नोटिस, सर्वे और दावे सब बेअसर; यूपी के अलीगंज हादसे ने खोली सिस्टम की पोल

राजधानी लखनऊ में अलीगंज अग्निकांड ने फिर खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल, सर्वे और नोटिसों के बावजूद नहीं सुधरे हालात. अवैध निर्माण, कमजोर निगरानी और जवाबदेही के अभाव से बढ़ रहा खतरा

Fire personnel conduct a dousing operation after fire broke out at a commercial building in Aliganj, Lucknow
फायर ब्रिगेट के कर्मचारी अलीगंज में लगी आग बुझाते हुए

लखनऊ में अलीगंज के पुरनिया इलाके में 22 जून को तिमंजिला बिल्डिंग में लगी आग की तस्वीरें पूरे दिन लोगों के मोबाइल फोन और टीवी स्क्रीन पर घूमती रहीं. धुएं से भरी इमारत, खिड़कियों के पास खड़े मदद का इंतजार करते लोग, नीचे जमा भीड़, मौके पर पहुंची दमकल की गाड़ियां और राहत-बचाव अभियान. कई घंटों में बड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया, लेकिन 15 मौतों के बाद जो सवाल उठे, वे नए नहीं थे.

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में हुए बड़े अग्निकांडों की सूची बहुत लंबी है. कानपुर के चमनगंज में जूता फैक्ट्री में शॉर्ट सर्किट से लगी आग में पांच लोगों की मौत हो गई. गल्लामंडी में लगी आग से सैकड़ों दुकानें और वाहन जल गए. पुराने कानपुर में आग लगने से व्यापारियों की जान चली गई. आगरा की 14 मंजिला इमारत में भीषण आग लगी. लखनऊ के विकास नगर में दो सौ से अधिक झुग्गियां जल गईं.

लखनऊ के लेवाना होटल की त्रासदी अभी भी लोगों के जेहन में ताजा है. हर घटना के बाद जांच हुई. रिपोर्ट तैयार हुई. सिफारिशें बनीं. लेकिन यदि उन सिफारिशों को लागू किया गया होता तो एक जैसी घटनाएं बार-बार सामने नहीं आतीं. लखनऊ में अलीगंज की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर उत्तर प्रदेश आग की घटनाओं से सबक क्यों नहीं सीख पा रहा है? क्यों हर बार चेतावनी को नजरअंदाज किया जाता है? क्यों हर अग्निकांड के बाद वही खामियां फिर सामने आती हैं? और आखिर क्यों लोगों की जान जाने के बाद ही व्यवस्था की नींद टूटती है?

जिस भवन को घर होना था, वह कमर्शियल कॉम्प्लेक्स कैसे बन गया?

अलीगंज के जिस भवन में आग लगी, उसकी कहानी उत्तर प्रदेश के शहरों में तेजी से फैल चुकी अवैध निर्माण संस्कृति की कहानी है. प्रारंभिक जांच में सामने आया कि जिस भूखंड पर एकल आवासीय भवन का नक्शा स्वीकृत कराया गया था, वहां तीन मंजिला व्यावसायिक परिसर खड़ा हो गया. गेमिंग सेंटर संचालित होने लगा. बड़ी संख्या में लोग वहां आने-जाने लगे. लेकिन भवन की मूल स्वीकृति और वास्तविक उपयोग के बीच का अंतर किसी को दिखाई नहीं दिया या फिर देखने के बावजूद अनदेखा किया गया.

आग लगने के बाद हरकत में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की प्रारंभिक जांच में  सामने आया कि भवन में सेटबैक मानकों का पालन नहीं किया गया था. कवरेज एरिया निर्धारित सीमा से कहीं अधिक था. बेसमेंट का निर्माण नियमों के विपरीत था. पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी. भवन की ऊंचाई भी तय सीमा से अधिक बताई जा रही है. एलडीए के रिकॉर्ड में कई आवश्यक स्वीकृतियों और एनओसी का स्पष्ट विवरण भी उपलब्ध नहीं है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब कैसे हुआ? पूर्व नगर नियोजन रमेश चंद्र बताते हैं, “यह निर्माण रातों-रात नहीं हुआ होगा. महीनों तक निर्माण कार्य चला होगा. इंजीनियरों, अवर अभियंताओं, जोनल अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी में पूरा इलाका आता होगा. फिर भी यदि एक आवासीय भवन व्यावसायिक परिसर में बदल गया तो इसका अर्थ केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि व्यवस्था की गहरी विफलता है.”

