यूपी में अब AI बताएगा कि कौन से बादल सिर्फ गरजेंगे, कौन से बरसेंगे!
AI आधारित नया मौसम मॉडल अब यूपी में 1 किलोमीटर दायरे तक 10 दिन पहले बारिश का अनुमान देगा, जिससे किसानों, शहरों और आपदा प्रबंधन की तैयारी अधिक सटीक तरीके हो सकेगी

बाराबंकी जिले के सूरतगंज ब्लॉक के किसान रामऔतार वर्मा पिछले साल जून के आख़िरी हफ्ते में धान की नर्सरी डाल चुके थे. मौसम विभाग की सामान्य भविष्यवाणी के भरोसे उन्होंने खेत तैयार कर लिए थे, लेकिन अचानक आई तेज़ बारिश और फिर लगातार तीन दिन तक जलभराव ने उनकी आधी पौध खराब कर दी.
उन्हें दोबारा बीज खरीदने पड़े, डीज़ल खर्च बढ़ा और बुवाई लगभग दो हफ्ते पीछे चली गई. रामऔतार जैसे लाखों किसान हर साल आसमान की तरफ देखकर खेती का फैसला लेते हैं, लेकिन मौसम की छोटी सी चूक भी उनकी पूरी लागत बिगाड़ देती है. अब उत्तर प्रदेश में शुरू हुई नई AI आधारित मौसम पूर्वानुमान प्रणाली ऐसी ही मुश्किलों को कम करने का दावा कर रही है.
दावा यह है कि किसान अब 10 दिन पहले तक यह जान सकेंगे कि उनके गांव या खेत के आसपास कब और कितनी बारिश होने वाली है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने उत्तर प्रदेश के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ‘हाई स्पेशल रिज़ॉल्यूशन रेनफॉल फोरकास्ट’ यानी HSRRF सिस्टम लॉन्च किया है. यह पायलट प्रोजेक्ट फिलहाल देश में अपनी तरह की पहली प्रणाली माना जा रहा है, जो 1 किलोमीटर के दायरे तक बारिश का अनुमान देने में सक्षम है.
अभी तक अधिकांश मौसम पूर्वानुमान 12 किलोमीटर या उससे बड़े क्षेत्र के आधार पर तैयार होते थे, जिनमें स्थानीय स्तर पर होने वाले बदलाव अक्सर छूट जाते थे. यही वजह थी कि कई बार एक जिले में भारी बारिश का अलर्ट जारी होता था लेकिन असल में कुछ हिस्सों में ही बारिश होती थी जबकि बाकी क्षेत्र सूखे रह जाते थे.
यह परियोजना पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ‘मिशन मौसम’ पहल का हिस्सा है. केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 12 मई को नई दिल्ली में इस प्रणाली को लॉन्च करते हुए कहा कि भारत अब पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान से आगे बढ़कर ‘इम्पैक्ट बेस्ड फोरकास्टिंग’ की तरफ बढ़ रहा है. यानी अब सिर्फ यह नहीं बताया जाएगा कि बारिश होगी या नहीं, बल्कि यह भी बताया जाएगा कि उसका असर किन इलाकों पर कितना पड़ सकता है.
सरकार का दावा है कि पिछले एक दशक में देश के मौसम संबंधी बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव आया है. कुछ साल पहले तक देश में केवल 16-17 डॉप्लर मौसम रडार थे, जबकि अब इनकी संख्या करीब 50 हो चुकी है. ‘मिशन मौसम’ के तहत 50 और रडार लगाने की योजना है. उत्तर प्रदेश में भी अलीगढ़, झांसी, लखनऊ, वाराणसी और आजमगढ़ में नए डॉप्लर वेदर रडार लगाए जाने हैं. इनसे मिलने वाला डेटा भविष्य में HSRRF मॉडल को और मजबूत बनाएगा.
अब जिला नहीं, गांव स्तर पर मौसम का अनुमान
IMD के उत्तर प्रदेश केंद्र के प्रमुख मनीष रनालकर के मुताबिक, HSRRF सिस्टम AI आधारित डाउनस्केलिंग तकनीक का इस्तेमाल करता है. आसान भाषा में कहें तो यह बड़ी भौगोलिक इकाइयों में मिलने वाले मौसम डेटा को छोटे और बेहद स्थानीय स्तर तक तोड़कर अधिक सटीक अनुमान तैयार करता है. इस मॉडल में ऑटोमैटिक रेन गेज, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, डॉप्लर वेदर रडार, उपग्रह आधारित वर्षा डेटा और ऊपरी हवा के प्रेक्षणों को एक साथ जोड़ा जाता है. इसके बाद AI एल्गोरिद्म इन आंकड़ों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाते हैं कि अगले 10 दिनों में किस इलाके में कितनी बारिश हो सकती है.
इस प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत उत्तर प्रदेश का विशाल निगरानी नेटवर्क है. राज्य में लगभग 2,450 मौसम निगरानी स्टेशन लगाए गए हैं, जिनमें करीब 2,000 ऑटोमैटिक रेन गेज और 450 ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन शामिल हैं. इन स्टेशनों के लिए राज्य सरकार ने लगभग 140 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. इसके अलावा IMD के अपने स्टेशन और मैनुअल प्रेक्षण भी डेटा को मजबूत बनाते हैं. केंद्र सरकार के वैज्ञानिक संस्थान इस डेटा को प्रोसेस करके दिल्ली से मॉडल चलाते हैं और फिर पूर्वानुमान संबंधी जानकारी लखनऊ स्थित मौसम विज्ञान केंद्र को भेजी जाती है.
