राम मंदिर दान विवाद में समाजवादी पार्टी का चेहरा बने पवन पांडे कौन हैं?

अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे के आरोपों, राजनीतिक सफर और आक्रामक रणनीति ने अयोध्या की सियासत को नया मोड़ दिया

Pawan Pandey, SP Leader Ayodhya (https://www.facebook.com/pawanpandeysp)
पवन पांडे (फाइल फोटो)

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान में कथित गड़बड़ी का मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है. इसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी है. 

इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी की ओर से जिस नेता ने सबसे आक्रामक ढंग से मोर्चा संभाला है, वे हैं अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे (46), जिन्हें तेज नारायण पांडे के नाम से भी जाना जाता है. 

पिछले कुछ हफ्तों से वे लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, दस्तावेजों और आरोपों के साथ सरकार को घेर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यह सिर्फ चोरी का मामला नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा सवाल है.

पवन पांडे का दावा है कि राम मंदिर में चढ़ावे और आभूषणों की कथित चोरी की जानकारी सबसे पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंची थी. उनके मुताबिक, अखिलेश यादव ने खुद उन्हें फोन कर इस मामले की जानकारी दी थी. पांडे का कहना है कि इसके बाद उन्होंने स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटानी शुरू की और धीरे-धीरे कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आने लगा. 

7 जून को जब अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे का दुरुपयोग हो रहा है, तभी से पवन पांडे इस पूरे अभियान का स्थानीय चेहरा बन गए. वे लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि जांच एजेंसियों को चोरी और वित्तीय गड़बड़ियों के संकेत मिले हैं तो फिर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है. उनका कहना है कि अयोध्या में यह चर्चा अब हर घर तक पहुंच चुकी है और आम लोग भी जानना चाहते हैं कि भगवान के नाम पर आया दान आखिर कहां गया. 

पवन पांडे इस पूरे अभियान को धार्मिक राजनीति से अलग बताने की कोशिश करते हैं. उनका कहना है कि उनका उद्देश्य किसी धार्मिक संस्था को बदनाम करना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. उनके शब्दों में, "अगर कोई गड़बड़ी हुई है तो सरकार को दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए. भगवान के नाम पर दिया गया एक-एक रुपया और एक-एक आभूषण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है." 

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पवन पांडे ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर सवाल उठाए हों. इससे पहले भी उन्होंने ट्रस्ट द्वारा जमीन खरीद में कथित अनियमितताओं का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था. उस समय भी उन्होंने कई दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट के फैसलों पर सवाल खड़े किए थे. अब चढ़ावे की कथित चोरी का मामला सामने आने के बाद उन्होंने एक बार फिर ट्रस्ट और सरकार दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

इस विवाद के बीच पवन पांडे का एक और बयान काफी चर्चा में रहा. उन्होंने दावा किया कि इस कथित चोरी का खुलासा तब हुआ जब इसमें शामिल लोगों के बीच पैसे के बंटवारे को लेकर विवाद शुरू हो गया. उनके अनुसार, चढ़ावे की गिनती में शामिल लोग आपस में इस बात पर लड़ने लगे कि कौन ज्यादा नकदी या आभूषण ले जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि अंदरूनी विवाद के कारण ही यह मामला बाहर आया और कथित गड़बड़ियां उजागर हुईं.

उन्होंने यह भी दावा किया कि कथित चोरी कोई हालिया घटना नहीं है बल्कि लंबे वक्त से चल रही थी. उनके मुताबिक, ट्रस्ट के भीतर मौजूद कुछ लोगों ने लंबे समय तक इन गड़बड़ियों को दबाए रखा, लेकिन जैसे ही अंदरूनी संघर्ष बढ़ा, मामला सार्वजनिक हो गया. पवन पांडे ने यह भी आरोप लगाया कि कचरे के ढेर से मिले 80 लाख रुपए और अलग-अलग जगहों से कथित रूप से बरामद नकदी इस पूरे मामले की गंभीरता को दिखाती है.

