छत्तीसगढ़ का वेदांता हादसा : 16 साल, दो धमाके और 62 मौतें; क्या अब भी अधूरा रहेगा न्याय?

वेदांता के हालिया हादसे की तरह ही कोरबा में 23 सितंबर 2009 को एक निर्माणाधीन चिमनी गिरने से 45 लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे. इनके मुआवजे की कानूनी लड़ाई आज तक जारी है

The blast occurred at around 2:30 at the Vedanta power plant in Singhitarai on Tuesday.
वेदांता पावर प्लांट में ब्लास्ट

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में काम कर रहे मजदूरों के लिए 14 अप्रैल का दिन दर्द, जख्म और कुछ के लिए सब कुछ खो देने वाला रहा. यहां बॉयलर ट्यूब ब्लास्ट होने की वजह से 17 मजदूरों की मौत हो गई. 30 से अधिक मजदूर अब भी गंभीर रूप से घायल हैं. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, उस दिन दोपहर को सिंगीतराई गांव में स्थित वेदांता लिमिटेड के पावर प्लांट के एक बॉयलर ट्यूब में अचानक जोरदार धमाका हुआ.

धमाका इतना भयंकर था कि चार मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अन्य घायल मजदूरों ने अस्पताल ले जाते समय या इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. यह खबर सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि कई घरों के उजड़ जाने की कहानी बन गई है. बड़ी संख्या में मजदूर जीवन और मौत के बीच जूझ रहे हैं. किसी की सांस मौके पर ही थम गई, तो किसी ने अस्पताल के बिस्तर पर दर्द से जूझते हुए दम तोड़ दिया.

हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य

इस हादसे ने सिर्फ जानें ही नहीं लीं, बल्कि कई लोगों को बुरी तरह झुलसा दिया. कुल 36 लोग आग की चपेट में आए, जिनमें से 18 अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं. कुछ मजदूरों के शरीर 90 प्रतिशत से ज्यादा तक जल चुके हैं और हर सांस उनके लिए एक लड़ाई बन चुकी है. मरने वालों में पश्चिम बंगाल के 5, छत्तीसगढ़ के 4, उत्तर प्रदेश के 3, झारखंड के 3 और बिहार के दो मजदूर शामिल हैं. जिले के पुलिस अधीक्षक प्रफुल्ल ठाकुर ने मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया है.

राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए पांच लाख रुपए और घायलों के समुचित इलाज के अलावा सहायता के तौर पर 50 हजार रुपए देने की घोषणा की है. साथ ही पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है. वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भी इस पर पीड़ा व्यक्त की है. उन्होंने कहा, "छत्तीसगढ़ के सिंगीतराई प्लांट में हुए दुखद हादसे से गहरा दुख हुआ है. इस हादसे से प्रभावित हर व्यक्ति मेरा परिवार है. आपके आंसू मेरे हैं, आपका दर्द मेरा है. हमारा पूरा सहयोग है और हम हर तरह से आपके साथ हैं. मामले की पूरी जांच कराई जाएगी."

कंपनी ने विस्फोट में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए 35 लाख रुपए मुआवजा और रोजगार सहायता देने की घोषणा की. साथ ही घायलों के लिए 15 लाख रुपए सहायता राशि देने का ऐलान किया. कंपनी ने कहा, “हम प्रभावित परिवारों के साथ मजबूती से खड़े हैं और मृतकों के परिवारों को 35 लाख रुपए तथा रोजगार सहायता देंगे. घायलों को 15 लाख रुपए दिए जाएंगे. साथ ही उनके स्वस्थ होने तक वेतन जारी रहेगा और काउंसलिंग सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी.”

वेदांता ने मारे गए लोगों के परिजनों को 35 लाख और घायलों को 15 लाख रुपए मुआवजे का ऐलान किया है

लेकिन असल सवाल यह है कि तात्कालिक मुआवजे और प्रतिक्रिया से इतर क्या कंपनी या राज्य सरकार मजदूरों के हित में कड़े फैसले ले पाएगी? क्या जीवन खोने की कीमत मात्र 5 से 7 लाख रुपए ही आंकी जाएगी?

पहले भी आश्वासन ही मिला है

वेदांता के प्लांट में इस तरह के हादसे पहली बार नहीं हुए हैं. छत्तीसगढ़ के ही कोरबा जिले में 23 सितंबर 2009 को बालको के कैप्टिव पावर प्लांट में निर्माणाधीन 240 मीटर (करीब 790 फीट) ऊंची चिमनी अचानक ढह गई थी. हादसे के समय तेज आंधी-तूफान और बारिश से बचने के लिए 100 से ज्यादा मजदूरों ने उसके आसपास शरण ली थी.