IMD ने इसके साथ पंचायत मौसम सेवा भी शुरू की है, जिसके तहत 16 राज्यों के 3,000 से ज्यादा उप-जिलों तक स्थानीय मौसम जानकारी पहुंचाने की योजना है. उत्तर प्रदेश में भी इसका फायदा किसानों को मिलेगा. मौसम संबंधी जानकारी सिर्फ वेबसाइट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वॉट्सएप, SMS, किसान पोर्टल और मंडियों में लगे डिस्प्ले बोर्ड्स के जरिए भी साझा की जाएगी. यह पहल इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बड़ी संख्या में किसान स्मार्टफोन आधारित मौसम ऐप का नियमित उपयोग नहीं करते. यदि स्थानीय भाषा में और आसान तरीके से मौसम अलर्ट गांव तक पहुंचेगा तो उसका असर ज्यादा दिखाई देगा.
तूफान और बिजली गिरने की चेतावनी होगी ज्यादा सटीक
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक खास तौर पर कम समय में बनने वाले तेज़ तूफानों और अत्यधिक बारिश की घटनाओं के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है. उत्तर प्रदेश में प्री-मानसून और मानसून के दौरान अक्सर ऐसी स्थानीय आंधी-बारिश होती है, जो सिर्फ 20 से 30 मिनट तक चलती है लेकिन भारी नुकसान पहुंचा देती है. कई बार बिजली गिरने की घटनाएं भी अचानक होती हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को संभलने का समय नहीं मिल पाता. HSRRF मॉडल ऐसे मौसमीय घटनाक्रमों की अधिक सटीक पहचान कर सकेगा.
अगर किसी इलाके में अगले कुछ घंटों या दिनों में अत्यधिक बारिश या बिजली गिरने की आशंका होगी तो प्रशासन पहले से अलर्ट जारी कर सकेगा. राहत आयुक्त ऋषिकेश भास्कर यशोद के मुताबिक, इससे बाढ़ प्रबंधन और आपदा नियंत्रण में बड़ा सुधार आएगा. स्थानीय प्रशासन यह तय कर सकेगा कि किस क्षेत्र में राहत सामग्री पहले भेजनी है, कहां नावों या एनडीआरएफ टीमों की जरूरत पड़ सकती है और किन गांवों को पहले से सतर्क करना होगा.
क्यों बड़ा बदलाव है यह तकनीक
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा कृषि प्रधान राज्य है और यहां खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है. मौसम में थोड़ी भी अनिश्चितता सीधे उत्पादन और किसानों की आय पर असर डालती है. अभी तक किसान सामान्य मौसम बुलेटिन या स्थानीय अनुभव के आधार पर खेती से जुड़े फैसले लेते थे. लेकिन AI आधारित यह मॉडल उन्हें गांव स्तर पर मौसम की जानकारी उपलब्ध कराने का दावा करता है. अगर किसी किसान को यह पता हो कि अगले सात से दस दिनों तक बारिश नहीं होगी तो वह सिंचाई की बेहतर योजना बना सकता है. अगर भारी बारिश की संभावना हो तो वह धान की रोपाई, गेहूं की कटाई या सब्जियों की तुड़ाई समय से पहले कर सकता है. इससे फसल नुकसान कम होगा और लागत भी घटेगी.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम आधारित खेती भविष्य की जरूरत बनती जा रही है. जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. कहीं बहुत कम बारिश हो रही है तो कहीं अचानक बादल फटने जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं. ऐसे में हाइपर-लोकल मौसम पूर्वानुमान खेती को ज्यादा वैज्ञानिक बनाने में मदद कर सकता है.
यह तकनीक सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है. तेजी से शहरीकरण वाले शहरों जैसे लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और वाराणसी में भी इसका बड़ा उपयोग माना जा रहा है. हर मानसून में कुछ घंटे की बारिश से शहरों में जलभराव की स्थिति बन जाती है. कई बार नगर निगम और प्रशासन को यह अंदाजा ही नहीं होता कि किस इलाके में पानी भरने की स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है. नई प्रणाली की मदद से ऐसे इलाकों की पहले पहचान की जा सकेगी. यदि किसी खास जोन में अत्यधिक बारिश की संभावना होगी तो वहां पहले से पंपिंग स्टेशन, ट्रैफिक डायवर्जन और राहत टीमों की व्यवस्था की जा सकेगी. इससे शहरी आपदा प्रबंधन ज्यादा प्रभावी हो सकता है.
क्या चुनौतियां भी हैं?
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि AI आधारित मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं हो सकता. मौसम एक बेहद जटिल विज्ञान है और भारत जैसे विशाल एवं विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में स्थानीय बदलाव तेजी से होते हैं. AI मॉडल की सटीकता काफी हद तक डेटा की गुणवत्ता और लगातार अपडेट पर निर्भर करती है. अगर किसी स्टेशन से गलत डेटा आए या नेटवर्क में रुकावट हो तो पूर्वानुमान प्रभावित हो सकता है.
दूसरी चुनौती यह है कि क्या यह जानकारी वास्तव में गांव स्तर तक समय पर पहुंच पाएगी. कई बार मौसम विभाग के अलर्ट जारी होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन और आम लोगों तक सूचना देर से पहुंचती है. इसलिए तकनीक के साथ प्रभावी संचार व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होगी. इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ यह प्रयोग भारत के मौसम विज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है.