एक तरफ जनगणना, दूसरी तरफ TET; दोहरी चुनौती में फंसे यूपी के शिक्षक

सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद 1.86 लाख शिक्षक उलझन में, जनगणना ड्यूटी के बीच करनी है TET की तैयारी

कैसा असर डालेगा सुप्रीम कोर्ट का श‍िक्षकों का टेस्ट लेने का फैसला (AI Image Generated by: Vashu Sharma)
सांकेतिक तस्वीर

हरदोई के एक प्राथमिक विद्यालय में तैनात शिक्षक रमेश (परिवर्तित नाम) पिछले कई दिनों से सुबह घर से निकल पड़ते हैं. जनगणना से जुड़ा बेहद थकाऊ कार्य निपटाने के बाद जब थके मांदे घर लौटते हैं तो शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET की तैयारी की चिंता घेर लेती है. 

उनके सामने मेज पर एक तरफ जनगणना से संबंधित प्रपत्रों का ढेर रखा है तो दूसरी तरफ बाल विकास, शिक्षण विधियों और गणित की किताबें खुली पड़ी हैं. रमेश बताते हैं, "दिनभर सरकारी ड्यूटी में निकल जाता है. रात को पढ़ने बैठता हूं तो थकान इतनी होती है कि आंखें खुली रखना मुश्किल हो जाता है. लेकिन TET पास करना भी जरूरी है." 

रमेश अकेले नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में ऐसे करीब 1.86 लाख शिक्षक हैं, जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट के 29 मई के फैसले ने राहत और चिंता दोनों एक साथ लेकर आया है. राहत इसलिए कि शीर्ष अदालत ने TET पास करने की समयसीमा एक वर्ष बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी है. चिंता इसलिए कि TET की अनिवार्यता को बरकरार रखते हुए अदालत ने साफ कर दिया है कि भविष्य में समयसीमा बढ़ाने की कोई और मांग स्वीकार नहीं की जाएगी. ऐसे में अब शिक्षकों के सामने सवाल यह है कि वे सरकारी जिम्मेदारियां निभाएं या अपनी नौकरी और पदोन्नति से जुड़े भविष्य को सुरक्षित करने के लिए परीक्षा की तैयारी करें. 

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए TET की अनिवार्यता में किसी भी प्रकार की छूट देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि उसके मूल फैसले में दखल का कोई आधार नहीं है. हालांकि प्राथमिक शिक्षा की निरंतरता और व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत विशेष शक्तियों का उपयोग कर कार्यरत शिक्षकों को TET पास करने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय दे दिया. 

यह फैसला सितंबर 2025 में आए उस ऐतिहासिक निर्णय की निरंतरता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले ऐसे सभी शिक्षकों, जिनकी सेवा में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है, उन्हें दो वर्षों के भीतर TET पास करना होगा. जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम समय बचा है उन्हें सेवा जारी रखने की छूट दी गई थी लेकिन पदोन्नति के लिए TET उनके लिए भी आवश्यक बताया गया था.

फैसले का प्रभाव सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. शिक्षक संगठनों के अनुसार देशभर में लगभग 22 लाख शिक्षक इस निर्णय से प्रभावित हो रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहा है, जहां बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं जिन्होंने नियुक्ति के समय TET नहीं की थी या बाद में इसे उत्तीर्ण नहीं कर सके. समस्या केवल TET की अनिवार्यता भर नहीं है. असली चुनौती उस समय-सारिणी से पैदा हो रही है जिसमें शिक्षकों को एक साथ कई मोर्चों पर खड़ा कर दिया गया है. 

जुलाई में TET प्रस्तावित है, सितंबर में केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी CTET आयोजित होने की संभावना है और इसी बीच शिक्षकों की ड्यूटी जनगणना जैसे विशाल राष्ट्रीय कार्यक्रम में लगाई जा रही है. इसके अतिरिक्त विद्यालयी कार्य, नामांकन अभियान, विभिन्न सर्वेक्षण, निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियां और प्रशासनिक कार्य भी उनके हिस्से में आते हैं. शिक्षकों का कहना है कि अदालत ने भले समयसीमा बढ़ा दी हो, लेकिन तैयारी के लिए आवश्यक समय नहीं बढ़ाया जा सकता. परीक्षा में सफल होने के लिए नियमित अध्ययन जरूरी है जबकि अधिकांश शिक्षक पहले से ही गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबे हुए हैं.

उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के नेता निर्भय सिंह का कहना है कि शिक्षक एक के बाद एक बीएलओ ड्यूटी, सर्वेक्षण, जनगणना और अन्य सरकारी कार्यों में लगाए जा रहे हैं. ऐसे में पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय निकाल पाना बेहद कठिन हो गया है. उनका तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि शिक्षक TET पास करें तो उन्हें कम से कम परीक्षा से पहले कुछ समय के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यों से राहत दी जानी चाहिए. 

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शिक्षक संगठनों की प्रतिक्रिया केवल कानूनी नहीं बल्कि व्यावहारिक भी है. वे कह रहे हैं कि अदालत ने जो समय दिया है, उसका लाभ तभी मिल सकेगा जब सरकार तैयारी के लिए अनुकूल परिस्थितियां भी उपलब्ध कराए. टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा का कहना है कि शिक्षक समुदाय को इस फैसले से गहरा झटका लगा है. उनके अनुसार संगठन अब क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने की संभावनाओं पर विचार करेगा. साथ ही आंदोलन को फिर से शुरू करने की तैयारी भी की जा रही है. उनका कहना है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को अचानक ऐसी परीक्षा की बाध्यता में बांधना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.

विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी भी फैसले से निराश हैं. उनका कहना है कि शिक्षकों ने हमेशा संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी लड़ाई लड़ी है लेकिन लगातार निराशा मिलने से उनमें असंतोष बढ़ रहा है. संगठन के महासचिव दिलीप चौहान का कहना है कि यह मुद्दा अब ठंडे बस्ते में नहीं जाएगा. अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ और अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ जैसे संगठन भी देशव्यापी आंदोलन की रणनीति पर विचार कर रहे हैं. कई संगठन चाहते हैं कि केंद्र सरकार संसद में कानून बनाकर लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को विशेष राहत प्रदान करे.

दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विवाद केवल रोजगार का नहीं बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक प्रशिक्षण की बहस से भी जुड़ा हुआ है. TET को राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करने के उपकरण के रूप में देखा जाता है. अदालत का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए एक समान गुणवत्ता मानक आवश्यक है. दूसरी ओर शिक्षक संगठन तर्क देते हैं कि 15-20 वर्षों से सफलतापूर्वक पढ़ा रहे शिक्षकों की क्षमता को केवल एक परीक्षा के आधार पर नहीं आंका जा सकता. 

इस बहस के बीच सबसे बड़ी चिंता उन शिक्षकों की है जो वर्षों से विद्यालयों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं और अब अपने करियर के महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं. कई शिक्षक 40 से 50 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं. लंबे अंतराल के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना उनके लिए आसान नहीं है. नई पाठ्यवस्तु, बदलते परीक्षा पैटर्न और डिजिटल अध्ययन संसाधनों के बीच उन्हें खुद को फिर से विद्यार्थी की भूमिका में ढालना पड़ रहा है. 

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और प्रशासन सहयोगी रुख अपनाएं तो इस चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है. शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, ऑनलाइन कोर्स, अध्ययन अवकाश, जिला स्तर पर कोचिंग सहायता और गैर-शैक्षणिक कार्यों में अस्थायी राहत जैसे कदम उनके प्रदर्शन को बेहतर बना सकते हैं. इससे न केवल वे TET उत्तीर्ण कर सकेंगे बल्कि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता भी मजबूत होगी. 

फिलहाल स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश के लाखों शिक्षक एक असाधारण दबाव के दौर से गुजर रहे हैं. उनके हाथ में जनगणना के फॉर्म हैं और सामने TET का प्रश्नपत्र. उन्हें प्रशासनिक मशीनरी का महत्वपूर्ण हिस्सा भी बने रहना है और अपनी पेशेवर योग्यता भी साबित करनी है. सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा बढ़ाकर उन्हें एक मौका जरूर दिया है, लेकिन यह मौका तभी सार्थक होगा जब व्यवस्था उन्हें तैयारी का पर्याप्त समय और अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा सके. 

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