चिमनी गिरने से मजदूर मलबे में दब गए थे, जिसमें 45 मजदूरों की मौत हो गई थी और 50 से अधिक घायल हुए थे. उस वक्त भी तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने हादसे की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे और मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रुपए की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि फैक्ट्री प्रबंधन और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा.

मामला दर्ज तो हुआ, लेकिन बीते 16 साल से मुआवजे और न्याय की लड़ाई कोर्ट में चल रही है. इस लड़ाई की स्थिति को समझिए; विशेष न्यायाधीश जयदीप गर्ग ने फरवरी 2025 में सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपी कंपनियों के चेयरमैन, मैनेजिंग डायरेक्टर, जनरल मैनेजर और सीईओ स्तर के अधिकारी भी मामले में जिम्मेदार हो सकते हैं. हालांकि, अब तक उनके नाम और पते उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें आरोपी नहीं बनाया जा सका है.

अब जाकर विशेष अदालत ने भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO), चीनी कंपनी SEPCO, गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड (GDCL), ब्यूरो वेरिटास इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (BVIL) और डेवलपमेंट कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड (DCPL) के शीर्ष अधिकारियों को इस मामले में आरोपी के तौर पर शामिल करने का निर्देश दिया है. इसमें चीनी कंपनी SEPCO के अधिकारी तो बीमारी का बहाना बनाकर अपने देश भी लौट चुके हैं. बीते 13 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान कंपनी के अधिकारी कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए. बता दें कि बालको पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी थी, जिसे 2001 में विनिवेश नीति के तहत स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (वेदांता समूह) ने अपने नियंत्रण में ले लिया था.

अन्य राज्यों में भी होते रहे हैं हादसे

28 अगस्त 2017 को ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले में वेदांता स्टील प्लांट में बारिश के बाद फ्लाई ऐश तालाब की दीवार पूरी तरह ढह गई थी. इसके कारण धातु-प्रदूषित कचरा बहकर लगभग 100 एकड़ अत्यधिक उपजाऊ कृषि भूमि में फैल गया. कंपनी ने वादा किया था कि वह किसानों की जमीन को फिर से पुरानी स्थिति में ले आएगी, लेकिन विडंबना देखिए कि उसी साल लंदन में हुई वेदांता की वार्षिक आम बैठक (AGM) में तत्कालीन सीईओ अल्बनीज़ और कार्यकारी चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने गर्व से ओडिशा की सड़कों के निर्माण में फ्लाई ऐश के उपयोग का जिक्र किया था.

इसके अलावा साल 2018 में तमिलनाडु के थुतुकुडी स्थित वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट कॉपर यूनिट को स्थाई रूप से बंद करने को लेकर 20 गांवों के लोग लगातार आंदोलन कर रहे थे. 22 और 23 मई को आंदोलन के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई. इसी कंपनी पर साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण फैलाने का दोषी पाते हुए 100 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था.

अपने वित्त वर्ष 2020 की वार्षिक रिपोर्ट में वेदांता ने स्वीकार किया था कि सुरक्षा से जुड़े हादसों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. केवल उसी वर्ष काम से जुड़ी दुर्घटनाओं में कंपनी ने अपने सात सहकर्मियों को खो दिया. कंपनी ने यह भी बताया कि इन घटनाओं में 70 प्रतिशत मामले दोहराए गए हादसे यानी एक ही पैटर्न के थे, जबकि 90 प्रतिशत से अधिक घटनाओं का असर उसके बिजनेस पार्टनर्स और ठेकेदारों पर पड़ा.

इस स्वीकारोक्ति के बाद भी 28 सितंबर 2021 को झारखंड के बोकारो स्थित वेदांता लिमिटेड के इलेक्ट्रोस्टील प्लांट में ऊंचाई से गिरने के कारण तीन मजदूरों- शाहनवाज आलम, मोहम्मद ओसामा और मोहम्मद सुल्तान की मौके पर ही मौत हो गई. यह हादसा उस समय हुआ जब वे प्लांट की बंद ब्लास्ट फर्नेस में मरम्मत कार्य कर रहे थे.

इन घटनाओं की स्वीकारोक्ति के साथ मजदूर यह उम्मीद करते हैं कि जिस जगह वे काम करें, वहां कम से कम मौत का खतरा न हो. सवाल अब भी वही है कि हालिया घटना में मृतकों के परिजनों और घायल मजदूरों को कब तक उचित मुआवजा मिल पाएगा?

Read more!