पश्चिम बंगाल की रिजर्व सीटों पर वोटरों की संख्या में कटौती कैसे BJP की मुश्किल बढ़ा रही?

पश्चिम बंगाल में SC/ST के लिए आरक्षित 84 सीटों पर TMC और BJP के बीच कड़ी टक्कर है, इसलिए इनके मतदाता आधार में कोई भी बदलाव चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकता है

SIR को लेकर पश्चिंम बंगाल में सियासी गहमा-गहमी (सांकेतिक तस्वीर)
UNDER THE SCANNER: Election officials in Kolkata working on the SIR list, Dec. 27. (Photo: ANI)

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है. अब सवाल यह उठ रहा है कि 294 निर्वाचन क्षेत्रों में से कौन-कौन सी सीटें मतदाताओं के नाम हटाए जाने से सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं?

इसकी जांच-पड़ताल से यह दिलचस्प जानकारी सामने निकलकर आती है कि राज्य की 84 आरक्षित विधानसभा सीटों (68 अनुसूचित जाति और 16 अनुसूचित जनजाति के लिए) पर बड़े बदलाव दिख सकते हैं.

इन सीटों पर SIR के बाद हटाए गए नामों की संख्या में काफी अंतर है. ज्यादातर नाम उन सीटों से हटाए गए हैं, जहां 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP को जीत मिली थीं.

इन सभी 84 रिजर्व सीटों पर SIR प्रक्रिया के दौरान 187,000 से अधिक नाम हटा दिए गए हैं. इन हटाए गए नामों का वितरण राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए कुल नामों में से करीब 132,800 नाम उन सीटों से हटाए गए हैं, जिन पर BJP ने 2021 में जीत हासिल की थी.

इसके उलट, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने जिन रिजर्व सीटों को जीता था उनमें से केवल 54,600 नाम हटाए गए हैं. इसका अर्थ साफ है कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए सभी नामों में से करीब 70 फीसद नाम BJP की जीती हुई सीटों से हटाए गए हैं, भले ही आंकड़ों में इन सीटों की संख्या कम हो.

जब हर एक निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर औसत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की संख्या का विश्लेषण किया जाता है, तो आंकड़ों का यह असंतुलन और भी स्पष्ट हो जाता है. BJP की जीती हुई रिजर्व सीटों से औसतन करीब 3,400 नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं. इसके विपरीत, TMC के कब्जे वाली आरक्षित सीटों के लिए यह औसत 1,200 से थोड़ा अधिक है. दूसरे शब्दों में, इस श्रेणी में BJP की एक सीट से TMC की एक सीट की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक नाम हटाए गए हैं.

ये आंकड़े मतदाता सूची में संशोधन के संभावित परिणामों पर सवाल खड़े करते हैं. बंगाल के चुनावी परिदृश्य में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की अहम भूमिका है. 2021 के चुनाव में इन निर्वाचन क्षेत्रों में दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था. अनुसूचित जनजाति की 16 सीटों में से TMC ने 9 और BJP ने 7 सीटें जीतीं. अनुसूचित जाति की 68 सीटों में से TMC ने 36 और BJP ने 32 सीटें जीतीं. ऐसे में मतदाता सूचियों में किसी भी बड़े बदलाव से करीबी मुकाबले वाले क्षेत्रों में चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकता है.

आंकड़े बताते हैं कि कुछ खास निर्वाचन क्षेत्रों में ज्यादा संख्या में मतदाता सूची से नाम हटाए गए हैं. सबसे बड़ा मामला बागदा का है, जो अनुसूचित जाति की सीट है. 2021 में इस सीट पर BJP को जीत मिली थी. SIR के बाद जारी मतदाता सूची देखने से पता चलता है कि यहां 15,303 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. यह संख्या चौंकाने वाली है. यह दूसरे सबसे अधिक नाम हटाए गए निर्वाचन क्षेत्र की संख्या से लगभग दोगुनी है और राज्य के औसत से बहुत अधिक है.

इसी तरह BJP की जीत वाली एक अन्य सीट कल्याणी अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है. यहां 9,037 लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं. मतिगारा नक्सलबाड़ी में 8,383 नाम हटाए गए, जबकि बोंगांव उत्तर में 7,926 नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं.

वहीं, राणाघाट दक्षिण में 7,126 और बोंगांव दक्षिण में 6,902 मतदाताओं के नाम हटाए गए. मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने वाले शीर्ष 20 निर्वाचन क्षेत्रों का एक साथ विश्लेषण करने पर यह पैटर्न और भी साफ हो जाता है कि इन 20 सीटों में से चौदह सीटें पिछले विधानसभा चुनाव में BJP ने जीती थीं. TMC ने इनमें से केवल छह सीटें जीती थीं. TMC की जीती हुई कैनिंग पश्चिम में 4,913 लोगों के नाम हटाए गए. इसके अलावा, राजगंज में 3,876, बालागढ़ में 3,832, जलपाईगुड़ी में 3,739, संदेशखाली में 3,303 और स्वरूपनगर में 2,924 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं.

इन आंकड़ों से साफ है कि BJP की कुछ सीटों पर रद्द की गई मतदाताओं की संख्या राज्य की अन्य अधिकांश सीटों की तुलना में कई हजार ज्यादा है. अकेले बागदा में ही कई छोटी सीटों के कुल योग से भी अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं.  

इसके परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. आरक्षित सीटों पर अक्सर कांटे की टक्कर होती है. जिन निर्वाचन क्षेत्रों में अब बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, वहां पिछले चुनाव में जीत का अंतर बहुत कम था. ऐसे में साफ है कि मतदाताओं की संख्या में मामूली बदलाव भी आगामी चुनाव में परिणाम को प्रभावित कर सकता है.

यही कारण है कि TMC ने सूची जारी होने के बाद एक व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू किया है. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने हाल ही में 'तफशिलिर संगलाप' अभियान का शुभारंभ किया है, जिसका उद्देश्य सभी 84 आरक्षित सीटों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से सीधे संपर्क स्थापित करना है. इस कार्यक्रम का लक्ष्य मतदाताओं के साथ संवाद स्थापित करना और स्थानीय शिकायतों, कल्याणकारी योजनाओं को लेकर लोगों की राय लेना है. साथ ही राज्य की राजनीति पर लोगों की चिंताओं और उनकी प्रतिक्रिया को जानना है.

चुनाव प्रचार का समय राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. मतदाता सूचियों में बदलाव और कई निर्वाचन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद इसकी अहमियत और ज्यादा बढ़ जाती है. यही कारण है कि TMC नेतृत्व चुनाव से पहले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उत्सुक दिख रहा है. पार्टी नेताओं ने संकेत दिया है कि इस अभियान में संगठनात्मक नेटवर्क को मजबूत करने और जमीनी स्तर के समुदायों से जुड़ने के लिए बैठकें आयोजित करेंगी.

TMC के लिए यह दांव काफी अहम है. हालांकि आरक्षित सीटों पर TMC को फिलहाल मामूली बढ़त हासिल है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की भागीदारी या लामबंदी में किसी भी बदलाव का विधानसभा में सत्ता के संतुलन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है.

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