सर्वे हुए, खामियां मिलीं, नोटिस गए... फिर क्या हुआ?

उत्तर प्रदेश विद्युत सुरक्षा निदेशालय की जिम्मेदारी राज्य में विद्युत सुरक्षा मानकों को लागू करना है. बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, मॉल, अस्पतालों, मल्टीप्लेक्स और अन्य भवनों की सुरक्षा जांच कर एनओसी जारी करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इसी विभाग के पास है. करीब तीन वर्ष पहले राजधानी में व्यापक सर्वे कराया गया था. सर्वे पूरा होने के बाद पिछले वर्ष लगभग 1070 प्रतिष्ठानों में सुरक्षा संबंधी कमियां पाई गईं. इनमें से 324 प्रतिष्ठानों में गंभीर खामियां थीं. अस्पतालों, नर्सिंग होम, व्यावसायिक भवनों और अन्य प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए गए. उन्हें कमियां दूर करने के निर्देश दिए गए. लेकिन इसके बाद क्या हुआ?- इस अहम सवाल का जवाब आज अलीगंज हादसे के बाद तलाशा जा रहा है.

रमेश चंद्र कहते हैं, “अगर इन नोटिसों का अनुपालन सुनिश्चित कराया गया होता, समय-समय पर दोबारा निरीक्षण किए गए होते, नियमों का पालन न करने वालों पर कठोर कार्रवाई हुई होती, तो संभव है कि अनेक भवनों में सुरक्षा मानक सुधर गए होते.” विद्युत सुरक्षा निदेशालय के निदेशक जीके सिंह का कहना है, "सर्वे के बाद प्रतिष्ठानों को व्यवस्था सुधार के लिए नोटिस जारी किया गया था. नए सिरे से पड़ताल कराई जाएगी." लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं कि जब खतरे पहले से दर्ज थे तो नई पड़ताल की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है?

आग के बाद जागने वाली व्यवस्था

पिछले महीने दिल्ली के एक होटल में आग लगने की घटना के बाद लखनऊ में एलडीए और अग्निशमन विभाग ने संयुक्त अभियान चलाया था. 307 प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया. 81 भवनों में खामियां मिलीं. नोटिस जारी किए गए. लेकिन यह कोई पहला अभियान नहीं था. लेवाना होटल हादसे के बाद भी इसी तरह निरीक्षण हुए थे. होटल व्यवसायी आयुष सिंह बताते हैं, “लखनऊ में बीते वर्षों में एसएसजे इंटरनेशनल और विराट होटल की घटनाओं के बाद भी जांच हुई थी. हर बार कुछ समय तक अधिकारियों की सक्रियता दिखाई देती है. मीडिया में खबरें चलती हैं. फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है.”

पूर्व टाउन प्लानर अमित कुलश्रेष्ठ इस प्रवृत्ति को व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी मानते हैं. उनके अनुसार, "हर बार आग लगने की घटनाओं के बाद नोटिस जारी करने की कार्रवाई केवल जनता के गुस्से को शांत करने के लिए ही की जाती है. बाद में सबसे पहले जैसा ही हो जाता है. बार-बार एक जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति इसकी पुष्टि करती है." उनकी यह टिप्पणी केवल आलोचना नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों का अनुभव है.

