CBI जांच से भर्ती विवाद तक; यूपी की इकलौती ओपन यूनिवर्सिटी में मचा हड़कंप!
वित्तीय अनियमितता के आरोप, भर्ती प्रक्रिया पर सवाल और दर्जनों पाठ्यक्रमों की बंदी ने बढ़ाई उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय की मुश्किलें

उत्तर प्रदेश की इकलौती राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय (UPRTOU) इन दिनों एक साथ कई मोर्चों पर घिरी हुई है. एक तरफ विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े लगभग 7.37 करोड़ रुपए की कथित वित्तीय अनियमितता की जांच शुरू हो गई है, दूसरी तरफ निदेशक और प्रोफेसर भर्ती में आरक्षण नियमों के उल्लंघन के आरोप हाईकोर्ट तक पहुंच गए हैं.
वहीं, पिछले दो वर्षों में 53 पाठ्यक्रमों को बंद या निलंबित किए जाने के फैसले ने भी विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. प्रयागराज के फाफामऊ स्थित यह विश्वविद्यालय वर्ष 1999 में स्थापित हुआ था और आज राज्य भर में लगभग 1.8 लाख विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने का दावा करता है.
12 क्षेत्रीय केंद्रों और लगभग 1500 अध्ययन केंद्रों के नेटवर्क के साथ यह उत्तर प्रदेश में दूरस्थ शिक्षा का सबसे बड़ा संस्थान है लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इसकी छवि को गंभीर चुनौती दी है.
प्रवेश घोटाले के आरोपों से मचा हड़कंप
सबसे बड़ा विवाद वित्तीय वर्ष 2015-16 से 2019-20 के बीच हुई प्रवेश प्रक्रिया से जुड़ा है. कौशाम्बी निवासी आनंद कुमार ने CBI में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय में प्रवेश शुल्क की मद में प्राप्त धनराशि और अंतिम प्रवेश आंकड़ों के बीच लगभग 7 करोड़ 37 लाख रुपए का अंतर है. शिकायतकर्ता के अनुसार पांच वर्षों में बैंक चालानों के माध्यम से 164 करोड़ 78 लाख 43 हजार 157 रुपए जमा हुए, जबकि अंतिम प्रवेश के आधार पर विश्वविद्यालय के खाते में 157 करोड़ 41 लाख 12 हजार 400 रुपए ही दर्शाए गए. दोनों आंकड़ों के बीच 7 करोड़ 37 लाख 30 हजार 757 रुपए का अंतर सामने आता है.
शिकायत में कहा गया है कि पांच वर्षों के दौरान कुल 3,49,153 बैंक चालान जेनरेट हुए जबकि अंतिम रूप से 2,75,254 प्रवेश दर्ज किए गए. शिकायतकर्ता का दावा है कि ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया का पूरा डाटा विश्वविद्यालय, राज्य सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के पोर्टलों पर उपलब्ध है, इसलिए रिकॉर्ड का मिलान कर वास्तविक स्थिति आसानी से स्पष्ट की जा सकती है.
मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI निदेशक ने शिकायत को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव, उच्च शिक्षा के पास भेजा. इसके बाद प्रमुख सचिव ने जिलाधिकारी प्रयागराज को जांच के निर्देश दिए. जिलाधिकारी ने मुख्य विकास अधिकारी, एडीएम सिटी और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) के प्राचार्य की तीन सदस्यीय समिति गठित कर जांच शुरू करा दी है.विवाद के केंद्र में आए विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. जी.के. द्विवेदी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है. उनका कहना है कि वे फरवरी 2010 से अप्रैल 2018 तक परीक्षा नियंत्रक रहे और सितंबर 2025 से दोबारा इस पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.
प्रो. द्विवेदी का कहना है कि उनकी भूमिका केवल अभ्यर्थियों की पात्रता की जांच कर प्रवेश स्वीकृत करने तक सीमित है. प्रवेश शुल्क से संबंधित वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह विश्वविद्यालय के वित्त विभाग के अधीन होता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि चालान की रसीदें सीधे वित्त विभाग को भेजी जाती हैं और हर वर्ष प्रवेश संख्या तथा प्राप्त शुल्क का पूरा विवरण वित्त विभाग को उपलब्ध कराया जाता रहा है. उनके अनुसार विश्वविद्यालय में सभी प्रक्रियाएं ऑनलाइन हैं और अब तक न तो वित्त विभाग ने कोई आपत्ति दर्ज की है और न ही किसी ऑडिट रिपोर्ट में इस प्रकार की अनियमितता का उल्लेख हुआ है. उनका कहना है कि जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी.
भर्ती प्रक्रिया भी पहुंची अदालत
वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बीच विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया भी विवादों में आ गई है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका में विश्वविद्यालय की तरफ से निदेशक और प्रोफेसर के पदों पर निकाली गई भर्ती को चुनौती दी गई है. याचिका दाखिल करने वाले आशीष कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार यादव ने अदालत को बताया कि निदेशक और प्रोफेसर दोनों अलग-अलग कैडर के पद हैं. ऐसे में दोनों पदों को मिलाकर आरक्षण लागू करना नियमों के विरुद्ध है. उनका तर्क है कि अलग कैडर होने के कारण प्रत्येक पद पर स्वतंत्र रूप से आरक्षण नियम लागू होने चाहिए.
