बारिश हुई लेकिन सूखे का खतरा भी; यूपी में कैसे बिगड़ रहा मौसम का गणित
उत्तर प्रदेश में अब तक 41 फीसदी बारिश की कमी, पूर्वी और मध्य यूपी के दर्जनों जिले सूखे जैसी स्थिति की ओर, धान की रोपाई और पेयजल संकट की आशंका गहराई

उत्तर प्रदेश में जून का आखिरी सप्ताह शुरू होने को है लेकिन आसमान अब भी प्रदेश के बड़े हिस्से पर मेहरबान नहीं हुआ है. खेतों में धान की पौध तैयार खड़ी है, लेकिन रोपाई के लिए पानी नहीं है. तालाब सिकुड़ रहे हैं, नहरों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पा रहा और किसान हर सुबह आसमान की ओर उम्मीद से देखते हैं.
दूसरी तरफ मौसम विभाग के आंकड़े एक ऐसे संकट की चेतावनी दे रहे हैं जिसे अक्सर लोग तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक उसके असर घरों, खेतों और बाजारों तक न पहुंच जाएं. यह संकट है सूखे का. हैरानीभरी और चिंताजनक बात यह है कि उत्तर प्रदेश में इस समय सूखे का खतरा ऐसे दौर में दिखाई दे रहा है जब राज्य के कुछ जिलों में सामान्य से डेढ़ से दो गुना तक बारिश दर्ज हुई है.
आगरा, संभल, एटा, हाथरस और फिरोजाबाद जैसे जिलों में बारिश के रिकॉर्ड टूट रहे हैं जबकि राजधानी लखनऊ, अयोध्या, कुशीनगर, बहराइच, बांदा, फतेहपुर, महोबा और कौशांबी जैसे जिले बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. यह विरोधाभास केवल मौसम की कहानी नहीं है बल्कि बदलती जलवायु और असंतुलित मानसून की एक गंभीर तस्वीर है.
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार एक जून से 21 जून के बीच उत्तर प्रदेश में सामान्य 42.3 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 24.9 मिलीमीटर बारिश हुई. यानी राज्य में बारिश का घाटा 41 प्रतिशत तक पहुंच गया. पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी गंभीर है, जहां सामान्य 46.7 मिलीमीटर के मुकाबले सिर्फ 19.6 मिलीमीटर बारिश हुई. यानी यहां 58 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, जहां घाटा केवल 10 प्रतिशत रहा.
एक प्रदेश, दो मौसम
इस समय उत्तर प्रदेश मानो दो अलग-अलग मौसमों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों को हाल के वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का लाभ मिला. संभल में सामान्य से 170 प्रतिशत अधिक बारिश हुई. आगरा में 158 प्रतिशत, एटा में 155 प्रतिशत, हाथरस में 102 प्रतिशत और फिरोजाबाद में 96 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई. लेकिन पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश की तस्वीर बिल्कुल उलट है. कौशांबी ऐसा जिला रहा जहां एक जून से 21 जून तक एक बूंद भी बारिश नहीं हुई. कुशीनगर में 98 प्रतिशत, भदोही में 97 प्रतिशत, बांदा में 96 प्रतिशत और फतेहपुर में 94 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई. लखनऊ में भी सामान्य 36.8 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 13.5 मिलीमीटर बारिश हुई.
मौसम विभाग के वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रगति फिलहाल रुक गई है. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी वाली हवाओं को पर्याप्त ताकत नहीं मिल रही. इसका असर सबसे ज्यादा गंगा के मैदानी इलाकों में दिखाई दे रहा है.
बारिश की कमी के साथ-साथ भीषण गर्मी ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है. 21 जून को देश के पांच सबसे गर्म शहरों में चार उत्तर प्रदेश के थे. बांदा 42.6 डिग्री सेल्सियस के साथ सबसे गर्म रहा. प्रयागराज, वाराणसी और कानपुर का तापमान भी 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया. लखनऊ में न्यूनतम तापमान 30.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से लगभग चार डिग्री अधिक है.
रातों में भी गर्मी कम नहीं हो रही. इसका सीधा असर मिट्टी की नमी पर पड़ रहा है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार तेज धूप और लगातार गर्म हवाएं मिट्टी में मौजूद नमी को तेजी से खत्म कर रही हैं. अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों की शुरुआत प्रभावित हो सकती है.
धान की रोपाई पर संकट
उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में शामिल है. सामान्य परिस्थितियों में जून के दूसरे और तीसरे सप्ताह से धान की रोपाई का काम शुरू हो जाता है. लेकिन इस बार कई जिलों में किसान इंतजार की स्थिति में हैं. बाराबंकी के किसान रामकिशोर वर्मा बताते हैं, "धान की नर्सरी तैयार है लेकिन खेतों में पानी नहीं है. डीजल से सिंचाई कर रहे हैं तो लागत बढ़ रही है. बारिश नहीं हुई तो रोपाई देर से होगी और उत्पादन कम होगा." बहराइच के किसान मोहम्मद यूसुफ कहते हैं, "पिछले वर्षों में इस समय तक खेतों में पर्याप्त पानी होता था. इस बार जमीन सूखी पड़ी है. छोटे किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिंचाई की लागत है." महोबा के किसान रामस्वरूप पाल का कहना है, "बुंदेलखंड में तो हर साल पानी की समस्या रहती है. इस बार मानसून की देरी ने चिंता और बढ़ा दी है. कई किसान धान छोड़कर कम पानी वाली फसलों की ओर जाने की सोच रहे हैं."
