क्या है 'यक्ष’ ऐप जिसके दम पर यूपी पुलिस हर अपराधी की रियल टाइम निगरानी का दावा कर रही?

यक्ष (YAKSH) ऐप के जरिए यूपी पुलिस AI का इस्तेमाल कर अपराधियों की पहचान, निगरानी और रोकथाम को रियल-टाइम, ज्यादा सटीक और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव कर रही है

योगी आदित्यनाथ यक्ष ऐप लॉन्च करते हुए
योगी आदित्यनाथ यक्ष ऐप लॉन्च करते हुए

27 दिसंबर को लखनऊ स्थित यूपी पुलिस मुख्यालय में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यक्ष (YAKSH) ऐप का लोकार्पण किया, तो यह सिर्फ एक और पुलिस ऐप का लॉन्च नहीं था. यह संकेत था कि उत्तर प्रदेश पुलिस अब अपराध से लड़ने के पारंपरिक तरीकों से आगे निकलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम पर दांव लगाने जा रही है. 

प्रेजेंटेशन खत्म होते-होते कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी हैरान थे, क्योंकि पहली बार अपराधियों की निगरानी केवल फाइलों, मुखबिरों और मैनुअल रिकॉर्ड पर नहीं, बल्कि AI, डेटा एनालिटिक्स, फेस और वॉइस रिकग्निशन के सहारे होने वाली थी. 

यक्ष ऐप को समझने के लिए पहले यूपी की अपराध संरचना को समझना जरूरी है. प्रदेश में 75 जिले, हजारों थाने और लाखों नामचीन, सक्रिय और संभावित अपराधी हैं. माफिया, गैंगस्टर, हिस्ट्रीशीटर, जिला बदर अपराधी, वांटेड और सजायाफ्ता अपराधियों की निगरानी लंबे समय से पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती रही है. इसी गैप को भरने के लिए यक्ष ऐप को एक “सेंट्रल इंटेलिजेंट प्लेटफॉर्म” के तौर पर डिजाइन किया गया है. इस तरह पूरे देश में यह अपनी तरह का अनोखा प्रयोग है. 

बीट सिपाही से AI तक

यक्ष ऐप की रीढ़ है “बीट के अपराधी की जिम्मेदारी बीट सिपाही के नाम” का सिद्धांत. फर्क बस इतना है कि अब बीट सिपाही की रिपोर्टिंग कागज पर नहीं, बल्कि रियल-टाइम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी. बीट कर्मचारी हर अपराधी का सत्यापन उसके निवास स्थान पर जाकर करेगा. वह न सिर्फ पता और मौजूदगी की पुष्टि करेगा, बल्कि परिवार, पड़ोसियों और गांव या मोहल्ले के लोगों से बातचीत कर व्यवहार, गतिविधियों और मूवमेंट की जानकारी भी ऐप में फीड करेगा. 

यह डेटा सिर्फ स्टोर नहीं होता, बल्कि AI के जरिए विश्लेषित होता है. अगर कोई अपराधी अचानक अपने तय निवास स्थान से गायब होता है और बीट कर्मचारी यह अपडेट करता है, तो जिस इलाके में वह पहुंचता है, वहां के संबंधित थाने और बीट कर्मचारी को तुरंत अलर्ट मिल जाता है. यानी अपराधी की लोकेशन बदलते ही पुलिस की नजर भी शिफ्ट हो जाती है.

कलर कोडिंग और अपराध स्कोर

यक्ष ऐप की एक अहम विशेषता है अभियुक्तों की श्रेणीवार कलर कोडिंग. AI अपराध की प्रकृति, उसकी संवेदनशीलता, समय, इस्तेमाल किए गए हथियार और अपराधी के पिछले रिकॉर्ड के आधार पर एक “क्राइम स्कोर” तय करता है. इसी स्कोर के आधार पर अपराधियों को अलग-अलग कैटेगरी में बांटा जाता है. इसका सीधा फायदा यह है कि पुलिस को यह तय करने में आसानी होती है कि किस अपराधी पर ज्यादा नजर रखनी है और किस पर सामान्य निगरानी पर्याप्त है. 

उदाहरण के तौर पर, अगर किसी जिले में किसी जघन्य या सनसनीखेज वारदात की सूचना मिलती है, तो पुलिस को अब शून्य से जांच शुरू नहीं करनी होगी. यक्ष ऐप के डाटाबेस से AI तुरंत संभावित अपराधियों की सूची, उनकी हालिया लोकेशन और गैंग कनेक्शन सामने रख देगा. इससे शुरुआती घंटों में ही जांच की दिशा तय हो सकती है, जो अक्सर सबसे निर्णायक समय होता है.

गैंग नेटवर्क की डिजिटल तस्वीर

यूपी पुलिस के लिए गैंग अपराध हमेशा से सिरदर्द रहे हैं. पहले एक-एक FIR खंगालकर यह समझना पड़ता था कि कौन किसके साथ मिलकर अपराध करता है. यक्ष ऐप इस मेहनत को AI से बदल देता है. ऐप CCTNS पर दर्ज मामलों, चार्जशीट और अभियुक्तों के आपसी संबंधों का विश्लेषण कर उन अपराधियों को एक ही स्थान पर “गैंग” के रूप में प्रस्तुत करता है, जो मिलकर वारदात करते हैं. इससे गैंग लीडर, सक्रिय सदस्य और सपोर्ट सिस्टम साफ दिखने लगता है. नतीजा यह कि कार्रवाई सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे नेटवर्क पर हो सकती है. यही वजह है कि टॉप-10 अपराधियों के चयन की प्रक्रिया भी ज्यादा वैज्ञानिक और प्रभावी हो पाई है. 

फेशियल रिकग्निशन : नाम बदला, चेहरा नहीं

यक्ष ऐप में AI आधारित फेशियल रिकग्निशन तकनीक को एक गेमचेंजर माना जा रहा है. सत्यापन या जांच के दौरान पुलिस अधिकारी संदिग्ध व्यक्ति की तस्वीर सीधे ऐप से कैप्चर कर सकते हैं. यह तस्वीर रियल-टाइम में आपराधिक डाटाबेस से मैच होती है. नाम बदले हों, फर्जी पहचान हो या फरारी की कोशिश, चेहरे के मिलान से पुराने रिकॉर्ड सामने आ जाते हैं. 

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, अब तक कई मामलों में अपराधी सिर्फ नाम और पता बदलकर सिस्टम को चकमा दे देते थे. फेशियल रिकग्निशन उस खामी को काफी हद तक खत्म कर देता है. सबसे अहम बात यह है कि रिजल्ट तुरंत मिलता है, जिससे मौके पर ही फैसला लिया जा सकता है.

वॉइस सर्च: आवाज भी अब सबूत

यक्ष ऐप की सबसे चर्चित और नई पहल है AI आधारित वॉइस सर्च और स्पीकर आइडेंटिफिकेशन. गिरफ्तारी के समय अभियुक्त का वॉइस सैंपल लिया जाता है और उसे एक केंद्रीकृत डाटाबेस में स्टोर किया जाता है. भविष्य में किसी भी ऑडियो क्लिप, धमकी भरे कॉल या रिकॉर्डेड बातचीत को इस डाटाबेस से मिलाया जा सकता है. यह तकनीक भाषा या उच्चारण से प्रभावित नहीं होती. यानी चाहे अपराधी बोली बदले या भाषा, AI यह पहचानने में सक्षम है कि आवाज किसकी है. पुलिस अधिकारियों का दावा है कि यह भारत में अपनी तरह की पहली पहल है, जो जांच को पूरी तरह नया आयाम देती है.

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