लेवाना होटल : एक चेतावनी जिसे भुला दिया गया

सितंबर 2022 में लखनऊ के लेवाना होटल अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था. उस घटना में कई लोगों की मौत हुई थी. जांच में सामने आया कि भवन में कई सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था. आपातकालीन निकास, अग्निशमन व्यवस्था और निर्माण संबंधी कई गंभीर कमियां थीं. उस समय दावा किया गया था कि प्रदेशभर में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा होगी. अवैध निर्माणों के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा. एनओसी प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाएगा. लेकिन अलीगंज की घटना ने दिखा दिया कि उस त्रासदी से बहुत कम सबक लिया गया. कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, “अगर वास्तव में व्यापक सुधार हुए होते तो आज भी राजधानी में ऐसी इमारतें मौजूद नहीं होतीं जिनमें आग लगने पर लोग बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता तक खोजते रह जाएं.”

अधिकांश अग्निकांडों की जांच रिपोर्टों में शॉर्ट सर्किट एक प्रमुख कारण के रूप में सामने आता है फिर भी विद्युत सुरक्षा व्यवस्था सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है. उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा कहते हैं, "आग की अधिकतर घटनाएं बिजली की शॉर्ट सर्किट से हो रही हैं. इसके बाद भी विद्युत सुरक्षा निदेशालय में केवल 46 विद्युत सुरक्षा अधिकारी तैनात हैं. खुद ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि 46 अधिकारी एक सप्ताह के भीतर कैसे सैकड़ों इमारतों की जांच कर एनओसी जारी कर सकते हैं." 75 जिलों वाले राज्य में केवल 46 अधिकारियों की तैनाती बताती है कि सुरक्षा ऑडिट और निरीक्षण की पूरी व्यवस्था कितनी कमजोर है. जब निरीक्षण सीमित होंगे तो जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है.

शमन : अवैध निर्माणों का सुरक्षा कवच

उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माण की समस्या केवल भ्रष्टाचार की कहानी नहीं है बल्कि यह सीधे लोगों की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी 2013 को स्पष्ट कहा था कि मानकों के विपरीत निर्माणों को नियमित करने की व्यवस्था पर प्रभावी रोक लगनी चाहिए. अदालत ने कहा था कि इससे न केवल भवन नियमों का उल्लंघन होता है बल्कि पूरे शहरी ढांचे पर असर पड़ता है. लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है.

लखनऊ, कानपुर, नोएडा, गाजियाबाद, प्रयागराज, वाराणसी और अन्य शहरों में शमन व्यवस्था अवैध निर्माणों के लिए सुरक्षा कवच बन चुकी है. पहले नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किया जाता है. पार्किंग की जगह खत्म कर दी जाती है. सेटबैक निगल लिया जाता है. अतिरिक्त मंजिलें बना दी जाती हैं. बाद में शमन शुल्क देकर निर्माण को वैध कराने की कोशिश की जाती है. इस व्यवस्था ने बिल्डरों और भ्रष्ट अधिकारियों के लिए कमाई का रास्ता खोल दिया है जबकि आम नागरिकों के लिए खतरे बढ़ा दिए हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में समस्या नियमों की कमी नहीं है. नियम पर्याप्त हैं. कानून भी मौजूद हैं. एनओसी प्रणाली भी है. निरीक्षण की व्यवस्था भी है. समस्या जवाबदेही की है. रियल स्टेट रेगुलेटिंग अथारिटी (रेरा) में तैनात रहे एक अधिकारी बताते हैं, “जब अवैध निर्माण करने वाला बिल्डर बच जाता है, निरीक्षण न करने वाला अधिकारी बच जाता है, फर्जी प्रमाणपत्र जारी करने वाला कर्मचारी बच जाता है और नियमों का उल्लंघन करने वाला प्रतिष्ठान चलता रहता है, तब अगली त्रासदी लगभग तय हो जाती है.” अलीगंज हादसे के बाद 16 अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बाद सरकारी अमला एक बार फिर तेजी दिखा रहा है लेकिन यदि कार्रवाई केवल निलंबन या नोटिस तक सीमित रही तो इसका परिणाम भी पहले जैसा ही होगा.

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