योगी सरकार का बजट लोकलुभावन वादों से क्यों दूर रहा?
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और इस लिहाज से लोगों को उम्मीद थी कि बजट लोकलुभावन होगा

“यही जुनून, यही ख्वाब मेरा है.
दिया जला के रोशनी कर दूं, जहां अंधेरा है.”
उत्तर प्रदेश विधानसभा में बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने जैसे ही ये पंक्तियां पढ़ीं, सत्ता पक्ष की बेंचों से जोरदार तालियां गूंज उठीं. वित्त मंत्री ने इस शेर के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की भावुक अंदाज में तारीफ तो की ही, साथ में इशारा भी दिया कि बजट की दिशा क्या होगी.
इस बजट में लोगों की दिलचस्पी यह जानने में ज्यादा थी कि क्या चुनावी साल की आहट में कोई बड़ा लोकलुभावन दांव सामने आएगा. लेकिन बजट के स्वर और संरचना को देखें तो सरकार ने अलग रास्ता चुना है.
करीब 9.12 लाख करोड़ रुपये के आकार वाला यह बजट पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12.9 प्रतिशत अधिक है. पूंजीगत व्यय का हिस्सा 19.5 प्रतिशत रखा गया है, जो बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक परिसंपत्तियों पर जोर का संकेत देता है. शिक्षा को 12.4 प्रतिशत और स्वास्थ्य को 6 प्रतिशत आवंटन मिला है. कृषि और उससे जुड़ी सेवाओं के लिए 9 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित है.
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक सतही तौर पर यह संतुलित और विकास उन्मुख बजट दिखाई देता है. लखनऊ निवासी अर्थशास्त्री आर.पी. मिश्र का कहना है कि पूंजीगत व्यय का हिस्सा बढ़ाना सकारात्मक संकेत है. उनके मुताबिक, “राज्य अगर लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादक परिसंपत्तियों में निवेश करता है तो उसका गुणात्मक असर होता है. यह अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से ज्यादा दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर फोकस दर्शाता है.” हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि खर्च की गुणवत्ता और समयबद्ध क्रियान्वयन असली कसौटी होगी.
चुनावी साल में भी लोकलुभावन घोषणाओं से दूरी बनाए रखना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अजय कुमार का मानना है कि BJP अब उत्तर प्रदेश में “वेलफेयर प्लस डेवलपमेंट” मॉडल को स्थिर मानकर चल रही है, इसलिए उसे हर चुनाव से पहले नई मुफ्त योजनाओं की जरूरत महसूस नहीं होती. उनके अनुसार, सरकार यह भरोसा जताना चाहती है कि बुनियादी ढांचे, निवेश और रोजगार पर किया गया खर्च ही उसका सबसे बड़ा चुनावी संदेश है. वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शशांक द्विवेदी का कहना है कि लोकलुभावन बजट से वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठते, इसलिए सरकार ने संयमित रुख अपनाया. दूसरी ओर BJP नेताओं का तर्क है कि प्रदेश में पहले से ही मुफ्त राशन, उज्ज्वला और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं चल रही हैं, ऐसे में “नई घोषणाओं की होड़” की जरूरत नहीं थी. पार्टी के प्रवक्ता समीर सिंह ने कहा कि यह बजट चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश को पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले राज्य के रूप में तैयार करने की दिशा में पेश किया गया है.
इस बजट का सबसे स्पष्ट संदेश यह है कि सरकार नई घोषणाओं की झड़ी लगाने के बजाय पहले से चल रही योजनाओं को मजबूती देना चाहती है. राजनीतिक विश्लेषकों की अपेक्षा थी कि चुनावी वर्ष को देखते हुए मुफ्त या सीधी नकद सहायता वाली योजनाओं की बाढ़ आ सकती है, लेकिन सरकार ने फोकस फंडिंग, संरचना और क्रियान्वयन पर रखा है. सत्ता पक्ष इसे जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे कल्पनाशीलता की कमी और जनता की तात्कालिक जरूरतों से दूरी के रूप में देख रहा है.
कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान इस बजट की केंद्रीय धुरी है. लगभग 10,888 करोड़ रुपये कृषि योजनाओं के लिए प्रस्तावित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष से 20 प्रतिशत अधिक है. खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 753.55 लाख मीट्रिक टन और तिलहन का 48.18 लाख मीट्रिक टन रखा गया है. यूपीएग्रीज परियोजना के तहत एग्री एक्सपोर्ट हब, विश्वस्तरीय हैचरी और प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना का प्रावधान किया गया है. किसान उत्पादक संगठनों के लिए रिवॉल्विंग फंड का प्रावधान भी जोड़ा गया है.
सरकार का दावा है कि यह बजट किसानों को बाजार से जोड़ने, निर्यात बढ़ाने और आय में स्थायी वृद्धि का आधार बनेगा. डीजल पंपों को सोलर पंप में बदलने के लिए 637 करोड़ 84 लाख रुपये का प्रावधान ऊर्जा लागत कम करने और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में कदम माना जा रहा है. निजी नलकूपों को निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए 2,400 करोड़ रुपये की व्यवस्था ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था को स्थिर करने की कोशिश है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े एक वरिष्ठ कृषि अर्थशास्त्री का मानना है कि निर्यात उन्मुख कृषि और वैल्यू चेन विकास पर जोर सही दिशा है्. उनके अनुसार, “अगर एग्री एक्सपोर्ट हब और किसान उत्पादक संगठनों को सही बाजार कनेक्टिविटी मिलती है तो इससे किसानों की आय में वास्तविक सुधार हो सकता है. लेकिन केवल बजट प्रावधान से नहीं, संस्थागत समर्थन और लॉजिस्टिक सुधार से फर्क पड़ेगा.”
विपक्ष का तर्क है कि बजट आवंटन बढ़ाने भर से किसानों की आय दोगुनी नहीं होगी. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने सदन के बाहर कहा कि समर्थन मूल्य, खरीद व्यवस्था और गन्ना भुगतान जैसे मुद्दों पर स्पष्ट रोडमैप नहीं दिखता. उनका कहना है कि लक्ष्य तय कर देना आसान है, लेकिन बीते वर्षों के उत्पादन और आय के आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण जरूरी है.
उद्यान और खाद्य प्रसंस्करण के लिए 2,832 करोड़ रुपये का प्रावधान ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य संवर्धन और रोजगार सृजन की दिशा में प्रयास है. दुग्ध विकास में मथुरा की डेयरी परियोजना की क्षमता 30 हजार लीटर से बढ़ाकर 1 लाख लीटर प्रतिदिन करना सरकार की डेयरी सेक्टर पर गंभीरता को दर्शाता है. 220 नई दुग्ध समितियों के गठन और 450 के पुनर्गठन का प्रस्ताव सहकारिता मॉडल को फिर से सक्रिय करने का संकेत है.
पशुधन क्षेत्र में छुट्टा गोवंश के रखरखाव के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है. प्रदेश के हजारों गो आश्रय स्थलों और गो संरक्षण केंद्रों पर खर्च का बड़ा हिस्सा जारी रखना सरकार के वैचारिक एजेंडे से भी जुड़ा है. विपक्ष सवाल उठा रहा है कि इतनी बड़ी राशि का उपयोग क्या ग्रामीण बुनियादी सेवाओं या स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत करने में नहीं किया जा सकता था.
मत्स्य क्षेत्र में एकीकृत एक्वा पार्क, अत्याधुनिक थोक बाजार और प्रसंस्करण केंद्रों के लिए प्रावधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विविधीकरण का संकेत है. खाद्य एवं रसद विभाग के लिए 20,124 करोड़ रुपये का आवंटन, जिसमें अन्नपूर्ति योजना और मुफ्त एलपीजी रिफिल शामिल हैं, यह बताता है कि सरकार सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क को कमजोर नहीं करना चाहती.
