होली हो या दीवाली, यूपी में त्योहार कैसे बने अर्थव्यवस्था की रीढ़
मथुरा-वृंदावन की होली से अयोध्या के दीपोत्सव और वाराणसी की देव दीपावली तक बड़े धार्मिक आयोजनों पर बढ़ते पर्यटन और त्योहारों की खरीददारी ने यूपी में 'फेस्टिवल इकोनामी' को नई उड़ान दी है

होली से कुछ दिन पहले मथुरा के होली गेट के आसपास की गलियों में सुबह से ही भीड़ दिखने लगती है. वृंदावन की रंगभरी होली और बरसाना की लठमार होली देखने के लिए देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है.
स्थानीय होटल कारोबारी बताते हैं कि पांच-छह साल पहले तक होली के दौरान होटल और गेस्ट हाउसों की औसत ऑक्यूपेंसी 50–60 प्रतिशत रहती थी, लेकिन अब त्योहार से एक सप्ताह पहले ही अधिकांश होटल पूरी तरह बुक हो जाते हैं.
वृंदावन के एक होटल संचालक रवि शर्मा बताते हैं कि होली के दौरान एक सप्ताह में ही उनकी आय सामान्य महीनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है. वे जानकारी देते हैं, “पहले होली का सीजन सिर्फ तीन-चार दिन का होता था, अब लगभग दो सप्ताह तक पर्यटकों की भीड़ रहती है. इससे होटल, टैक्सी, ई-रिक्शा, गाइड और छोटे दुकानदार सभी को फायदा होता है.” स्थानीय व्यापार मंडल के पदाधिकारियों का कहना है कि होली के दौरान मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में गुलाल, मिठाई, पूजा सामग्री, पारंपरिक कपड़े और धार्मिक स्मृति चिह्नों का कारोबार सैकड़ों करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है.
पर्यटन विभाग के अधिकारियों के अनुसार जनवरी से जून 2025 के बीच ही मथुरा में 3.37 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे, जो इस क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है. अगर यह मान लिया जाए कि एक पर्यटक ने औसतन 1000 रुपए खर्च किए तो छह महीने के भीतर अकेले मथुरा-वृंदावन में कम से कम 3000 करोड़ रुपए का व्यापार हुआ.
मथुरा-वृंदावन की यह तस्वीर दरअसल उत्तर प्रदेश में उभरती एक नई आर्थिक प्रवृत्ति की झलक है, जिसे अब विशेषज्ञ “फेस्टिवल इकॉनमी” के रूप में देख रहे हैं. पिछले लगभग नौ वर्षों में प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का दायरा जिस तरह बढ़ा है, उसने पर्यटन, खुदरा व्यापार और सेवा क्षेत्र को नई गति दी है.
धार्मिक पर्यटन बना आर्थिक इंजन
उत्तर प्रदेश लंबे समय से धार्मिक पर्यटन का केंद्र रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में तेज वृद्धि दर्ज की गई है. राज्य पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2016 में उत्तर प्रदेश में लगभग 21.5 करोड़ पर्यटक आए थे, जबकि 2024 तक यह संख्या बढ़कर करीब 64.90 करोड़ हो गई. यानी आठ वर्षों में पर्यटकों की संख्या में लगभग 43 करोड़ से अधिक की वृद्धि हुई. राष्ट्रीय पर्यटन में भी प्रदेश की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है. 2016 में जहां देश के कुल पर्यटकों में उत्तर प्रदेश का हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत था, वहीं 2023 तक यह बढ़कर करीब 19 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया. 2025 में तो यह वृद्धि और भी तेज दिखाई देती है.
पर्यटन विभाग के अनुसार उस वर्ष प्रदेश में 1.37 अरब (137 करोड़) से अधिक घरेलू पर्यटक पहुंचे, जबकि विदेशी पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. पर्यटन विशेषज्ञ आशुतोष चतुर्वेदी का कहना है कि इन आंकड़ों के पीछे सबसे बड़ा कारण धार्मिक और त्योहार आधारित पर्यटन है. अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज और मथुरा-वृंदावन जैसे शहरों में आयोजित बड़े धार्मिक उत्सव अब लाखों-करोड़ों लोगों को आकर्षित कर रहे हैं.
अयोध्या का दीपोत्सव सबसे बड़ी मिसाल
अयोध्या का दीपोत्सव इस फेस्टिवल इकॉनमी का सबसे चर्चित उदाहरण बन चुका है. 2017 में शुरू हुआ यह आयोजन अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है. पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2017 में अयोध्या में लगभग 1.78 करोड़ पर्यटक आए थे. यह संख्या 2024 तक बढ़कर 16.44 करोड़ हो गई और 2025 में 23.82 करोड़ पर्यटकों तक पहुंच गई. सिर्फ दीपोत्सव के दौरान ही लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में पांच दिन तक चले दीपोत्सव में करीब आठ लाख श्रद्धालु पहुंचे और इस आयोजन से स्थानीय अर्थव्यवस्था में पांच करोड़ रुपए से अधिक का सीधा कारोबार हुआ.
अयोध्या के सर्राफा बाजार के व्यापारी समीर गुप्ता बताते हैं कि दीपोत्सव के दौरान उनकी बिक्री सामान्य दिनों की तुलना में तीन से चार गुना तक बढ़ जाती है. शहर के एक मिठाई कारोबारी श्यामबाबू बताते हैं, “दीपोत्सव से पहले एक सप्ताह में ही उतनी मिठाई बिक जाती है जितनी सामान्य दिनों में पूरे महीने में नहीं बिकती.” एक अध्ययन के अनुसार राम मंदिर के निर्माण के बाद अयोध्या में आर्थिक गतिविधियों में बड़ा उछाल आया है. दुकानदारों की आय पांच गुना तक बढ़ी है और होटल, रेस्टोरेंट तथा परिवहन सेवाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है.
