोफेसर तैनात नहीं है. इसी तरह श्रावस्ती के तीन राजकीय महाविद्यालयों में 36 स्वीकृत पदों में से 19 पद खाली पड़े हैं. रायबरेली के फिरोज गांधी कालेज और बहराइच के किसान पीजी कालेज में भी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त हैं. ऐसी स्थिति में छात्रों को नियमित कक्षाएं नहीं मिल पातीं. कई बार पूरे सेमेस्टर में शिक्षक बदलते रहते हैं या फिर कुछ विषयों की पढ़ाई नाम मात्र की होती है.
छात्रों का कहना है कि यही कारण है कि अब वे पारंपरिक डिग्री पाठ्यक्रमों के बजाय दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय के एक छात्र का कहना है कि बीए या बीएससी जैसी डिग्री करने के बाद रोजगार की कोई स्पष्ट संभावना नहीं दिखती. इसलिए कई छात्र सीधे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या स्किल आधारित कोर्स की ओर जा रहे हैं. एक छात्रा अनामिका बताती हैं कि कॉलेज में कई विषयों की नियमित कक्षाएं नहीं होतीं, इसलिए उन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या कोचिंग संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है. ऐसे में कॉलेज की पढ़ाई कई बार औपचारिकता भर रह जाती है.
शिक्षा विशेषज्ञ मुदित गोयल का मानना है कि रोजगार से जुड़ी अनिश्चितता भी छात्रों को पारंपरिक पाठ्यक्रमों से दूर कर रही है. पिछले कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, डेटा साइंस, डिजाइन और अन्य प्रोफेशनल कोर्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. इसके अलावा कई निजी विश्वविद्यालय और स्किल डेवलपमेंट संस्थान भी छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं. मुदित गोयल कहते हैं “आज का छात्र व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचता है. वह ऐसी पढ़ाई करना चाहता है जिससे उसे जल्दी रोजगार मिले. यदि उसे लगता है कि पारंपरिक डिग्री से करियर की संभावनाएं सीमित हैं, तो वह दूसरे विकल्प चुनने में संकोच नहीं करता.”
राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई पहल भी की हैं. कॉलेजों में सीटें बढ़ाना, छात्रवृत्ति योजनाएं, डिजिटल लाइब्रेरी, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत बहुविषयक पाठ्यक्रम और कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना इनमें शामिल हैं. सरकार का लक्ष्य 2030 तक सकल नामांकन अनुपात यानी GER को 40 प्रतिशत तक पहुंचाना है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक शिक्षक भर्ती, बुनियादी ढांचे और पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता जैसे मुद्दों को गंभीरता से हल नहीं किया जाएगा, तब तक केवल नीतियां बनाने से स्थिति में बड़ा बदलाव आना मुश्किल है.
लखनऊ विश्वविद्यालय सहयुक्त महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष मनोज पांडेय का कहना है कि कई कॉलेजों में शिक्षकों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं. इन्हें जल्द भरने के लिए सरकार से फिर मांग की जाएगी ताकि छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तर्ज पर शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष करने का प्रस्ताव भी भेजा जाएगा ताकि अनुभवी शिक्षकों की कमी को कुछ हद तक पूरा किया जा सके.
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा युवा आबादी वाला राज्य है. यहां उच्च शिक्षा की मांग कम होने के बजाय बढ़नी चाहिए थी. लेकिन दाखिले के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि छात्रों का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है. लखनऊ विश्वविद्यालय से लेकर छोटे जिलों के कॉलेजों तक फैली यह तस्वीर बताती है कि उच्च शिक्षा के सामने असली चुनौती केवल सीटें बढ़ाना नहीं है. असली चुनौती छात्रों का भरोसा वापस जीतने की है.