याचिका में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय की वर्तमान व्यवस्था से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार से जवाब मांगा है. अब दोनों पक्षों के जवाब के बाद अदालत आगे का निर्णय करेगी. यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं है बल्कि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक निर्णयों और आरक्षण नीति के अनुपालन पर भी सवाल खड़ा करता है.
चार दर्जन पाठ्यक्रम बंद, छात्रों की दुविधा बढ़ी
इन विवादों के समानांतर विश्वविद्यालय एक अन्य बड़े बदलाव से गुजर रहा है. पिछले दो वर्षों में विश्वविद्यालय के 53 पाठ्यक्रम या तो बंद कर दिए गए हैं या अस्थाई रूप से निलंबित कर दिए गए हैं. कभी 123 कार्यक्रम संचालित करने वाला विश्वविद्यालय अब केवल 70 प्रमुख पाठ्यक्रमों में प्रवेश दे रहा है. विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह फैसला छात्रों की घटती रुचि, बदलती शैक्षणिक जरूरतों और यूजीसी के नए दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखकर लिया गया है.
वर्ष 2024-25 में कम नामांकन वाले 44 पाठ्यक्रम बंद किए गए थे जबकि हाल में नौ अन्य कार्यक्रमों को भी निलंबित कर दिया गया. इनमें बीएससी ह्यूमन न्यूट्रिशन, एमएससी फूड एंड न्यूट्रिशन और एमएससी बायोकेमिस्ट्री जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं. विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इन फैसलों के पीछे मुख्य कारण यूजीसी की तरफ से जारी नए दिशा-निर्देश हैं.
अगस्त 2025 में यूजीसी ने राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य व्यवसाय आयोग (एनसीएएचपी) अधिनियम-2021 के तहत आने वाले कई विषयों को ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) मोड में संचालित करने पर रोक लगा दी थी. इसके दायरे में साइकोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, न्यूट्रिशन, बायोटेक्नोलॉजी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी विषय आते हैं. अधिकारी के अनुसार इसी कारण लगभग दो हजार आवेदनों को अस्वीकार करना पड़ा. विश्वविद्यालय अब रोजगारोन्मुख, तकनीक आधारित और बहु-विषयक कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. उनका मानना है कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रमों का पुनर्गठन आवश्यक है.
बदलती शिक्षा व्यवस्था की चुनौती
शिक्षाविदों का मानना है कि समस्या केवल विश्वविद्यालय प्रशासन तक सीमित नहीं है बल्कि दूरस्थ शिक्षा प्रणाली स्वयं एक संक्रमण काल से गुजर रही है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी के अनुसार ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म, निजी विश्वविद्यालयों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और छात्रों की पारंपरिक कक्षाओं के प्रति प्राथमिकता ने ओपन यूनिवर्सिटियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.
उनका कहना है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी अभी भी प्रत्यक्ष शिक्षण व्यवस्था को अधिक प्रभावी मानते हैं. इसके अलावा ऑनलाइन शिक्षण के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और डिस्टेंस डिग्रियों की स्वीकार्यता को लेकर बनी धारणाएं भी समस्या पैदा करती हैं. प्रो. तिवारी के अनुसार अगर ओपन यूनिवर्सिटियों को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उन्हें आधुनिक डिजिटल सामग्री, वीडियो लेक्चर, कम फीस और क्षेत्रीय आवश्यकताओं पर आधारित इनोवेशन को प्राथमिकता देनी होगी.
सुधार की दिशा में विश्वविद्यालय की पहल
इन चुनौतियों के बीच विश्वविद्यालय अपने ढांचे को आधुनिक बनाने का प्रयास भी कर रहा है. कुलपति प्रो. सत्यकाम के अनुसार उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय इग्नू के सहयोग से 'स्वयं प्रभा' प्लेटफॉर्म पर अपने पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है. इसके लिए प्रारंभिक चरण में 400 वीडियो लेक्चर तैयार किए जा रहे हैं और वर्ष के अंत तक इनकी संख्या एक हजार तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. विश्वविद्यालय परिसर में इसके लिए आधुनिक स्टूडियो भी तैयार किया जा चुका है. साथ ही 15 से 20 वर्ष पुराने कई पाठ्यक्रमों को नए सिरे से डिजाइन किया जा रहा है. विश्वविद्यालय का दावा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप कुंभ अध्ययन, गीता दर्शन, कर्मकांड, योग और पर्यावरण विज्ञान जैसे नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं.
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी विश्वसनीयता और भविष्य दोनों की परीक्षा हो रही है. प्रवेश प्रक्रिया में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच, भर्ती प्रक्रिया पर न्यायिक समीक्षा और बड़े पैमाने पर पाठ्यक्रमों की बंदी ने संस्थान को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है.