BJP यूपी में आगे क्या करेगी, नए प्रदेश अध्यक्ष के एक महीने के कामकाज ने सब बता दिया!

पंकज चौधरी को करीब एक महीने पहले उत्तर प्रदेश BJP की कमान सौंपी गई थी. अब तक की उनकी मुलाकातों और दौरों से पार्टी की रणनीति का भी इशारा मिलता

up bjp president pankaj chaudhary, cm yogi adityanath
सीएम योगी आदित्यनाथ और यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी (PhotoITG)

14 दिसंबर को यूपी BJP के 17वें अध्यक्ष चुने जाने के बाद पंकज चौधरी ने लखनऊ में बैठकर फाइलें पलटने के बजाय सड़क पर उतरने का रास्ता चुना. पार्टी नेता बताते हैं कि चौधरी ने पद संभालते ही यह साफ कर दिया था कि संगठन को सिर्फ चुनावी मशीन नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक रूप से फिर से जीवंत करना उनकी प्राथमिकता होगी. इसी सोच के तहत वे पुराने नेताओं, अनुभवी कार्यकर्ताओं और सामाजिक प्रभाव रखने वाले चेहरों से लगातार संवाद कर रहे हैं.

इस क्रम में 15 जनवरी को मकर संक्रांति के मौके पर उनकी मुलाकात पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव (अनुसूचित जाति विंग) दिवाकर सेठ से हुई. जाटव दलित समुदाय से आने वाले सेठ लंबे समय से खराब स्वास्थ्य के कारण सक्रिय राजनीति से दूर हैं, लेकिन BJP के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे दलित नेता की रही है जिनकी वैचारिक जड़ें पार्टी में गहरी रही हैं. सेठ का जुड़ाव पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं से रहा है. इस मुलाकात को लेकर BJP के भीतर यह संदेश गया कि नई प्रदेश नेतृत्व टीम पार्टी के पुराने स्तंभों को न केवल याद कर रही है, बल्कि उन्हें सम्मान के साथ फिर से राजनीतिक संवाद में शामिल करना चाहती है.

इस मुलाकात के बाद पंकज चौधरी का बयान भी उसी दिशा में था. उन्होंने कहा कि पार्टी उन कार्यकर्ताओं को कभी नहीं भूलती जिन्होंने मुश्किल दौर में संगठन को समय, ऊर्जा और संसाधन दिए. उनके शब्दों में, BJP अपने कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में परिवार की तरह साथ खड़ी रहती है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह सिर्फ एक भावनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि दलित समाज को दिया गया एक संकेत भी है, खासकर उस जाटव समुदाय को, जिसे लंबे समय तक BSP का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है.

लखनऊ के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पवन मिश्र के मुताबिक, “BJP समझ चुकी है कि दलित वोट अब स्थिर नहीं है. 2024 में PDA नैरेटिव ने जिस तरह असर दिखाया, उसके बाद पार्टी को दलितों के बीच अपने पुराने नेटवर्क और प्रतीकों को फिर से सक्रिय करना जरूरी लग रहा है. दिवाकर सेठ जैसे नेता भले ही सक्रिय राजनीति में न हों, लेकिन उनकी पहचान प्रतीकात्मक तौर पर बहुत मायने रखती है.” यह मुलाकात उस बड़े एजेंडे से भी जुड़ी है, जिसमें BJP दलित-ओबीसी सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत करना चाहती है. 

पंकज चौधरी की सक्रियता सिर्फ सामाजिक संतुलन तक सीमित नहीं है. उन्होंने संगठनात्मक ढांचे को भी नए सिरे से कसने की शुरुआत कर दी है. दिसंबर में अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उन्होंने मथुरा में ब्रज क्षेत्र के तहत पहली संगठनात्मक बैठक बुलाई. मथुरा सिर्फ एक क्षेत्रीय मुख्यालय नहीं, बल्कि BJP के हिंदुत्व नैरेटिव का भी अहम प्रतीक है. पार्टी नेताओं के मुताबिक, इस बैठक में चौधरी ने कैडर से साफ कहा कि वैचारिक प्रतिबद्धता और जमीनी संगठन दोनों को साथ लेकर चलना होगा. ब्रज क्षेत्र के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया, “चौधरी ने साफ कहा कि हिंदुत्व हमारी पहचान है, लेकिन सामाजिक और स्थानीय मुद्दों पर संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि विरोधी दल जिस तरह स्थानीय असंतोष को हवा दे रहे हैं, उसका जवाब जमीन पर मौजूद रहकर ही दिया जा सकता है.”

