डिजिटल सिस्टम, लेकिन किसान बेदम; यूपी में पिछले साल से आधी हुई गेहूं की खरीद!
यूपी में बोरों की कमी, तकनीकी खामियां और फार्मर रजिस्ट्री के चलते किसान सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं नहीं बेच पा रहे

अप्रैल की 17 तारीख है. आंबेडकरनगर के अकबरपुर की नवीन मंडी में सुबह की हल्की धूप के बीच ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतार खड़ी है. इन ट्रॉलियों में सिर्फ गेहूं नहीं, महीनों की मेहनत और पसीना भरा है. लेकिन उस पसीने की कीमत पाने के लिए किसान रामसजन यादव की आंखों में अब थकान और बेबसी साफ दिखती है. सिर पर गमछा डाले वे तीसरे दिन भी इंतजार कर रहे हैं.
रामसजन बताते हैं, “पसीना बहाकर गेहूं उगाया, अब बेचने के लिए भी भटकना पड़ रहा है. पहले दिन बोले बोरे नहीं हैं, दूसरे दिन मशीन खराब थी, आज स्टाफ नहीं है. हम जाएं तो जाएं कहां?” पास ही खड़े जलालपुर के किसान रामकुमार की आवाज भी भर्रा जाती है, “घर पर रखेंगे तो नमी से खराब होगा, यहां लाते हैं तो खरीद नहीं होती. सरकार कहती है सब ठीक है, लेकिन किसान तो बस इंतजार और चिंता में ही दिन काट रहा है.”
रामसजन और रामकुमार की परेशानी किसी एक केंद्र या जिले की कहानी नहीं है. यह उस व्यापक संकट की झलक है, जिसमें इस समय उत्तर प्रदेश की गेहूं खरीद व्यवस्था उलझी हुई है. कागजों पर बड़े लक्ष्य, डिजिटल सिस्टम और किसान हितैषी दावे हैं, लेकिन जमीन पर अव्यवस्था, देरी और संसाधनों की कमी हावी है.
प्रदेश में 30 मार्च से गेहूं खरीद शुरू हो चुकी है. इस बार सरकार ने 50 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा है और 6500 खरीद केंद्र बनाए गए हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है, साथ ही किसानों को साफ-सफाई के लिए 20 रुपए अतिरिक्त देने का भी प्रावधान है.
भुगतान 48 घंटे के भीतर सीधे बैंक खाते में भेजने का दावा किया गया है. लेकिन इन दावों और जमीनी स्थिति के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है.
पिछली बार से भी धीमी खरीद
अंबेडकरनगर की स्थिति सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के अंतर को साफ तौर पर दिखाती है. यहां 83 खरीद केंद्र स्वीकृत हैं, लेकिन 17 अप्रैल तक सिर्फ 21 केंद्रों पर ही खरीद शुरू हो पाई है. 18 दिनों में महज 4950 क्विंटल गेहूं खरीदा गया है, जबकि लक्ष्य 3 लाख 25 हजार क्विंटल है. यानी शुरुआत ही बेहद धीमी है. केंद्र खुले जरूर थे, लेकिन खरीद वास्तविक रूप से अप्रैल के दूसरे सप्ताह के बाद ही शुरू हो सकी. किसान केंद्रों तक पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां या तो बोरे नहीं हैं, या मशीनें काम नहीं कर रही हैं, या स्टाफ उपलब्ध नहीं है.
अमेठी में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है. यहां 30 हजार मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा गया है; 106 केंद्र स्वीकृत किए गए, जिनमें से 100 स्थापित भी हो गए. लेकिन 15 अप्रैल तक सिर्फ 98 किसानों से 792.55 मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया. कई किसान घंटों इंतजार करने के बाद वापस लौटने को मजबूर हुए. बोरे की कमी यहां भी सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है.
आगरा में तो तकनीकी खामियां भी इस समस्या को और जटिल बना रही हैं. 47 केंद्र बनाए गए, लेकिन 15 अप्रैल तक सिर्फ 5 केंद्रों पर खरीद हो पाई. मनियां और मिढ़ाकुर जैसे केंद्रों पर किसान मशीन और सर्वर की समस्याओं के कारण लौटाए गए. अकोला के किसान लाखन सिंह बताते हैं कि उन्होंने आठ दिन पहले रजिस्ट्रेशन कराया था, लेकिन जब केंद्र पहुंचे तो कहा गया कि ई-पॉप मशीन और आईडी में समस्या है. मजबूरी में उन्हें गेहूं वापस घर ले जाना पड़ा. गढ़ी गूजरा बिचपुरी के मेघ सिंह भी 12 दिन से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन खरीद शुरू नहीं हुई.
इन जिलों की तस्वीर को अगर प्रदेश स्तर पर देखें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है. खरीद शुरू होने के 19 दिन बाद तक सिर्फ 1.89 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 3.42 लाख मीट्रिक टन खरीद हो चुकी थी. यानी इस बार खरीद की गति लगभग आधी रह गई है.