हालांकि इस बजट का सबसे रणनीतिक संदेश आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में दिखता है. 2,059 करोड़ रुपये का आवंटन, जो पिछले वर्ष से 76 प्रतिशत अधिक है, स्पष्ट करता है कि सरकार प्रदेश को डिजिटल और तकनीकी हब के रूप में स्थापित करना चाहती है. उत्तर प्रदेश AI मिशन की शुरुआत और 49 आईटीआई में AI लैब की स्थापना का प्रस्ताव युवाओं को भविष्य की तकनीक से जोड़ने की कोशिश है. सरकार का दावा है कि प्रदेश देश का सबसे बड़ा मोबाइल फोन विनिर्माण केंद्र बन चुका है और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 44,744 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. 30,000 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश से डाटा सेंटर पार्क विकसित करने का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को डिजिटल बुनियादी ढांचा विकास में अग्रणी राज्य बनाना है.
सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि यह बजट परंपरागत कृषि राज्य की छवि से आगे बढ़कर तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम है. उनका तर्क है कि पूंजीगत व्यय पर जोर, AI और साइबर सुरक्षा में निवेश, और औद्योगिक नीतियों का विस्तार प्रदेश को दीर्घकालिक विकास मॉडल देगा.
विपक्ष का आरोप है कि आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स के बड़े दावों के बावजूद रोजगार सृजन के ठोस आंकड़े सामने नहीं हैं. उनका कहना है कि स्टार्टअप रैंकिंग और निवेश समझौतों की घोषणाएं जमीन पर कितनी नौकरियों में बदलीं, यह स्पष्ट होना चाहिए. कुछ अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि पूंजीगत व्यय बढ़ाना सकारात्मक है, लेकिन राजस्व घाटे और कर्ज के स्तर पर भी समान रूप से पारदर्शिता जरूरी है. दिल्ली स्थित एक निजी कंपनी के वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक अनिरुद्ध सेन कहते हैं, “उत्तर प्रदेश ने अगर मोबाइल विनिर्माण और डेटा सेंटर के क्षेत्र में जो दावे किए हैं, उन्हें रोजगार सृजन से जोड़ा जा सका तो यह बड़ा बदलाव होगा. लेकिन अभी तक निवेश समझौते और वास्तविक रोजगार के आंकड़ों के बीच का अंतर साफ करना जरूरी है.”
इस बजट से सरकार ने जो सबसे बड़ा संदेश देने की कोशिश की है, वह यह कि उत्तर प्रदेश अब सिर्फ कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर राज्य नहीं रहना चाहता. वह बुनियादी ढांचे, कृषि वैल्यू चेन, तकनीक और विनिर्माण के जरिए विकास का स्थायी मॉडल गढ़ना चाहता है. लोकलुभावन घोषणाओं से दूरी बनाकर सरकार यह संकेत दे रही है कि वह वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक निवेश की राह पर है. साथ ही, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का निरंतर प्रवाह यह भी बताता है कि सरकार अपने परंपरागत मतदाता वर्ग को आश्वस्त रखना चाहती है. किसानों, महिलाओं, युवाओं और गरीब तबकों का जिक्र बजट भाषण में बार बार आया, जो राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
कुछ विशेषज्ञों ने वित्तीय अनुशासन पर भी सवाल उठाए हैं. चार्टर्ड अकाउंटेंट और पब्लिक फाइनेंस विश्लेषक मनीष अग्रवाल का कहना है कि बजट का आकार बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन राज्य के कर्ज और राजस्व घाटे की स्थिति पर भी समान ध्यान जरूरी है. उनके शब्दों में, “अगर पूंजीगत व्यय उधार पर आधारित है तो उसकी दीर्घकालिक वहन क्षमता का आकलन जरूरी है. विकास और वित्तीय संतुलन के बीच तालमेल ही असली चुनौती है.”
आखिरकार यह बजट चुनावी वर्ष से पहले सरकार की आत्मविश्वास भरी प्रस्तुति है. इसमें जोखिम भी है. यदि घोषित परियोजनाएं समय पर धरातल पर नहीं उतरतीं तो विपक्ष को हमला करने का अवसर मिलेगा. लेकिन यदि कृषि निर्यात, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और डेटा सेंटर निवेश जैसी पहलें परिणाम देने लगती हैं तो यह बजट योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल की निर्णायक पहचान बन सकता है.