इसके बाद 12 जनवरी को अयोध्या में हुई संगठनात्मक बैठक ने राजनीतिक हलकों में खास ध्यान खींचा. यह अवध क्षेत्र के अंतर्गत आती है. इस क्षेत्र में 15 संगठनात्मक जिले, 82 विधानसभा सीटें और 16 लोकसभा सीटें हैं. चौधरी द्वारा अयोध्या को बैठक के लिए चुनना एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है. पार्टी नेताओं के अनुसार, इसका मकसद यह संदेश देना था कि सुशासन के साथ-साथ विचारधारा अब भी पार्टी की राजनीतिक लामबंदी के केंद्र में है. 

यह वही अयोध्या है, जहां 2024 के लोकसभा चुनावों में BJP को फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी से हार का सामना करना पड़ा था, वह भी राम मंदिर के उद्घाटन के बावजूद. पार्टी के भीतर इस हार को चेतावनी के तौर पर लिया गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अयोध्या में हार ने BJP को यह अहसास करा दिया कि सिर्फ बड़े प्रतीकात्मक मुद्दे चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. स्थानीय सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन और रोजमर्रा के मुद्दे भी उतने ही अहम हैं. यही वजह है कि चौधरी अब संगठनात्मक बैठकों को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रख रहे, बल्कि फीडबैक लेने और कमजोरियों की पहचान पर जोर दे रहे हैं.

मथुरा के बाद चौधरी का अगला पड़ाव मेरठ रहा था. पश्चिम यूपी के इस शहर को वैचारिक केंद्र भले न माना जाए, लेकिन राजनीतिक और लॉजिस्टिकल लिहाज से यह एक अहम नर्व सेंटर है. यहां से कोर वेस्ट यूपी, अपर दोआब और रोहिलखंड जैसे क्षेत्रों तक आसानी से पहुंच बनाई जा सकती है. मेरठ की बैठक में BJP के मुस्लिम कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय मौजूदगी ने भी संकेत दिया कि पार्टी पश्चिम यूपी में अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर नए सिरे से संदेश देने की कोशिश कर रही है.

इसके बाद चौधरी ने काशी क्षेत्र में वाराणसी और गोरक्ष क्षेत्र में गोरखपुर का दौरा किया. ये दोनों इलाके यूपी में BJP के सबसे बड़े पावर सेंटर माने जाते हैं. वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है, जबकि गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़. इन दौरों को पार्टी के भीतर यह संकेत माना जा रहा है कि प्रदेश नेतृत्व केंद्र और राज्य दोनों के साथ तालमेल में काम कर रहा है.

चौधरी की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इन दौरों को दिलचस्प बनाती है. वे पूर्वी यूपी के गोरखपुर जिले से आते हैं और 1991 से सात बार महाराजगंज का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. इसके बावजूद उन्होंने शुरुआती दौरों में ब्रज और पश्चिम यूपी को प्राथमिकता दी. राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह संतुलन साधने की कोशिश है ताकि यह संदेश न जाए कि नया प्रदेश अध्यक्ष सिर्फ अपने क्षेत्र तक सीमित रहेगा. 

कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के तहत कानपुर में होने वाली बैठक पर भी सबकी नजर है. इस क्षेत्र में 17 जिले, 52 विधानसभा सीटें और 10 लोकसभा सीटें हैं. कभी यूपी की औद्योगिक राजधानी रहा कानपुर आज रोजगार, कानून-व्यवस्था और कृषि संकट जैसे मुद्दों से जूझ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में एंटी-इनकंबेंसी का इतिहास रहा है और विपक्ष अक्सर इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश करता है. 

कुल मिलाकर, पंकज चौधरी की एक महीने की सक्रियता यह दिखाती है कि BJP 2024 की हार को महज एक चुनावी झटका मानकर भूलने के मूड में नहीं है. दलितों तक पहुंच, ओबीसी संतुलन, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक मजबूती, इन चारों मोर्चों पर एक साथ काम करने की कोशिश हो रही है. दिवाकर सेठ जैसे पुराने दलित नेताओं से मुलाकात से लेकर अयोध्या, मथुरा और मेरठ जैसे प्रतीकात्मक और रणनीतिक केंद्रों में बैठकों तक, हर कदम के पीछे एक राजनीतिक संदेश छिपा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाले पंचायत चुनावों और जमीनी फीडबैक से साफ होगा.

Read more!