यूपी में विसरा जांच की बदहाल व्यवस्था से हजारों मौतों का सच दफन!
गोरखपुर और आगरा जैसे जिलों में पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित रखे गए हजारों विसरा सैंपल सालों से बिना जांच सड़ रहे हैं और जाहिर है कि इससे मौतों की असलियत कभी पता नहीं चल पाएगी

उत्तर प्रदेश में आपराधिक जांच और न्याय प्रक्रिया की एक सबसे कम दिखाई देने वाली लेकिन सबसे अहम कड़ी आज खुद सवालों के घेरे में है. यह कड़ी है पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित रखे जाने वाले विसरा सैंपल. ये वही सैंपल हैं जिनसे यह तय होता है कि मौत स्वाभाविक थी, ज़हर से हुई, शराब के ओवरडोज़ से, या फिर किसी सुनियोजित हत्या का नतीजा थी. लेकिन यूपी के कई जिलों में हजारों विसरा सैंपल सालों से जार और झोलों में बंद सड़ रहे हैं. इनके साथ ही सड़ रहा है न्याय का भरोसा और दबता जा रहा है हजारों मौतों का सच.
जारों में कैद मौतों का सच
गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज के पुराने पोस्टमार्टम हाउस में रखे करीब 43 हजार विसरा सैंपल इस पूरे सिस्टम की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. पांच कमरों में जार और प्लास्टिक के झोलों में बंद ये सैंपल गोरखपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों से आए शवों के हैं. नियम यह है कि जिन मामलों में पोस्टमार्टम के दौरान मौत की वजह स्पष्ट नहीं हो पाती, उनमें विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा जाए.
लेकिन हकीकत यह है कि यहां साल दर साल विसरा जमा होता गया, जांच के लिए भेजने की प्रक्रिया ठप रही और नतीजतन बड़ी संख्या में सैंपल खराब हो चुके हैं. मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक वरिष्ठ डॉक्टर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “विसरा को सुरक्षित रखने के लिए प्रिजर्वेटिव, एयरटाइट कंटेनर और तय तापमान जरूरी है. यहां कई सैंपल सामान्य तापमान पर पड़े रहे. जब जांच का आदेश आया भी होगा, तब तक सैंपल जांच के लायक नहीं बचे.” इसका सीधा मतलब यह है कि जिन हजारों मामलों में मौत का कारण संदिग्ध था, उनमें अब कभी सच्चाई सामने नहीं आ पाएगी. न परिवारों को जवाब मिलेगा, न अदालतों को पुख्ता सबूत.
आगरा का कमरा, जहां इंसाफ कूड़े की तरह पड़ा है
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज का पोस्टमार्टम हाउस भी इससे अलग नहीं है. यहां एक कमरे में करीब 1500 से ज्यादा विसरा जार सालों से धूल और गंदगी में पड़े हैं. ये सैंपल 1990 से 2004 के बीच के बताए जाते हैं. कमरे की हालत ऐसी है कि दरवाजा और खिड़कियां टूटी हुई हैं, जार जमीन पर गिरे पड़े हैं और उन पर लिखे केस नंबर मिट चुके हैं. कमरे में शवों के कपड़े, बाल और अन्य सामान भी बिखरे पड़े हैं. ऐसे में अगर किसी पुराने केस में विसरा की जरूरत पड़े, तो सही सैंपल पहचानना लगभग नामुमकिन है. पोस्टमार्टम हाउस के एक कर्मचारी बताते हैं, “पिछले 12 साल में इस कमरे से एक भी विसरा जांच के लिए नहीं गया. कई बार नष्ट करने का आदेश आया, लेकिन पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच जिम्मेदारी टलती रही.” यहां सवाल सिर्फ अव्यवस्था का नहीं है, बल्कि जवाबदेही का भी है. अगर किसी हत्या या संदिग्ध मौत के केस में अदालत विसरा रिपोर्ट मांगती है और सैंपल ही गायब या खराब मिलते हैं, तो केस कमजोर पड़ना तय है.
इस हालत के पीछे असली कहानी उन परिवारों की है, जो सालों से जवाब का इंतजार कर रहे हैं. गोरखपुर के एक परिवार ने बताया कि उनके बेटे की संदिग्ध हालत में मौत हुई थी. पोस्टमार्टम में कारण स्पष्ट नहीं हुआ और विसरा सुरक्षित रखने की बात कही गई. “हमें लगा सच सामने आएगा, लेकिन आज तक कोई रिपोर्ट नहीं मिली. अब पता चलता है कि सैंपल ही खराब हो चुका होगा.” ऐसे मामलों में न सिर्फ न्याय में देरी होती है, बल्कि परिवारों का सिस्टम से भरोसा भी टूटता है.
