यूपी पंचायतों में नया प्रयोग या BJP की ग्रामीण वोट बैंक साधने की रणनीति?

योगी आदित्यनाथ सरकार पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही 'प्रशासक’ नियुक्त कर सकती है जो प्रदेश के इतिहास में पहली बार होगा

Rs 252/Day for farm work: Yogi govt's big move for rural UP
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है लेकिन इस बार पंचायतों के खत्म होने के साथ केवल प्रशासनिक खालीपन का सवाल नहीं जुड़ा है. इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ग्रामीण राजनीति, संगठनात्मक पकड़ और सत्ता के समीकरणों की एक बड़ी कहानी भी दिखाई दे रही है.

योगी आदित्यनाथ सरकार इस संभावना पर गंभीरता से विचार कर रही है कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही 'प्रशासक' नियुक्त कर दिया जाए. अगर ऐसा होता है, तो यह उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार होगा जब निर्वाचित प्रधानों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी प्रशासनिक अधिकारों के साथ बनाए रखा जाएगा.

अब तक परंपरा यह रही है कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने और नए चुनाव होने के बीच के अंतराल में सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) यानी ADO पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था. लेकिन इस बार सरकार जिस विकल्प पर विचार कर रही है उसे केवल प्रशासनिक निर्णय के तौर पर नहीं देखा जा रहा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके जरिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) गांवों में अपने सबसे मजबूत जमीनी नेटवर्क को सक्रिय बनाए रखना चाहती है.

58 हजार प्रधानों का नेटवर्क और BJP की रणनीति

उत्तर प्रदेश में करीब 58 हजार ग्राम प्रधान हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे प्रतिनिधियों की है जो सीधे तौर पर किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं या स्थानीय सत्ता समीकरणों को प्रभावित करते हैं. पंचायत चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं होते लेकिन गांवों में प्रधान अक्सर विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करने, बूथ प्रबंधन और राजनीतिक माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं.

जानकारी के मुताबिक 'राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन' लंबे समय से यह मांग उठा रहा था कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी प्रधानों को प्रशासक के तौर पर काम जारी रखने दिया जाए. हाल ही में प्रधानों के संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी की थी. पंचायती राज विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल की बात ध्यान से सुनी और उसके बाद से इस पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई.

इससे पहले पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर भी सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि राजस्थान की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी प्रधानों को अंतरिम प्रशासक बनाने का प्रस्ताव रखा जाएगा. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि BJP 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गांवों में किसी भी तरह का संगठनात्मक शून्य नहीं चाहती. पंचायत प्रतिनिधियों का नेटवर्क BJP के लिए केवल विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का माध्यम नहीं बल्कि चुनावी संपर्क तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है.

पंचायत चुनावों में देरी की जमीन कैसे बनी?

दरअसल पंचायत चुनावों के टलने की पृष्ठभूमि भी राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर तैयार हुई है. 18 मई को योगी कैबिनेट ने पंचायत चुनावों में OBC आरक्षण लागू करने के लिए 'ट्रिपल टेस्ट' प्रक्रिया पूरी कराने के लिए एक विशेष आयोग के गठन को मंजूरी दी. आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है. इसका मतलब साफ है कि पंचायत चुनाव अब समय पर होना मुश्किल है. अधिकारियों का अनुमान है कि चुनाव अगले साल अप्रैल-मई से पहले संभव नहीं होंगे.

कहा जा रहा है कि सरकार पहले छह महीने की देरी चाहती है और जरूरत पड़ने पर बाद में अध्यादेश के जरिए इस अवधि को और बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है. यहीं से राजनीतिक सवाल खड़े होने लगे हैं. विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर पंचायत चुनाव टालना चाहती है ताकि विधानसभा चुनाव तक गांवों में मौजूदा सत्ता संरचना कायम रखी जा सके. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, “सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बचना चाहती है. पंचायत चुनाव टालकर BJP गांवों में प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहती है. अगर प्रधानों को ही प्रशासक बनाया जाता है, तो यह निष्पक्ष प्रशासन की भावना के खिलाफ होगा.” वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का कहना है, “BJP को डर है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उसका जनाधार कमजोर हुआ है. इसलिए वह चुनाव टालकर अपने समर्थक नेटवर्क को बनाए रखना चाहती है.”

कानून क्या कहता है?

उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3A) सरकार को यह अधिकार देती है कि अगर किन्हीं असामान्य परिस्थितियों या जनहित में समय पर चुनाव नहीं हो पाते तो छह महीने तक के लिए प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून में कहीं यह नहीं लिखा कि प्रशासक केवल सरकारी अधिकारी ही होगा. इसी लूपहोल के आधार पर सरकार निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाने का विकल्प तलाश रही है. एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, “अधिनियम सरकार को पर्याप्त लचीलापन देता है. अगर सरकार चाहे तो निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने में कानूनी अड़चन बहुत बड़ी नहीं होगी.”

हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले को अदालत में चुनौती मिल सकती है. राजनीतिक विश्लेषक मनोज यादव कहते हैं, “तकनीकी रूप से सरकार के पास गुंजाइश है लेकिन सवाल यह उठेगा कि क्या कार्यकाल समाप्त हो चुके निर्वाचित प्रतिनिधि को प्रशासनिक अधिकार देना लोकतांत्रिक मूल भावना के अनुरूप है? यह मामला न्यायिक समीक्षा तक जा सकता है.”

सरकारी अधिकारियों को इस बात की भी चिंता है कि अगर ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाया गया तो फिर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत प्रतिनिधि भी ऐसी ही मांग करेंगे. क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल जुलाई में समाप्त होगा. अब तक परंपरा यह रही है कि क्षेत्र पंचायतों के लिए SDM और जिला पंचायतों के लिए DM प्रशासक बनाए जाते रहे हैं. अगर वहां भी निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासनिक अधिकार देने की मांग उठी तो इससे प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नया विवाद खड़ा हो सकता है. एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “ग्राम पंचायतों में यह प्रयोग शुरू हुआ तो फिर अन्य स्तरों पर भी दबाव बनेगा. इससे पूरी पंचायत व्यवस्था का चरित्र बदल सकता है.”

BJP के लिए क्या है राजनीतिक फायदा

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह कदम BJP के लिए कई स्तरों पर फायदेमंद हो सकता है. पहला, पंचायत प्रतिनिधियों का नेटवर्क गांवों में BJP के पक्ष में राजनीतिक वातावरण बनाए रखने में मदद करेगा. दूसरा, ग्रामीण विकास योजनाओं और सरकारी लाभार्थी योजनाओं के वितरण में पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका बनी रहेगी, जिससे सत्ता और गांव के बीच सीधा संपर्क कायम रहेगा. तीसरा, पंचायत चुनाव टलने से सरकार को संभावित ग्रामीण असंतोष का सामना तत्काल नहीं करना पड़ेगा.

राजनीतिक विश्लेषक अभिनव सिंह कहते हैं, “BJP की राजनीति का बड़ा आधार बूथ और गांव स्तर की संरचना है. प्रधानों को प्रशासक बनाना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक चुनावी रणनीति भी माना जाएगा. इससे BJP गांवों में अपना कैडर और प्रभाव सक्रिय रख सकती है.” हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि इसका उल्टा असर भी हो सकता है, “अगर लोगों को लगे कि चुनाव जानबूझकर टाले जा रहे हैं, तो विपक्ष इसे लोकतंत्र बनाम सत्ता नियंत्रण के मुद्दे में बदल सकता है.” BJP इस पूरे मुद्दे को व्यावहारिक प्रशासनिक व्यवस्था के तौर पर पेश कर रही है. पार्टी नेताओं का तर्क है कि गांवों की स्थानीय जरूरतों और विकास कार्यों को मौजूदा प्रधान बेहतर ढंग से समझते हैं. लेकिन विपक्ष इसे 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लंबा खींचने' की कोशिश बता रहा है. बहुजन समाज पार्टी (BSP) के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पंचायतों का मूल उद्देश्य स्थानीय स्वशासन है और चुनाव टालना उस भावना के खिलाफ है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पंचायतें हमेशा से केवल स्थानीय निकाय नहीं रहीं. वे विधानसभा और लोकसभा चुनावों की सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगशाला भी रही हैं. गांवों का नेतृत्व किसके हाथ में है, इसका असर बड़े चुनावों तक दिखाई देता है. यही वजह है कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासकों की नियुक्ति का यह मुद्दा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है. यह सीधे तौर पर 2027 की राजनीतिक लड़ाई, ग्रामीण नेटवर्क और सत्ता की जमीनी पकड़ से जुड़ चुका है. 

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