रिचार्ज के बाद भी अंधेरा कायम! योगी सरकार के लिए सिरदर्द बने प्रीपेड स्मार्ट मीटर
स्मार्ट मीटर पर बढ़ती शिकायतें, जिलों में विरोध और विपक्ष के हमलों ने मुद्दे को सियासी रंग दिया, 2027 चुनाव से पहले योगी सरकार के लिए चुनौती बढ़ती दिख रही है

लखनऊ के चिनहट इलाके में रहने वाले 42 वर्षीय रमेश तिवारी के घर पिछले महीने अचानक बिजली चली गई. उन्होंने तुरंत मोबाइल से स्मार्ट मीटर में रिचार्ज किया, लेकिन कनेक्शन बहाल होने में करीब 10 घंटे लग गए.
वे एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं. बिजली गायब रहने के दौरान उनका फ्रीजर खराब हुआ, कुछ दूसरा सामान खराब हो गया और घर में बच्चों की पढ़ाई भी ठप रही. रमेश कहते हैं, “पहले बिल आता था, हम भर देते थे. अब पैसा देने के बाद भी बिजली मिलेगी या नहीं, भरोसा नहीं है.”
रमेश की कहानी अपनी तरह की अकेली नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं की नई हकीकत बन चुकी है. यही वजह है कि स्मार्ट मीटर, जो कभी बिजली व्यवस्था को आधुनिक और पारदर्शी बनाने का दावा लेकर आए थे, अब योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं.
प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना केंद्र की “रिवैंप डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम” (आरडीएसएस) स्कीम के तहत बड़े स्तर पर लागू की गई. करीब 27 हजार करोड़ रुपए की लागत से पुराने मीटरों को स्मार्ट मीटर में बदला जा रहा है. आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में अब तक करीब 85 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 70 लाख मीटर प्रीपेड मोड में काम कर रहे हैं.
सरकार का दावा था कि इससे लाइन लॉस कम होगा, बिलिंग पारदर्शी होगी और उपभोक्ताओं को रियल-टाइम खपत की जानकारी मिलेगी. लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर उलट नजर आ रही है. शिकायतों का अंबार लग गया है- रिचार्ज के बावजूद बिजली न आना, बैलेंस अपडेट में देरी, अचानक खपत बढ़ना और बिना जानकारी कनेक्शन कट जाना.
प्रीपेड स्मार्ट मीटर के खिलाफ जनता में गुस्सा
उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर के खिलाफ विरोध अब अलग-अलग जिलों में संगठित रूप लेने लगा है. वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, मेरठ, बरेली और कानपुर जैसे शहरों में उपभोक्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए. कई जगहों पर लोगों ने बिजली विभाग के दफ्तरों का घेराव किया और स्मार्ट मीटर हटाने की मांग उठाई. वाराणसी में उपभोक्ताओं का आरोप है कि मीटर लगने के बाद बिल अचानक बढ़ गए हैं, जबकि उनकी खपत में कोई खास बदलाव नहीं हुआ.
प्रयागराज में छात्रों और किराएदारों ने प्रीपेड सिस्टम को अव्यवहारिक बताते हुए विरोध किया, उनका कहना है कि बार-बार रिचार्ज करना और बैलेंस खत्म होते ही बिजली कटने का डर उनके लिए बड़ी समस्या बन गया है. मेरठ और बरेली में व्यापारी संगठनों ने भी इस मुद्दे पर मोर्चा खोला और कहा कि स्मार्ट मीटर से कारोबार प्रभावित हो रहा है, क्योंकि रिचार्ज या तकनीकी गड़बड़ी के चलते अचानक बिजली कट जाती है.
गोरखपुर और कानपुर में भी स्थानीय स्तर पर धरना-प्रदर्शन हुए, जहां लोगों ने आरोप लगाया कि बिना सहमति उनके मीटर बदले गए. इन प्रदर्शनों में एक समान शिकायत सामने आई- बढ़ी हुई खपत, गलत बिलिंग और तकनीकी खामियां. लगातार बढ़ते विरोध से साफ है कि स्मार्ट मीटर अब सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि जनाक्रोश का विषय बन चुका है.
बिजली खपत बढ़ी और निगेटिव बैंलेंस बना समस्या
बढ़ती शिकायतों और विरोध के बीच राज्य के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा को खुद दखल देना पड़ा. 19 अप्रैल को लखनऊ के शक्ति भवन में हुई समीक्षा बैठक में उन्होंने साफ निर्देश दिया कि जब तक तकनीकी समिति अपनी रिपोर्ट नहीं दे देती, तब तक पुराने मीटरों को स्मार्ट मीटर से बदलने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाती है. यह फैसला बताता है कि सरकार अब इस मुद्दे की गंभीरता को समझ रही है, क्योंकि यह सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि राजनीतिक और जनसरोकार का मामला बन चुका है.
हालांकि सरकार ने कुछ राहत देने की कोशिश भी की है. जिन उपभोक्ताओं के यहां स्मार्ट मीटर पहले से लगे हैं, उनके लिए 45 दिन तक कनेक्शन न काटने का प्रावधान किया गया है. जीरो बैलेंस होने पर भी तीन दिन या 200 रुपए तक बिजली जारी रखने की व्यवस्था लागू की गई है. साथ ही 5 स्तरीय SMS अलर्ट सिस्टम शुरू करने की बात कही गई है, ताकि उपभोक्ता समय रहते रिचार्ज कर सकें. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये राहतें मूल समस्या का समाधान हैं या सिर्फ अस्थायी मरहम?
दरअसल, समस्या की जड़ कहीं ज्यादा गहरी है. बिजली कंपनियों ने खुद नियामक आयोग में स्वीकार किया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली खपत में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पश्चिमांचल में यह वृद्धि 84.24 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि पूर्वांचल और दक्षिणांचल में भी 8 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई. इससे उपभोक्ताओं के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि स्मार्ट मीटर पुराने मीटरों की तुलना में तेज चल रहे हैं.
अगर यह सच है तो यह न सिर्फ तकनीकी खामी है, बल्कि उपभोक्ताओं के साथ सीधा आर्थिक अन्याय भी है. इसी बीच एक और गंभीर तस्वीर सामने आई है. उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के आंकड़ों के मुताबिक 18 अप्रैल 2026 तक 9.77 लाख से ज्यादा उपभोक्ताओं के कनेक्शन कटे हुए हैं. ये लोग प्रीपेड मीटर में रिचार्ज नहीं कर पाए या किसी कारण से उनका बैलेंस नेगेटिव में चला गया. कुल 50 लाख से ज्यादा डिस्कनेक्टेड उपभोक्ताओं में से करीब 20 फीसदी अब भी बिना बिजली के हैं. यह स्थिति उस मॉडल की पोल खोलती है जिसे उपभोक्ता हितैषी बताया गया था.
प्रीपेड सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह गरीब और मध्यम वर्ग के लिए अस्थिरता पैदा करता है. जहां पहले उपभोक्ता महीने के अंत में बिल भरता था, अब उसे पहले पैसा जमा करना पड़ता है. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह व्यवस्था मुश्किल बन गई है. यही वजह है कि करीब 21 लाख से ज्यादा उपभोक्ता नेगेटिव बैलेंस में चल रहे हैं, जिन पर 636 करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है. यानी सिस्टम न तो पूरी तरह वसूली सुनिश्चित कर पा रहा है और न ही उपभोक्ताओं को स्थिर सेवा दे पा रहा है.
चाइनीज उपकरणों के उपयोग की आशंका
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है. परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि बिना सहमति के करीब 70 लाख उपभोक्ताओं को प्रीपेड मोड में डाल दिया गया, जो पूरी तरह गलत है. उनका आरोप है कि यह उपभोक्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन है और इसे तुरंत पोस्टपेड में बदला जाना चाहिए. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब केंद्र सरकार खुद प्रीपेड को अनिवार्य नहीं मानती, तो प्रदेश में इसे जबरन क्यों लागू किया जा रहा है.
इस पूरे मामले में एक और विवाद उभरा है-स्मार्ट मीटरिंग सिस्टम में इस्तेमाल हो रहे उपकरणों को लेकर. उपभोक्ता परिषद ने आशंका जताई है कि एमडीएम और एचईएस सिस्टम में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल हो सकता है, जिसकी जांच जरूरी है. अगर यह आशंका सही साबित होती है तो मामला सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि सुरक्षा और भरोसे का भी बन जाएगा. सरकार ने जांच के लिए चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई है, जिसमें आईआईटी कानपुर और अन्य तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं. यह समिति 10 दिनों में रिपोर्ट देगी, जिसके आधार पर आगे की नीति तय होगी. लेकिन यहां भी सवाल उठता है कि क्या इतनी जटिल और व्यापक समस्या की जांच इतने कम समय में संभव है? खुद उपभोक्ता संगठन इस पर संदेह जता चुके हैं.
सरकार पर तेज हुए विपक्षी हमले
राजनीतिक नजरिए से देखें तो स्मार्ट मीटर से जुड़ी समस्याएं आने वाले समय में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है. बिजली हर घर की जरूरत है और इससे जुड़ी नाराजगी सीधे सरकार के खिलाफ जाती है. खासकर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में, जहां पहले ही बिजली आपूर्ति को लेकर असंतोष रहा है, वहां स्मार्ट मीटर ने नई परेशानी जोड़ दी है.
विपक्ष ने इसे तुरंत जनभावना से जोड़ते हुए सरकार पर हमला तेज कर दिया है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे “गरीब विरोधी और जबरन वसूली वाला मॉडल” बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे “तकनीकी अव्यवस्था थोपने” का आरोप लगाकर सरकार की नीयत और तैयारी दोनों पर सवाल उठाए हैं.
जिलों में हो रहे प्रदर्शन और बढ़ती नाराजगी ने विपक्ष को जमीन पर मुद्दा दे दिया है, जिसे वह 2027 के विधानसभा चुनाव तक लगातार भुनाने की कोशिश करेगा. सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक तरफ उसे बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाना है, लाइन लॉस कम करना है और वित्तीय स्थिति सुधारनी है. दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे. अगर तकनीक भरोसा तोड़ती है, तो वह समाधान नहीं बल्कि समस्या बन जाती है.