क्या यह सिर्फ एक साल की समस्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट को केवल इस साल के कमजोर मानसून के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. पिछले दो दशकों के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में मानसूनी बारिश लगातार घट रही है. आइएमडी की पत्रिका 'मौसम' में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2001 से 2020 के बीच अधिकांश वर्षों में उत्तर प्रदेश में सामान्य से कम मानसूनी बारिश हुई. इस अवधि में जून से सितंबर के बीच औसत 697 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य मानसूनी वर्षा 790 मिलीमीटर मानी जाती है. यानी लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट. अध्ययन के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2003, 2008 और 2019 को छोड़कर लगभग हर साल सामान्य से कम बारिश हुई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी 2003, 2008 और 2018 को छोड़कर लगभग सभी वर्षों में वर्षा घाटा दर्ज किया गया.
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ी चिंता बारिश की मात्रा नहीं बल्कि उसके वितरण को लेकर है. पहले मानसून के दौरान कई दिनों तक लगातार हल्की और मध्यम बारिश होती थी. अब कम दिनों में अत्यधिक बारिश और लंबे सूखे अंतराल का पैटर्न बन रहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष और मौसम विशेषज्ञ प्रो. बी.एन. मिश्र के मुताबिक अल नीनो और अन्य वैश्विक जलवायु कारकों का असर मानसून पर दिखाई दे रहा है. बारिश का वितरण असंतुलित हो गया है. कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक बारिश हो रही है जबकि बड़े इलाके लंबे समय तक सूखे रह जा रहे हैं. उनके अनुसार अगले तीन से चार दिनों तक प्रदेश में गर्मी और उमस बनी रह सकती है क्योंकि मानसून के तेजी से आगे बढ़ने के संकेत नहीं हैं.
भूजल के लिए खतरे की घंटी
कम बारिश का सबसे बड़ा असर भूजल पर पड़ता है. उत्तर प्रदेश में सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए बड़ी आबादी भूजल पर निर्भर है. जब बारिश कम होती है तो किसान ट्यूबवेल और बोरवेल का अधिक इस्तेमाल करते हैं. इससे भूजल स्तर तेजी से नीचे जाने लगता है. जल विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. सिंह कहते हैं, "अगर लगातार कुछ वर्षों तक वर्षा का यही पैटर्न बना रहा तो उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है. बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल के कुछ जिले पहले से ही भूजल दोहन की समस्या से जूझ रहे हैं." उनके अनुसार भूजल का पुनर्भरण मुख्य रूप से मानसूनी बारिश से होता है. जब मानसून कमजोर पड़ता है तो भूजल भंडार भी पर्याप्त रूप से नहीं भर पाते.
हाल में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने आगरा और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा की दीर्घकालिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया. सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा और मिजोरम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 1922 से 2022 तक के 101 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया. शोध में पाया गया कि आगरा की वार्षिक वर्षा में औसतन 1.63 मिलीमीटर प्रति वर्ष की कमी दर्ज हुई है. इसका मतलब है कि एक सदी में लगभग 160 मिलीमीटर वर्षा घट चुकी है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो भूजल पुनर्भरण कम होगा, पेयजल संकट बढ़ेगा और कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. अध्ययन में यह भी सामने आया कि वर्षा का वितरण अत्यधिक अस्थिर हो गया है. 1967 में आगरा में 1088 मिलीमीटर बारिश हुई थी जबकि 2009 में केवल 324 मिलीमीटर.
जलवायु परिवर्तन की दस्तक
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहा यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों का हिस्सा हो सकता है. तापमान बढ़ रहा है, लू की अवधि लंबी हो रही है, बारिश कम दिनों में सिमट रही है और मौसम की भविष्यवाणी करना कठिन होता जा रहा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.के. तिवारी के मुताबिक कृषि अब केवल पारंपरिक अनुभव के आधार पर नहीं चल सकती. किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप खेती के तरीके अपनाने होंगे. जल संरक्षण, सूखा सहनशील किस्में और माइक्रो इरिगेशन भविष्य की जरूरत बनते जा रहे है.
विशेषज्ञों के अनुसार अगर अगले दो सप्ताह में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो कई स्तरों पर असर दिखाई देगा. धान और दूसरी खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी. सिंचाई लागत बढ़ेगी. भूजल स्तर और नीचे जाएगा. तालाबों और जलाशयों में पानी कम होगा. ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट बढ़ सकता है. पशुपालन भी प्रभावित होगा क्योंकि चारे की उपलब्धता कम हो सकती है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर जुलाई में भी मानसून सामान्य नहीं हुआ तो प्रदेश के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनने लगेंगी.
उत्तर प्रदेश के लिए फिलहाल उम्मीद की एकमात्र किरण यही है कि जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के पहले सप्ताह में मानसून सक्रिय हो जाए. लेकिन मौसम के बदलते मिजाज और पिछले वर्षों के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि केवल एक-दो अच्छी बारिशों से समस्या खत्म नहीं होगी. असली चुनौती उस बदलती जलवायु से है जिसने मानसून के पुराने भरोसे को कमजोर कर दिया है. खेतों में दरारें अभी छोटी दिखाई दे रही हैं, लेकिन अगर बादलों की बेरुखी जारी रही तो यही दरारें आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के जल, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन सकती हैं.