विसरा जांच क्यों है इतनी अहम
फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. अमर सिंह बताते हैं कि विसरा बेहद संवेदनशील बायोलॉजिकल सैंपल होता है. “बिना प्रिजर्वेटिव के सामान्य तापमान पर रखा विसरा 24 से 48 घंटे में सड़ने लगता है. गर्मी में यह समय और कम हो जाता है. अगर चार डिग्री सेल्सियस पर एयरटाइट कंटेनर में रखा जाए तो तीन से पांच दिन सुरक्षित रह सकता है. सैचुरेटेड सॉल्ट सॉल्यूशन जैसे प्रिजर्वेटिव के साथ कुछ महीनों तक सैंपल सुरक्षित रहता है.” वे कहते हैं कि गलत तरीके से रखे गए विसरा की लैब रिपोर्ट भी संदिग्ध हो सकती है, “अगर सैंपल खराब है, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उसमें जहर था या नहीं. इससे गलत रिपोर्ट आने का खतरा बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर केस के नतीजे पर पड़ता है.”
देरी की असली वजहें
यूपी में विसरा जांच में देरी की कई वजहें हैं. पहली, विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं पर काम का अत्यधिक दबाव. दूसरी, टॉक्सिकोलॉजी सेक्शन में प्रशिक्षित स्टाफ की भारी कमी. तीसरी, पुलिस और मेडिकल सिस्टम के बीच समन्वय का अभाव. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, “कई बार पोस्टमार्टम के बाद विसरा पुलिस के सुपुर्द कर दिया जाता है, लेकिन केस डायरी या कोर्ट ऑर्डर के बिना लैब भेजने में देरी होती है. जब तक आदेश आता है, सैंपल खराब हो चुका होता है.” इसके अलावा, विसरा को भेजने, रखने और ट्रैक करने के लिए कोई मजबूत डिजिटल सिस्टम नहीं है. नतीजा यह कि सैंपल कहां है, किस हालत में है और उसकी रिपोर्ट आई या नहीं, इसका रिकॉर्ड ही गड़बड़ा जाता है.
इस पृष्ठभूमि में उत्तर प्रदेश पुलिस की टेक्निकल सर्विसेज यूनिट ने फोरेंसिक सिस्टम को सुधारने की एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई है. एडीजी (टेक्निकल सर्विसेज) नवीन अरोड़ा के मुताबिक, पूरे राज्य में फोरेंसिक साइंस लैब का चरणबद्ध अपग्रेडेशन किया जाएगा, खासकर टॉक्सिकोलॉजी सेक्शन पर फोकस रहेगा. अरोड़ा कहते हैं, “विसरा रिपोर्ट में देरी से जांच और ट्रायल दोनों प्रभावित होते हैं. अगर रिपोर्ट समय पर मिले, तो पेंडिंग आपराधिक मामलों के निस्तारण में सीधी मदद मिलेगी.” योजना के तहत वैज्ञानिक अधिकारियों और तकनीकी स्टाफ की बड़े पैमाने पर भर्ती की जाएगी. साथ ही, हाई-एंड फोरेंसिक उपकरणों से लैब को लैस किया जाएगा, ताकि जांच की सटीकता और गति दोनों बढ़ सकें.
सरकार विसरा और अन्य फोरेंसिक सैंपल के लिए विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर तैयार कर रही है. इनमें सैंपल इकट्ठा करने, प्रिजर्वेशन, पैकेजिंग, भंडारण और लैब भेजने तक की पूरी प्रक्रिया तय होगी. मकसद यह है कि हर जिले में एक जैसी प्रक्रिया अपनाई जाए और कोर्ट में तकनीकी खामियों की वजह से केस कमजोर न हों. इसके साथ ही मेडिकल अधिकारियों और पुलिस कर्मियों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी प्रस्तावित हैं. इन ट्रेनिंग में कस्टडी की श्रृंखला बनाए रखने और डॉक्टर, पुलिस व फोरेंसिक विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया जाएगा.
सवाल जो अब भी बाकी हैं
हालांकि ये प्रयास उम्मीद जगाते हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पुराने विसरा सैंपल का क्या होगा. गोरखपुर और आगरा जैसे मामलों में हजारों सैंपल पहले ही खराब हो चुके हैं. क्या इसके लिए किसी की जिम्मेदारी तय होगी. क्या सिस्टम की इस विफलता का जवाब कभी मिलेगा. सीएमओ गोरखपुर डॉ. राजेश झा कहते हैं, “अगर विसरा सैंपल खराब होने की जानकारी सही है, तो इसकी जांच कराई जाएगी.” आगरा में भी सीएमओ कार्यालय के अधिकारी रिकॉर्ड जांचने और जारों के निस्तारण की बात कर रहे हैं. लेकिन जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक सुधार की ये घोषणाएं अधूरी लगती हैं.