मुंबई को बाढ़ से बचाने वाले ‘सॉल्ट पैन’ इलाके बार-बार खतरे में क्यों पड़ जाते हैं?
केंद्र सरकार ने हाल ही में मुंबई में धारावी पुनर्विकास परियोजना के लिए 256 एकड़ 'सॉल्ट पैन' भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी है, जिस पर पर्यावरणविद सवाल उठा रहे हैं

इस महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने एक फैसला लिया, जिसके तहत मुंबई में धारावी पुनर्विकास परियोजना प्राइवेट लिमिटेड (डीआरपीपीएल) को 256 एकड़ 'सॉल्ट पैन' भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी गई. अदाणी रियल्टी ग्रुप और महाराष्ट्र सरकार की इस संयुक्त परियोजना का उद्देश्य झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के लिए किराए का आवास उपलब्ध कराना है. लेकिन अब केंद्र सरकार के इस फैसले पर विवाद शुरू हो गया है.
विपक्षी नेता से लेकर पर्यावरणविद् इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है कि "अदाणी को लाभ पहुंचाने" के लिए लिया गया यह निर्णय सॉल्ट पैन जैसे संवेदनशील ईकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाएगा. शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने तो यहां तक कहा कि राज्य सरकार, मुंबई को एक व्यवसायी के हाथों "बेच" रही है. ऐसे में ये पूरा माजरा क्या है और देश की वित्तीय राजधानी के लिए सॉल्ट पैन भूमि इतनी "महत्वपूर्ण" क्यों हैं, आइए समझते हैं.
क्या है सॉल्ट पैन भूमि?
तटीय शहर मुंबई में सॉल्ट पैन भूमि उन निचले इलाकों की जमीनें हैं जहां एक खास समय में समुद्री पानी बहता है और अपने पीछे नमक और अन्य खनिजें छोड़ जाता है. ये सॉल्ट पैन मुंबई को बाढ़ से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं. ये मॉनसून में बारिश के पानी के स्टोरेज की तरह काम करते हैं और शुष्क मौसम में सूखकर नमक का मैदान बन जाते हैं.
एक तटीय शहर होने की वजह से मुंबई को अक्सर ऊंची लहरों का सामना करना पड़ता है. यह खारा पानी तट के आस-पास के इलाकों में फैलता है. इसे ऐसे समझें कि गंगा नदी में जब पानी लबालब भर जाता है तो वो ओवरफ्लो होकर अपने आस-पास बहता है, जिससे एक उर्वर भूमि तैयार होती है. लेकिन समुद्र तटीय शहरों में जब खारा पानी ओवरफ्लो होकर आस-पास के इलाकों में फैलता है, तो इससे सॉल्ट पैन भूमि तैयार होती है.
इसी सॉल्ट पैन भूमि से बड़े पैमाने पर नमक भी तैयार होता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि ये मुंबई के मैंग्रोव (तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले पेड़ों और झाड़ियों का एक समूह) के साथ मिलकर शहर को बाढ़ से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कोस्टल रेगुलेशन जोन (सीआरजेड) नोटिफिकेशन, 2011 के मुताबिक पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील ये सॉल्ट पैन इलाके सीआरजेड-1बी श्रेणी के तहत आते हैं, यानी यहां नमक प्राप्त करने और प्राकृतिक गैस अन्वेषण के अलावा किसी भी आर्थिक गतिविधि को अंजाम नहीं दिया जा सकता.
मुंबई में कुल 5,378 एकड़ भूमि को सॉल्ट पैन इलाके के रूप में चिह्नित किया गया है. यह दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक धारावी के आकार से करीब नौ गुना बड़ा है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने अपनी 2014 की एक स्टडी में पाया कि इस भूमि का करीब 31 फीसद हिस्सा आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों में स्थित है, और करीब 480 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण किया गया है. इसी अध्ययन में यह भी कहा गया कि मुंबई की कुल सॉल्ट भूमियों में से करीब 1,672 एकड़ भूमि "विकास योग्य" है, यानी इन पर निर्माण संबंधी कार्य किए जा सकते हैं.
डीआरपीपीएल प्रोजेक्ट और विरोध के स्वर
धारावी पुनर्विकास परियोजना प्राइवेट लिमिटेड या डीआरपीपीएल, अदाणी रियल्टी ग्रुप और महाराष्ट्र सरकार की एक संयुक्त परियोजना है. इसका लक्ष्य 2.5 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में रहने वाले 6.5 लाख निवासियों को घर देना है. स्क्रॉल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस सॉल्ट भूमि का इस्तेमाल धारावी के उन निवासियों को किराये के आवास प्रदान करने के लिए किया जाएगा, जो निःशुल्क घर पाने के लिए "अपात्र" हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, वे अपात्र इसलिए हैं क्योंकि वे ऐसे मकानों में रह रहे हैं, जो लाभार्थियों के लिए निर्धारित कट-ऑफ वर्ष 2000 के बाद बनाए गए थे.
