यूपी में समाज के नाम पर कैसे हुआ भ्रष्टाचार का 'कल्याण'

वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति और अभ्युदय जैसी योजनाओं में सामने आए घोटालों ने यूपी के समाज कल्याण विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं

He further said that corruption in India "runs on targets", adding that every branch from traffic police to social welfare has a "collection goal". 
सांकेतिक तस्वीर

अमेठी के जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में 26 दिसंबर 2024 की दोपहर एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने विभाग के काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े कर दिए. प्रधान लिपिक गोकुल प्रसाद जायसवाल को तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी मनोज कुमार शुक्ला ने अपने चैंबर में बुलाया.

आरोप है कि वहां जायसवाल का मोबाइल फोन छीन लिया गया, फोन पे का पासवर्ड लेकर जबरन 40 हजार रुपए अपने खाते में ट्रांसफर करवा लिए गए. पैसा सीधे उनकी पत्नी डॉ. अंजू शुक्ला के खाते में गया. शिकायत में यह भी कहा गया कि अधिकारी ने जातिगत टिप्पणी करते हुए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया.

मामला सामने आने के बाद प्रारंभिक जांच हुई और आरोप सही पाए जाने पर मनोज कुमार शुक्ला को निलंबित कर दिया गया. बाद में विस्तृत विभागीय जांच में यह पुष्टि हो गई कि प्रधान लिपिक के बैंक खाते से जबरन धनराशि ट्रांसफर कराई गई थी. अधिकारी ने अपने बचाव में इसे उधार का मामला बताया, लेकिन जांच में यह दावा निराधार पाया गया. आखिरकार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सहमति के बाद सरकार ने उन्हें 10 मार्च को सेवा से बर्खास्त कर दिया.

यह घटना सिर्फ एक अधिकारी के आचरण का मामला नहीं थी, बल्कि उस बड़े संकट का संकेत थी जो वर्षों से समाज कल्याण विभाग में पनप रहा था. विभाग की कई योजनाओं में वित्तीय अनियमितता, फर्जीवाड़े और लाभार्थियों के अधिकारों की खुली लूट के मामले सामने आने लगे हैं. इसी तरह से जांच में हरदोई के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी हर्ष मवार पर वित्तीय अनियमितता के सभी आरोप सही पाए जाने पर उन्हें भी 10 मार्च को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया.

योजनाओं में घोटालों की लंबी सूची

समाज कल्याण विभाग की जिम्मेदारी समाज के कमजोर वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की है. वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति, शुल्क प्रतिपूर्ति, आर्थिक सहायता और कोचिंग योजनाएं इसी विभाग के माध्यम से चलती हैं. लेकिन जिन योजनाओं का उद्देश्य गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना है, उन्हीं में भ्रष्टाचार की सबसे ज्यादा शिकायतें सामने आ रही हैं. शाहजहांपुर का वृद्धावस्था पेंशन घोटाला इसका बड़ा उदाहरण है. वर्ष 2023 में खुलासा हुआ कि 2390 बुजुर्गों की पेंशन उनके असली बैंक खातों के बजाय अन्य खातों में ट्रांसफर कर दी गई थी. आरोप है कि विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलकर पेंशनरों के खातों में बदलाव किया और करीब 2.52 करोड़ रुपए का गबन कर लिया.

जांच में सामने आया कि पीएफएमएस सर्वर पर डोंगल और डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर खाते बदल दिए गए थे. इस मामले में तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी राजेश कुमार को गिरोह का सरगना माना गया. पुलिस ने उनके समेत नौ लोगों को गिरफ्तार किया और बाद में गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई हुई. फरवरी 2025 में जिला प्रशासन ने राजेश कुमार, उनके बेटे और पत्नी के नाम पर दर्ज करीब 4.49 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया. यह कार्रवाई बताती है कि सरकार अब ऐसे मामलों में आर्थिक लाभ वापस लेने की दिशा में भी कदम उठा रही है.

छात्रवृत्ति योजनाओं में खेल

समाज कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति योजनाएं भी लंबे समय से अनियमितताओं के आरोपों में घिरी रही हैं. मथुरा में तैनात रहे तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी करुणेश त्रिपाठी पर आरोप है कि उन्होंने 11 मान्यता विहीन निजी आईटीआई संस्थानों को छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति के नाम पर 2.53 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया. जांच में सामने आया कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की उम्र तक संदिग्ध थी. कहीं दो साल के बच्चों को आईटीआई का छात्र दिखाया गया तो कहीं 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को छात्र बनाकर छात्रवृत्ति दिला दी गई.