वाराणसी और प्रयागराज : त्योहारों से पर्यटन का विस्तार
वाराणसी और प्रयागराज भी इस फेस्टिवल इकॉनमी के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं. वाराणसी में गंगा घाटों पर होने वाली देव दीपावली और अन्य धार्मिक आयोजनों के कारण पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2025 की पहली तिमाही में ही काशी क्षेत्र में 11.47 करोड़ श्रद्धालु पहुंचे. प्रयागराज का माघ मेला और महाकुंभ जैसे आयोजन तो दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिने जाते हैं. 2025 के महाकुंभ में लगभग 66.96 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान लगाया गया, जिसने पर्यटन और स्थानीय कारोबार को अभूतपूर्व बढ़ावा दिया. अयोध्या के राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर वी. के. श्रीवास्तव बताते हैं “मंदिर दर्शन के दौरान श्रद्धालु भोजन, खरीदारी, परिवहन और स्थानीय सेवाओं पर खर्च करते हैं, जिससे यह पैसा कई स्तरों पर स्थानीय अर्थव्यवस्था में घूमता है.” प्रोफेसर श्रीवास्तव के अनुसार “पर्यटन में खर्च किया गया हर एक रुपया लगभग छह से सात लोगों तक पहुंचता है और स्थानीय रोजगार पैदा करता है.”
बाजारों में बढ़ती बिक्री
त्योहारों का असर प्रदेश के खुदरा बाजारों में भी साफ दिखाई देता है. लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और मेरठ के व्यापारिक संगठनों के अनुसार होली, दीपावली और नवरात्र जैसे अवसरों पर सामान्य दिनों की तुलना में बाजारों में 30 से 50 प्रतिशत तक अधिक फुटफॉल दर्ज किया जाता है. उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुनील गुप्ता बताते हैं, “त्योहारों के दौरान कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सर्राफा और मिठाई जैसे क्षेत्रों में कारोबार कई गुना बढ़ जाता है. छोटे दुकानदारों के लिए यह सीजन पूरे साल की कमाई का बड़ा हिस्सा तय करता है.”
व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों के दौरान बढ़ने वाला यह कारोबार केवल शहरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के कस्बों और गांवों तक पहुंचता है. फेस्टिवल इकॉनमी का सबसे बड़ा लाभ पारंपरिक कारीगरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिला है. अयोध्या के दीपोत्सव के दौरान लाखों दीयों की मांग ने आसपास के जिलों के कुम्हारों को बड़े पैमाने पर ऑर्डर दिए. कई स्थानों पर प्रशासन ने स्थानीय कुम्हारों से सीधे खरीद की व्यवस्था भी की.
इसी तरह नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान मूर्तिकारों, पंडाल निर्माताओं, लाइटिंग और साउंड सिस्टम से जुड़े व्यवसायों को भी व्यापक काम मिलता है. महिला स्वयं सहायता समूहों ने भी त्योहारों को आय के अवसर में बदल दिया है. होली पर हर्बल गुलाल, दीपावली पर दीये और मोमबत्तियां तथा नवरात्र में प्रसाद पैकिंग जैसे उत्पादों की बिक्री से हजारों महिलाओं को अतिरिक्त आय मिल रही है.
सरकार की नीति और चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फेस्टिवल इकॉनमी के विस्तार में सरकार की नीतियों और निवेश की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. राज्य सरकार ने धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश किए हैं. 2026-27 के बजट में प्रमुख तीर्थस्थलों के विकास के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसमें अयोध्या, वाराणसी, नैमिषारण्य और मथुरा जैसे शहर शामिल हैं. इसके अलावा रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट और बौद्ध सर्किट जैसे पर्यटन मार्गों को विकसित किया गया है, जिससे धार्मिक स्थलों को आपस में जोड़कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है.
सरकार का कहना है कि इन प्रयासों का उद्देश्य केवल धार्मिक पर्यटन बढ़ाना नहीं है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी मजबूत करना है. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि त्योहार आधारित पर्यटन अब उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में राज्य में पर्यटन से होने वाला राजस्व 70,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. लखनऊ विश्वविद्यालय के एक अर्थशास्त्री अरविंद मोहन कहते हैं कि “फेस्टिवल इकॉनमी केवल धार्मिक आस्था का मामला नहीं है, यह स्थानीय विकास का मॉडल बनती जा रही है. जब लाखों लोग किसी शहर में आते हैं तो होटल, परिवहन, व्यापार और छोटे उद्यम सभी को लाभ मिलता है.”
फेस्टिवल इकॉनमी के तेजी से विस्तार के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. लखनऊ में अमीनाबाद बाजार के एक बड़े व्यापारी विकास रस्तोगी बताते हैं “बड़े आयोजनों के दौरान शहरों में ट्रैफिक दबाव, कचरा प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं. कई स्थानों पर अस्थायी ढांचे और अनियोजित पंडालों के कारण सुरक्षा जोखिम भी बढ़ते हैं.” स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि बड़े आयोजनों में बाहरी बड़े कारोबारी और ब्रांडेड स्टॉल आने से छोटे दुकानदारों की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है. इसके अलावा पर्यटन के अचानक बढ़ते दबाव से शहरों की आधारभूत सुविधाओं जैसे पार्किंग, शौचालय, जल आपूर्ति और स्वच्छता आदि पर अतिरिक्त भार पड़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दीर्घकालिक योजना और संतुलित प्रबंधन नहीं हुआ तो फेस्टिवल इकॉनमी का लाभ सीमित हो सकता है.