सबसे अधिक चर्चा उनके उस बयान की हुई जिसमें उन्होंने कहा कि "भगवान राम ने खुद अखिलेश यादव को इस कथित लूट की जानकारी दी." पांडे का कहना था कि भगवान राम ने अखिलेश यादव को इसलिए चुना क्योंकि वे भगवान शिव के भक्त हैं और केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करा रहे हैं. विपक्ष ने इस बयान को आस्था की अभिव्यक्ति बताया जबकि बीजेपी नेताओं ने इसे राजनीतिक नाटक करार देते हुए तीखी आलोचना की. लेकिन पवन पांडे अपने बयान पर कायम रहे और इसे अपनी व्यक्तिगत धार्मिक भावना से जोड़कर पेश किया. 

अयोध्या की राजनीति में पवन पांडे कोई नया नाम नहीं हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकले पांडे 2004-05 में समाजवादी छात्र सभा के समर्थन से छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए थे. इसके बाद उन्होंने अपने मामा और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता जय शंकर पांडे के मार्गदर्शन में सक्रिय राजनीति की शुरुआत की. जय शंकर पांडे फैजाबाद क्षेत्र में समाजवादी आंदोलन के शुरुआती नेताओं में गिने जाते हैं और 1989 में अयोध्या से विधायक भी रहे.

पवन पांडे की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता 2012 के विधानसभा चुनाव में मिली जब उन्होंने बीजेपी के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को अयोध्या विधानसभा सीट से हराकर बड़ा उलटफेर किया. यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि लल्लू सिंह लगातार पांच चुनाव जीत चुके थे और अयोध्या सीट बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती थी. उनकी इस जीत से प्रभावित होकर तत्कालीन समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से उनकी सराहना की और अखिलेश यादव सरकार में उन्हें मनोरंजन कर राज्य मंत्री बनाया गया.

पवन पांडेय का असली नाम तेज नारायण पांडेय है लेकिन इनकी मां इन्हें प्यार से पवन बुलाती थीं. इसी कारण यह पवन पांडेय के नाम से प्रसिद्ध हो गए. नाम में दुविधा को लेकर पवन को वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्यमंत्री के रूप में दो बार शपथ लेनी पड़ी थी. पहली बार तो उन्होंने पवन पांडेय के नाम से शपथ ली. बाद में अधि‍कारियों को पता चला कि सभी दस्तावेजों में इनका नाम तेज नारायण पांडेय था. ऐसे में पवन ने अगले ही दिन तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के नाम से शपथ ली. 

हालांकि उनका राजनीतिक सफर हमेशा आसान नहीं रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया. लेकिन करीब एक साल बाद अखिलेश यादव ने उन्हें फिर से वन राज्य मंत्री बनाकर कैबिनेट में शामिल किया. इसे राजनीतिक हलकों में इस संकेत के रूप में देखा गया कि पवन पांडे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री का भरोसा दोबारा हासिल कर लिया है. 

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के भीतर मचे पारिवारिक और राजनीतिक संघर्ष में पवन पांडे भी विवादों में घिर गए. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने उन पर एमएलसी आशु मलिक के साथ मारपीट का आरोप लगाते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया था. शिवपाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने की भी सिफारिश की थी. पांडे ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बताया. बाद में जब पार्टी की कमान पूरी तरह अखिलेश यादव के हाथ में आई तो उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया और उन्हें एक बार फिर अयोध्या से चुनाव मैदान में उतारा गया. 

हालांकि 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनावों में उन्हें बीजेपी के वेद प्रकाश गुप्ता से हार का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बावजूद पवन पांडेय अयोध्या में समाजवादी पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा बने रहे. यही कारण है कि राम मंदिर दान विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पार्टी ने एक बार फिर उन्हें आगे किया है.

राम मंदिर दान विवाद की जांच चाहे जिस दिशा में आगे बढ़े लेकिन राजनीतिक स्तर पर समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाने का फैसला कर लिया है. इस रणनीति का सबसे प्रमुख चेहरा फिलहाल पवन पांडे हैं. आने वाले दिनों में यदि जांच आगे बढ़ती है या नए तथ्य सामने आते हैं तो अयोध्या की यह लड़ाई केवल अदालतों या जांच एजेंसियों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में भी बनी रह सकती है.

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