इसी तरह कई संस्थानों में ऐसे छात्रों के नाम पर पैसा निकाला गया जो कभी परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए. वर्ष 2017-18 और 2018-19 में हजारों छात्रों के नाम पर लगभग 9.69 करोड़ रुपए की छात्रवृत्ति जारी कर दी गई. इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए सरकार ने करोड़ों रुपए की रिकवरी के आदेश दिए हैं.

जांच में यह भी सामने आया है कि समाज कल्याण विभाग में भ्रष्टाचार के तरीके भी समय के साथ बदलते गए. कहीं लाभार्थियों के बैंक खाते बदल दिए गए, कहीं फर्जी संस्थानों को भुगतान कर दिया गया, तो कहीं छात्र-छात्राओं की सूची में हेरफेर कर रकम निकाल ली गई. हापुड़ में तैनात रहे जिला समाज कल्याण अधिकारी संजय कुमार ब्यास पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी आदेश का उल्लंघन करते हुए छात्रवृत्ति की राशि सीधे छात्रों के बैंक खातों में भेजने के बजाय शिक्षण संस्थानों के खातों में भेज दी. इससे करीब 2.74 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई. जांच में यह भी पाया गया कि विभागीय वेबसाइट पर अपलोड छात्र सूची के प्रिंट में फ्लूड लगाकर रिकॉर्ड में बदलाव किया गया था.

पुराने मामलों की फाइलें भी खुलीं

सरकार की हालिया कार्रवाई की एक खास बात यह है कि कई मामलों की फाइलें वर्षों से दबाई गई थीं. कुछ मामलों में तो जांच डेढ़ दशक से लंबित थी. श्रावस्ती की तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी मीना श्रीवास्तव पर आरोप है कि उन्होंने 2008 से 2012 के बीच 'मुख्यमंत्री महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना' में बिना सक्षम स्तर की स्वीकृति के आवेदन डाटा फीड करा दिए. इसके अलावा शादी बीमारी सहायता योजना और छात्रवृत्ति योजनाओं में भी अनियमितताएं सामने आईं.

इसी तरह औरैया में तैनात रहे अधिकारी श्रीभगवान पर आरोप है कि उन्होंने वृद्धावस्था पेंशन के लाभार्थियों के खातों में नाम की भिन्नता होने के बावजूद उन्हें सत्यापित कर दिया और 251 लाभार्थियों के खाते बदल दिए गए. समाज कल्याण विभाग की चर्चित मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना में भी गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं. यह योजना प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गरीब छात्रों को मुफ्त कोचिंग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी. लेकिन जांच में सामने आया कि कोचिंग केंद्रों में आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्त किए गए कोर्स कोऑर्डिनेटरों की भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी हुई. जांच में पता चला कि कुल 69 चयनित अभ्यर्थियों में से 48 पात्रता मानकों पर खरे ही नहीं उतरते थे. कई ऐसे लोगों को नियुक्त कर दिया गया जो कभी पीसीएस मुख्य परीक्षा भी पास नहीं कर पाए थे.

हर कोर्स कोऑर्डिनेटर को करीब 60 हजार रुपए मासिक वेतन मिल रहा था. पिछले दो वर्षों में इन नियुक्तियों पर लगभग सात करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. सरकार ने अब इस राशि की रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस मामले में संयुक्त निदेशक सुनील कुमार विसेन को निलंबित किया गया है और आउटसोर्सिंग कंपनी के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है.

निगरानी तंत्र पर सवाल

लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने विभाग के निगरानी तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं. विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितताएं बिना उच्च स्तर की जानकारी के संभव नहीं होतीं. समाज कल्याण विभाग से सेवानिवृत्त एक अधिकारी बताते हैं, “योजनाओं के क्रियान्वयन में डिजिटल सिस्टम होने के बावजूद निगरानी की कमी के कारण भ्रष्टाचार के अवसर बने रहे. कई मामलों में लाभार्थियों के बैंक खाते बदलने या भुगतान की प्रक्रिया में बदलाव करने के लिए अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार मिल जाते हैं, जिनका दुरुपयोग किया गया.”

दूसरी ओर यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में चयन प्रक्रिया, साक्षात्कार और सत्यापन से जुड़े जरूरी दस्तावेज कई मामलों में उपलब्ध ही नहीं थे. इससे स्पष्ट होता है कि विभागीय स्तर पर रिकॉर्ड रखने और निगरानी की व्यवस्था कमजोर रही है. इन मामलों के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने सख्त रुख अपनाया है. समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण का कहना है कि विभाग में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने स्पष्ट किया है कि जिन अधिकारियों ने योजनाओं में गड़बड़ी की है, उनके खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई होगी बल्कि आपराधिक मुकदमे भी दर्ज किए जाएंगे. सरकार ने कई मामलों में बर्खास्तगी, संपत्ति कुर्की, पेंशन में कटौती और करोड़ों रुपए की रिकवरी जैसे कदम उठाए हैं.

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