सबसे बड़ी बाधा : बोरों (बारदाने) की कमी
इस धीमी गति के पीछे सबसे बड़ा कारण बोरों यानी बारदाने की कमी है. यह समस्या इतनी गंभीर है कि कई केंद्रों पर तौल ही नहीं हो पा रही. दिलचस्प बात यह है कि विभाग दावा कर रहा है कि पर्याप्त बोरे उपलब्ध हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. अधिकांश केंद्रों पर बोरे नहीं पहुंच पाए हैं. यह स्थिति अचानक नहीं बनी, बल्कि योजना और क्रियान्वयन में चूक का परिणाम है. आमतौर पर जनवरी में ही बोरों की मांग (इंडेंट) भेज दी जाती है, ताकि समय पर आपूर्ति हो सके. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. जब खरीद का समय नजदीक आया, तब विकल्प तलाशे गए. प्लास्टिक के पीपी बैग का विकल्प चुना गया, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों, खासकर ईरान-इजरायल तनाव के कारण आपूर्ति बाधित हो गई.
इसके बाद इस्तेमाल किए गए बोरों की खरीद के लिए ई-टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन उसमें समय लग गया और व्यापारियों ने ऊंची दरें डाल दीं. आखिरकार मंडल स्तर पर टेंडर कराने का निर्णय लिया गया, जिससे और देरी हुई. स्थिति बिगड़ती देख सरकार ने राशन दुकानदारों से पुराने बोरे सीधे खरीदने का फैसला किया. 7 अप्रैल को कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी. 20 से 25 हजार गांठ जूट बोरों की तत्काल व्यवस्था की बात कही गई. लेकिन इस फैसले के दो हफ्ते बाद भी जमीनी स्तर पर राहत सीमित ही दिखाई दे रही है. इसका मतलब है कि निर्णय और उसके क्रियान्वयन के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई है.
फार्मर रजिस्ट्री और डिजिटल सिस्टम बना समस्या
तकनीकी समस्याएं इस संकट को और गहरा कर रही हैं. इस बार सरकार ने खरीद प्रक्रिया को डिजिटल बनाने पर जोर दिया है. ई-पॉप मशीन, ऑनलाइन पंजीकरण, बारदाने की टैगिंग और सर्वर आधारित सिस्टम लागू किया गया है. लेकिन कई केंद्रों पर ये सिस्टम या तो ठीक से काम नहीं कर रहे, या स्टाफ को उन्हें संचालित करने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है. नतीजा यह है कि किसान केंद्र तक पहुंचने के बाद भी खरीद नहीं हो पा रही.
एक और बड़ा बदलाव इस बार फार्मर रजिस्ट्री को अनिवार्य करना है. सरकार ने किसान पहचान पत्र (फार्मर आईडी) को सभी योजनाओं और एमएसपी खरीद के लिए जरूरी कर दिया है. लेकिन अभी भी प्रदेश में करीब 80 लाख किसानों की रजिस्ट्री नहीं हो पाई है. इसका सीधा असर यह है कि ये किसान न तो एमएसपी पर गेहूं बेच पा रहे हैं, न ही अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं. लखनऊ जैसे जिले में भी हजारों किसान इस प्रक्रिया से बाहर हैं. नीति के स्तर पर यह कदम पारदर्शिता और डेटा प्रबंधन के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन समय पर तैयारी न होने के कारण यह भी एक बाधा बन गया है.
मजदूरों और स्टाफ की कमी भी कई जगह सामने आ रही है. तौल, लोडिंग और अनलोडिंग के लिए पर्याप्त श्रमिक नहीं हैं. कई केंद्रों पर प्रभारी या तकनीकी कर्मचारी समय पर नहीं पहुंचते. इससे किसानों को घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार वे बिना बिक्री किए लौट जाते हैं. मौसम को भी कुछ हद तक कारण बताया जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि बारिश और ओलावृष्टि के कारण गेहूं में नमी बढ़ गई है, जिससे खरीद में देरी हो रही है. लेकिन यह कारण आंशिक ही है, क्योंकि जहां व्यवस्था दुरुस्त है, वहां खरीद हो रही है.
योजना और क्रियान्वयन के बीच समन्वय की कमी
इस पूरी स्थिति पर किसान संगठनों ने भी नाराजगी जताई है. भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद केंद्रों की बदहाल स्थिति पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा है कि कई केंद्र अभी तक चालू नहीं हुए हैं और जहां खरीद हो रही है, वहां संसाधनों की कमी है. अगर स्थिति नहीं सुधरी तो किसान मजबूरी में बिचौलियों को गेहूं बेचने लगेंगे, जिससे उन्हें नुकसान होगा.
हालांकि सरकार की तरफ से किए गए प्रयासों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. एमएसपी में वृद्धि, अतिरिक्त भुगतान, डीबीटी के जरिए तेज भुगतान, टोकन प्रणाली और पारदर्शिता के उपाय सकारात्मक हैं. लेकिन समस्या यह है कि इन उपायों का असर तभी दिखेगा, जब बुनियादी ढांचा मजबूत हो. बोरे, मशीन, स्टाफ और सिस्टम यदि समय पर उपलब्ध नहीं होंगे, तो कोई भी नीति जमीन पर सफल नहीं हो पाएगी. वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि योजना और क्रियान्वयन के बीच समन्वय की कमी है. खरीद की तारीख पहले तय कर दी गई, लेकिन संसाधनों की व्यवस्था समय पर नहीं हो पाई. डिजिटल सिस्टम लागू कर दिया गया, लेकिन प्रशिक्षण और तकनीकी सपोर्ट पर्याप्त नहीं था. नए नियम लागू किए गए, लेकिन किसानों को उसके लिए तैयार नहीं किया गया.