लेकिन विपक्षी नेताओं सहित कई पर्यावरणविद् इस प्रोजेक्ट से चिंता जता रहे हैं. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नेता आदित्य ठाकरे ने कहा कि सॉल्ट पैन भूमि पर कंस्ट्रक्शन का काम मुंबई को बर्बाद कर देगा. पर्यावरण संबंधी चिंता के अलावा विपक्ष ने दावा किया है कि मोदी सरकार अदाणी समूह के लाभ के लिए कुछ भी कर सकती है. धारावी से चार बार विधायक रह चुकीं और वर्तमान में मुंबई उत्तर-मध्य से सांसद वर्षा गायकवाड़ ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "मुंबई का भविष्य सरकार के पसंदीदा कॉरपोरेट समूह को दे दिया है."
पर्यावरणविदों का क्या है कहना?
स्क्रॉल से बात करते हुए पर्यावरणविद् और कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी देबी गोयनका ने कहा कि ये सॉल्ट वेटलैंड और मैंग्रोव एक-दूसरे से जुड़े ईकोसिस्टम का हिस्सा हैं जो जलभराव की समस्या से ग्रस्त मुंबई को बाढ़ के खिलाफ एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं. उन्होंने कहा कि सॉल्ट पैन की ही बदौलत जुलाई 2005 की बाढ़ के दौरान पश्चिमी उपनगरों की तुलना में पूर्वी उपनगरों में कम तबाही मची थी. तब एक ही दिन में करीब 944 मिमी बारिश हुई थी जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई थी और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा था.
एक दूसरे पर्यावरणविद् और एनजीओ वनशक्ति के निदेशक स्टालिन डी. ने भी गोयनका से सहमति जताते हुए कहा कि सॉल्ट पैन पर कंस्ट्रक्शन का काम करने से मुंबई के पूर्वी उपनगरों में बाढ़ आ सकती है. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में स्टालिन ने कहा, "ये सॉल्ट पैन निचले इलाकों में स्थित हैं और भारी बारिश के दौरान पानी यहां जमा हो जाता है. यहां उच्च ज्वार के दौरान ठाणे खाड़ी से भी पानी बहता है और इन इलाकों में इकट्ठा हो जाता है. इससे मुंबई के पूर्वी उपनगरों में बाढ़ से बचाव होता है. अगर कंस्ट्रक्शन के कारण इन सॉल्ट पैन इलाकों को ढक दिया जाता है, तो भारी बारिश के दौरान विक्रोली, कांजुरमार्ग और भांडुप जैसे इलाके निश्चित रूप से पानी में डूब जाएंगे."
देबी गोयनका इन निचली भूमियों में ट्रांसफर किए जाने वाले झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाते हैं. उनके मुताबिक, "हर साल डूबते रहने वाले इलाके में उनके जीवन की गुणवत्ता कैसी होगी? यह किफायती आवास कैसे है? भूमि को भरने, नींव बनाने, जंग और पानी से बचाव की लागत वास्तव में इस भूमि को रहने लायक बनाने के लिए इस प्रोजेक्ट को काफी महंगा बनाती है."
पहले भी हुईं हैं साल्ट पैन पर कंस्ट्रक्शन की अनुमति देने की कोशिशें
मुंबई में सॉल्ट पैन पर कंस्ट्रक्शन की अनुमति देने के प्रयासों का लंबा इतिहास रहा है. 1995 में जब महाराष्ट्र में शिवसेना सत्ता में आई, तो उसकी सरकार ने स्लम रिहैबिलिटेशन स्कीम शुरू की, जिसके तहत निजी कंपनियों को स्लम रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट में शामिल होने की अनुमति दी गई. प्रोत्साहन के तौर पर, इन कंपनियों को अतिरिक्त फ्लोर स्पेस इंडेक्स दिया गया, जिसका इस्तेमाल अन्य निर्माण परियोजनाओं में किया जा सकता था.
इसके बाद 2007 में, कांग्रेस सरकार ने परियोजना प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए 2,177 हेक्टेयर सॉल्ट पैन की भूमि आवंटित करने के लिए केंद्र को एक प्रतिवेदन सौंपा था. 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) योजना के तहत झुग्गियों को स्थानांतरित करने के लिए मुलुंड में ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के किनारे 400 एकड़ सॉल्ट पैन भूमि पर फोकस किया. राज्य सरकार ने किफायती आवास के लिए शेष 5,000 एकड़ सॉल्ट पैन भूमि का भी इस्तेमाल करने की योजना बनाई.
हालांकि, 2019 में उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद फडणवीस की योजनाएं स्थगित कर दी गईं. लेकिन ठाकरे सरकार ने भी 2020 में कांजुरमार्ग में 102 एकड़ की सॉल्ट पैन भूमि पर अपनी नज़रें गड़ा दीं, जो आरे की ग्रीन बेल्ट में बनने वाले मेट्रो कार शेड के लिए वैकल्पिक स्थान के रूप में थी. इस पर विकास का काम फिलहाल रुका हुआ है, और मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में लंबित है.
साल 2022 में मौजूदा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने जब शिवसेना से बगावत कर उद्धव को सत्ता से बाहर कर दिया और फडणवीस एक बार फिर सरकार में आए, तो महायुति सरकार ने वडाला सॉल्ट पैन की जमीन पर डीआरपीपीएल के तहत धारावी झुग्गीवासियों के लिए किफायती आवास बनाने का प्रस्ताव रखा. इसी प्रस्ताव के तहत केंद्र ने इस महीने की शुरुआत में 256 एकड़ 'सॉल्ट पैन' भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी.