यूपी पुलिस के ‘चार पैरों वाले जासूस’ कैसे पहुंच रहे अपराधियों तक?

संभल से लखनऊ और कासगंज तक कई चर्चित मामलों में डॉग स्क्वायड ने दिलाई सफलता. कठिन प्रशि‍क्षण से गुजरने वाले पुलिस कुत्ते गंध के सहारे अपराधियों तक पहुंच रहे हैं

प्रतीकात्मक तस्वीर

संभल में छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के आरोपी तक पहुंचने के लिए पुलिस तीन दिनों तक हाथ-पैर मारती रही. सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए, गांव में पूछताछ हुई, फोरेंसिक टीम ने सबूत जुटाए, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ रही थी. 

तभी घटनास्थल से मिले एक गमछे को सूंघकर सात साल की लैब्राडोर मैरी ने ऐसी राह पकड़ी कि पुलिस सीधे आरोपी के घर तक पहुंच गई. कुछ घंटों बाद आरोपी गिरफ्तार था और केस की दिशा बदल चुकी थी. 

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस के डॉग स्क्वायड की उस बढ़ती भूमिका का उदाहरण है, जो अब अपराध जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन चुका है. तकनीक, सीसीटीवी और डिजिटल सर्विलांस के दौर में भी कई बार अपराधियों तक पहुंचने का सबसे भरोसेमंद रास्ता चार पैरों वाला एक प्रशिक्षित कुत्ता साबित हो रहा है.

संभल का मामला 18 जून 2026 को सामने आया. बबराला थाना क्षेत्र के एक गांव से छह साल की बच्ची अचानक लापता हो गई. दो घंटे बाद वह घर से करीब 200 मीटर दूर झाड़ियों में बेहोश मिली. अगले दिन फोरेंसिक टीम को घटनास्थल के पास एक गमछा मिला. पुलिस ने इसे सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया, लेकिन जांच ठहर गई. 

तीसरे दिन डॉग स्क्वायड की सदस्य मैरी को बुलाया गया. उसने गमछे की गंध सूंघी और गांव के भीतर चलते हुए पुलिस को सीधे एक संदिग्ध संदीप के घर तक पहुंचा दिया. यही वह सुराग था जिसने पूरी जांच को नई दिशा दी. बाद में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. इस सफलता के बाद संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने मैरी को 10 हजार रुपए के पुरस्कार से सम्मानित किया.

यह पहली बार नहीं था जब यूपी पुलिस के किसी डॉग ने जांच में निर्णायक भूमिका निभाई हो. मार्च 2026 में लखनऊ के निशातगंज में एक बुजुर्ग महिला की हत्या के मामले में बेल्जियन मैलिनोइस नस्ल के स्निफर डॉग ने पुलिस को ऐसे सुराग दिए, जिन्होंने हत्यारों तक पहुंचने का रास्ता खोला. 69 वर्षीय निर्मला देवी की हत्या उनकी बहू रंजना वर्मा और उसके प्रेमी राजन शर्मा ने की थी. दोनों ने हत्या के बाद सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए थे और जांच को गुमराह करने की कोशिश की थी. पुलिस के सामने कोई स्पष्ट दिशा नहीं थी. 

जांच के दौरान स्निफर डॉग को घटनास्थल पर ले जाया गया. उसने कमरे के भीतर से गंध पकड़ते हुए बाहर तक ट्रैकिंग की और बाद में भीड़ के बीच मौजूद राजन के आसपास असामान्य प्रतिक्रिया दिखाई. पुलिस का शक गहराया और पूछताछ शुरू हुई. बाद में सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों ने डॉग स्क्वायड की ओर से मिले संकेतों की पुष्टि कर दी. अंततः राजन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस केस ने एक बार फिर दिखाया कि जहां इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सीमित हो जाते हैं, वहां प्रशिक्षित कुत्तों की घ्राण शक्ति जांच को नई दिशा दे सकती है.

चार साल पहले कासगंज में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था. अक्टूबर 2022 में 15 वर्षीय दुर्वेश कुमार की हत्या कर उसका शव खेत में दफना दिया गया था. हत्यारे ट्रैक्टर और नकदी भी लूट ले गए थे. पुलिस के सामने न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी था और न ही कोई ठोस सुराग. तब जर्मन शेफर्ड डॉग जॉनी को जांच में लगाया गया. जॉनी ने न केवल हत्यारों के निशान तलाशे बल्कि 22 किलोमीटर दूर खड़े लूटे गए ट्रैक्टर तक पुलिस को पहुंचा दिया. 48 घंटे के भीतर तीन आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए. उस समय यूपी पुलिस ने जॉनी को अपना ‘K-9 हीरो’ बताते हुए सम्मानित किया था.

दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों तक पहुंचाने में केवल प्रशिक्षित पुलिस डॉग ही नहीं बल्कि कई बार आवारा कुत्ते भी मददगार साबित हुए हैं. सितंबर 2025 में लखनऊ में बाइक चोरों के एक गिरोह को पकड़ने में सड़क पर रहने वाले कुत्तों के झुंड ने अप्रत्याशित भूमिका निभाई. पुलिस एक साल से ऐसे गिरोह की तलाश कर रही थी जिसने 40 से अधिक मोटरसाइकिलें चोरी की थीं. कुड़ियाघाट के पास पुलिस जब चोरों का पीछा कर रही थी, तभी तेज रफ्तार कार को देखकर आवारा कुत्तों का झुंड उनके पीछे पड़ गया. 

कुत्तों ने चोरों का रास्ता रोका और वे घबराकर एक बंद गली में घुस गए जहां पुलिस पहले से मौजूद थी. गिरोह के छह सदस्य गिरफ्तार हुए और 40 चोरी की मोटरसाइकिलें बरामद हुईं. पुलिस अधिकारियों ने बाद में मजाकिया अंदाज में कहा कि उस दिन शहर के आवारा कुत्ते भी पुलिस टीम का हिस्सा बन गए थे.

इन घटनाओं ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर कुत्ते अपराधियों तक पहुंचते कैसे हैं? इसका जवाब उनकी अद्भुत घ्राण शक्ति में छिपा है. वैज्ञानिकों के अनुसार कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों से लगभग 10 हजार से लेकर एक लाख गुना अधिक होती है. इंसान की नाक में जहां लगभग 50 लाख ओल्फैक्टरी रिसेप्टर होते हैं, वहीं कई नस्लों के कुत्तों में यह संख्या 20 से 30 करोड़ तक होती है. यही कारण है कि वे पसीने, त्वचा की मृत कोशिकाओं और कपड़ों पर मौजूद सूक्ष्म गंध कणों को पहचान सकते हैं.

डॉग ट्रेनिंग विशेषज्ञ शिवा सिंह बताती हैं कि स्निफर डॉग किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से अपराधी नहीं ठहराते. वे केवल गंध के निशान का पीछा करते हैं. अपराध स्थल पर छोड़ी गई गंध को सूंघने के बाद वे उस व्यक्ति के संभावित रास्ते का पता लगाते हैं. अगर संदिग्ध हाल में वहां मौजूद रहा हो तो उसकी गंध कुछ समय तक वातावरण में बनी रहती है. प्रशिक्षित कुत्ते भीड़, ट्रैफिक और अन्य गंधों के बीच से भी उसी गंध को अलग कर लेते हैं. यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है.

यूपी पुलिस के डॉग स्क्वायड में मुख्य रूप से लैब्राडोर, बेल्जियन मैलिनोइस और जर्मन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता है. लैब्राडोर अपनी शांत प्रकृति और गंध पहचानने की क्षमता के कारण ट्रैकिंग तथा विस्फोटक खोजने में उपयोगी माने जाते हैं. 

बेल्जियन मैलिनोइस बेहद फुर्तीले और आक्रामक परिस्थितियों में काम करने में सक्षम होते हैं, इसलिए आतंकवाद विरोधी अभियानों और अपराध जांच में इनका व्यापक उपयोग होता है. जर्मन शेफर्ड अपनी बुद्धिमत्ता, अनुशासन और लंबी दूरी तक ट्रैकिंग करने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. यूपी पुलिस के डॉग स्क्वायड की संरचना भी पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुई है. प्रदेश के लगभग सभी जोन और बड़े जिलों में डॉग स्क्वायड यूनिट मौजूद हैं. इनमें ट्रैकर डॉग, स्निफर डॉग और एक्सप्लोसिव डिटेक्शन डॉग जैसी अलग-अलग श्रेणियां होती हैं. प्रत्येक कुत्ते के साथ एक प्रशिक्षित हैंडलर नियुक्त होता है जो उसके साथ लगातार रहता है. प्रशिक्षण के दौरान हैंडलर और डॉग के बीच ऐसा तालमेल विकसित किया जाता है कि कुत्ता उसके संकेतों को तुरंत समझ सके.

डॉग्स को विशेष प्रशिक्षण केंद्रों में कई महीनों तक ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें अपराध स्थल पर गंध पहचानने, हथियार खोजने, विस्फोटक पदार्थों का पता लगाने, लापता लोगों की तलाश करने और भीड़ में संदिग्धों को पहचानने जैसी तकनीकों का अभ्यास कराया जाता है. प्रशिक्षण के दौरान नकली अपराध स्थल तैयार किए जाते हैं, जहां कुत्तों को विभिन्न परिस्थितियों में काम करना सिखाया जाता है. सफल प्रशिक्षण के बाद ही उन्हें फील्ड ड्यूटी पर लगाया जाता है. 

शि‍वा सिंह बताती हैं कि आधुनिक अपराध जांच में डॉग स्क्वायड को तकनीक का प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी माना जाता है. सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फोरेंसिक जांच और डिजिटल डेटा कई बार अधूरे होते हैं. अपराधी कैमरे बंद कर सकते हैं, मोबाइल फोन फेंक सकते हैं या पहचान छिपा सकते हैं. लेकिन गंध को पूरी तरह मिटाना आसान नहीं होता. यही कारण है कि कई बार डॉग स्क्वायड जांच की उस कड़ी को जोड़ देता है जो बाकी साधनों से छूट गई होती है. 

हालांकि डॉग स्क्वायड की अपनी सीमाएं भी हैं. बारिश, अत्यधिक गर्मी, भीड़भाड़ और लंबे समय का अंतराल गंध को प्रभावित कर सकता है. इसलिए कुत्तों से मिले संकेतों को अदालत में स्वतंत्र साक्ष्य नहीं माना जाता. उन्हें केवल जांच का सुराग समझा जाता है जिसकी पुष्टि अन्य साक्ष्यों से करनी पड़ती है. इसके बावजूद पुलिस अधिकारियों का मानना है कि कई मामलों में डॉग स्क्वायड वह शुरुआती दिशा देता है, जिससे पूरी जांच आगे बढ़ती है.

संभल की मैरी, लखनऊ का बेल्जियन मैलिनोइस और कासगंज का जॉनी इस बात के उदाहरण हैं कि अपराध जांच में इंसान और जानवर की साझेदारी कितनी प्रभावी हो सकती है. अपराधी चाहे सबूत मिटाने की कितनी भी कोशिश कर लें, अक्सर वे अपने पीछे गंध का एक ऐसा निशान छोड़ जाते हैं जिसे प्रशिक्षित कुत्ते पढ़ लेते हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए डॉग स्क्वायड अब सिर्फ एक सहायक इकाई नहीं बल्कि अपराधियों तक पहुंचने वाला एक भरोसेमंद और कई बार निर्णायक जांचकर्ता बन चुका है. संभल की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब इंसानी जांच ठहर जाती है, तब कई बार न्याय की राह एक कुत्ते की नाक से होकर गुजरती है.

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